Youth Life Struggle: आज का युवा बाहर से जितना आत्मविश्वासी दिखता है, अंदर से उतना ही उलझा हुआ है. सोशल मीडिया पर मुस्कुराती तस्वीरें, प्रोफेशनल प्रोफाइल पर बड़ी-बड़ी उपलब्धियां और बातचीत में ऊंचे सपने लेकिन इन सबके पीछे छिपा होता है एक सवाल, जो लगभग हर युवा के मन में गूंज रहा है- करियर चुनूं, पैसा कमाऊं या सुकून ढूंढूं?
यह कंफ्यूजन सिर्फ किसी एक शहर, एक वर्ग या एक कॉलेज तक सीमित नहीं है. यह आज के पूरे युवा वर्ग की सबसे बड़ी पहचान बन चुका है. कोई इंजीनियर बनकर खुश नहीं है, कोई सरकारी नौकरी पाकर भी बेचैन है, तो कोई लाखों कमाने के बावजूद खालीपन महसूस कर रहा है. आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?
AI का गलत इस्तेमाल आपकी नौकरी छीन सकता है लेकिन सही इस्तेमाल लाखों दिला सकता है
विकल्प ज्यादा हैं, लेकिन दिशा साफ नहीं
पहले के दौर में विकल्प कम थे. पढ़ाई करो, नौकरी पाओ, परिवार बसाओ, जिंदगी का रास्ता लगभग तय होता था. आज हालात उलट हैं. करियर के अनगिनत विकल्प हैं- स्टार्टअप, फ्रीलांसिंग, सोशल मीडिया, कॉर्पोरेट जॉब, सरकारी सेवा, विदेश जाना लेकिन कौन-सा रास्ता सही है, यह तय करना सबसे मुश्किल हो गया है.
हर विकल्प के साथ सोशल मीडिया पर किसी न किसी की ‘सक्सेस स्टोरी’ जुड़ी होती है. कोई 22 साल में करोड़पति बन रहा है, कोई विदेश में सेटल हो रहा है, तो कोई कम उम्र में ही बड़ा पद हासिल कर रहा है. इन कहानियों को देखकर युवा खुद की जिंदगी से तुलना करने लगता है और यहीं से कंफ्यूजन शुरू हो जाता है.
करियर बनाम पैसा: मजबूरी या चुनाव?
आज के युवा के सामने सबसे बड़ा दबाव है- पैसा. बढ़ती महंगाई, पारिवारिक जिम्मेदारियां और समाज की उम्मीदें उसे जल्दी कमाने के लिए मजबूर करती हैं. ऐसे में कई युवा अपने मनपसंद करियर को छोड़कर सिर्फ ‘सेफ और ज्यादा पैसे वाली नौकरी’ चुन लेते हैं.
लेकिन जब वही नौकरी उन्हें मानसिक थकान, तनाव और असंतोष देती है, तब सवाल उठता है-
क्या पैसा ही सब कुछ है?
और यहीं से दूसरा कंफ्यूजन जन्म लेता है.
सुकून की तलाश में भटकता युवा
सुकून आज की सबसे महंगी चीज बन चुकी है. युवा काम तो कर रहा है, लेकिन चैन से नहीं. ऑफिस के बाद भी दिमाग काम करता रहता है. मोबाइल नोटिफिकेशन, ईमेल, टारगेट, डेडलाइन, सब मिलकर मानसिक दबाव बढ़ा देते हैं.
कई युवा कहते हैं,
‘पैसा है, नौकरी है, लेकिन खुशी नहीं है.’
यही वजह है कि आज योग, मेडिटेशन, ट्रैवल, डिजिटल डिटॉक्स जैसे शब्द युवाओं में तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं. वे सुकून चाहते हैं, लेकिन यह नहीं समझ पा रहे कि सुकून मिलेगा कहां, करियर बदलकर, पैसा छोड़कर या सोच बदलकर?
सोशल मीडिया: प्रेरणा या ज़हर?
सोशल मीडिया ने युवाओं को जोड़ने के साथ-साथ उन्हें उलझा भी दिया है. यहां हर कोई अपनी जिंदगी का सबसे अच्छा हिस्सा दिखाता है. कोई अपनी असफलता, संघर्ष या अकेलापन नहीं दिखाता. युवा इन्हीं चमकदार तस्वीरों को देखकर सोचने लगता है कि वह पीछे रह गया है.
