Nitish Kumar Hijab Controversy Full Story: बिहार की राजधानी पटना में आयोजित एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से जुड़ा एक वीडियो सामने आने के बाद बड़ा विवाद खड़ा हो गया. वीडियो में मुख्यमंत्री को एक महिला डॉक्टर नुसरत परवीन का हिजाब हटाते या खींचते हुए देखा गया. इस घटना के बाद राजनीतिक, सामाजिक और संवैधानिक स्तर पर बहस शुरू हो गई कि यह व्यवहार कितना उचित था और इसके मायने क्या हैं.
घटना क्या है?
यह मामला उस वक्त सामने आया जब पटना में एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान आयुष डॉक्टरों को नियुक्ति पत्र दिए जा रहे थे. इसी कार्यक्रम में डॉक्टर नुसरत परवीन भी मंच पर मौजूद थीं. वीडियो में दिखता है कि नियुक्ति पत्र देने के बाद मुख्यमंत्री ने अचानक उनके चेहरे से हिजाब हटाया, ताकि उनका चेहरा दिखाई दे.
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यह पूरा घटनाक्रम सार्वजनिक मंच पर, कैमरों और मौजूद लोगों के सामने हुआ. वीडियो के वायरल होते ही इसे लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं आने लगीं.
हिजाब को लेकर विवाद क्यों हुआ?
हिजाब पहनना किसी भी महिला का निजी और धार्मिक निर्णय माना जाता है. भारतीय संविधान व्यक्ति को अपने धर्म और धार्मिक आचरण की स्वतंत्रता देता है. ऐसे में किसी व्यक्ति के पहनावे को बिना अनुमति हटाना निजता और गरिमा के अधिकार से जुड़ा मामला बन जाता है.
आलोचकों का कहना है कि भले ही इरादा कुछ भी रहा हो, लेकिन किसी महिला के धार्मिक परिधान को सार्वजनिक मंच पर छूना या हटाना अनुचित है. खासकर तब, जब यह काम सत्ता में बैठे व्यक्ति द्वारा किया गया हो.
क्या यह सिर्फ शिष्टाचार का मामला था?
कुछ समर्थकों का तर्क है कि मुख्यमंत्री का इरादा अपमान करने का नहीं था और यह एक अनौपचारिक या सहज क्षण था. हालांकि, महिलाओं के अधिकार और अल्पसंख्यक मुद्दों पर काम करने वाले संगठनों का कहना है कि इरादे से ज्यादा प्रभाव महत्वपूर्ण होता है.
उनके मुताबिक, इस तरह की घटनाएं यह संदेश देती हैं कि सार्वजनिक पद पर बैठे लोग किसी महिला की निजी पसंद में हस्तक्षेप कर सकते हैं, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है.
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं क्या रहीं?
वीडियो सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने मुख्यमंत्री के व्यवहार पर सवाल उठाए. कांग्रेस और अन्य दलों के नेताओं ने इसे महिलाओं की गरिमा और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा मुद्दा बताया.
वहीं, कुछ नेताओं ने इस विवाद को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया बताया और कहा कि इसे राजनीतिक रंग दिया जा रहा है. राज्यपाल और अन्य संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की ओर से भी बयान आए, जिनमें संयम बरतने की अपील की गई.