परिवार को आर्थिक रूप से मजबूत कैसे बनाएं? रॉबर्ट कियोसाकी की 3 अमूल्य सलाह
यह तुलना धीरे-धीरे आत्मविश्वास को कमजोर कर देती है. युवा खुद से सवाल करने लगता है-
‘मैं कुछ गलत तो नहीं कर रहा?’, ‘मेरी जिंदगी इतनी साधारण क्यों है?’ यहीं से मानसिक असंतुलन और कंफ्यूजन गहराता है.
एजुकेशन सिस्टम और हकीकत का टकराव
स्कूल और कॉलेज में युवाओं को नंबर, डिग्री और परीक्षा के लिए तैयार किया जाता है, लेकिन जिंदगी के फैसले लेने की ट्रेनिंग नहीं दी जाती. करियर काउंसलिंग, मानसिक स्वास्थ्य और आत्म-समझ जैसे विषय अभी भी शिक्षा का मुख्य हिस्सा नहीं बन पाए हैं. नतीजा यह होता है कि डिग्री हाथ में है, लेकिन दिशा नहीं. युवा पढ़ा-लिखा तो है, पर कंफ्यूज है कि आगे क्या करे. यह खालीपन उसे अंदर से कमजोर बना देता है.
परिवार और समाज का दबाव
भारतीय समाज में परिवार की भूमिका बहुत अहम है. कई बार माता-पिता अपने अनुभव के आधार पर बच्चों के लिए फैसले लेना चाहते हैं. उनका इरादा गलत नहीं होता, लेकिन बदलते दौर में वही पुराने पैमाने युवाओं पर बोझ बन जाते हैं. ‘यह नौकरी सुरक्षित है’, ‘इसमें नाम है’, ‘लोग क्या कहेंगे’… इन बातों के बीच युवा अपनी आवाज खो देता है. वह वही करता है जो उससे उम्मीद की जाती है, न कि वही जो वह करना चाहता है.
डर: असफलता का, पीछे छूट जाने का
आज का युवा सिर्फ असफलता से नहीं डरता, वह पीछे छूट जाने से डरता है. उसे लगता है कि अगर उसने गलत फैसला लिया, तो वह दौड़ में पीछे रह जाएगा. यह डर उसे रिस्क लेने से रोकता है और कंफ्यूजन में बनाए रखता है.
क्या यह कंफ्यूजन गलत है?
सवाल यह नहीं है कि युवा कंफ्यूज क्यों है, बल्कि सवाल यह है कि क्या कंफ्यूज होना गलत है? असल में, यह कंफ्यूजन इस बात का संकेत है कि युवा सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि अर्थपूर्ण जिंदगी चाहता है. वह सोच रहा है, सवाल कर रहा है और यही सोच भविष्य में बदलाव की नींव बन सकती है.
संतुलन ही असली जवाब है
करियर, पैसा और सुकून, तीनों एक-दूसरे के दुश्मन नहीं हैं. समस्या तब होती है जब इनमें से किसी एक को ही सब कुछ मान लिया जाता है. असली जरूरत है संतुलन की.
ऐसा करियर चुनना, जिसमें सीखने और आगे बढ़ने की गुंजाइश हो. इतना पैसा कमाना, जिससे सम्मानजनक जीवन जिया जा सके. और अपने लिए समय निकालना, जिससे मन और दिमाग स्वस्थ रहें.
YouTube Shorts देखकर क्यों बिगड़ रही है बच्चों की पढ़ाई? रिसर्च क्या कहती है
युवाओं के लिए एक जरूरी बात
आज का दौर परफेक्ट फैसलों का नहीं, ईमानदार कोशिशों का है. हर युवा को यह समझना होगा कि हर किसी की टाइमलाइन अलग होती है. किसी की सफलता 22 में आती है, किसी की 32 में और दोनों ही सही हैं. खुद से यह सवाल पूछना ज्यादा जरूरी है कि ‘मैं किस तरह की जिंदगी जीना चाहता हूं?’ न कि ‘लोग मुझसे क्या उम्मीद करते हैं?’
कंफ्यूजन कमजोरी नहीं, शुरुआत है
आज का युवा कंफ्यूज है, क्योंकि वह सिर्फ जीना नहीं चाहता, वह अच्छा जीना चाहता है. यह कंफ्यूजन दरअसल एक बेहतर, संतुलित और अर्थपूर्ण जिंदगी की तलाश है. जरूरत है खुद को समझने की, तुलना कम करने की और यह मानने की कि हर जवाब तुरंत नहीं मिलता.
कभी-कभी सही रास्ता खोजने से पहले भटकना भी जरूरी होता है क्योंकि जो सवाल पूछता है, वही आगे चलकर अपनी जिंदगी के सही जवाब भी ढूंढता है.

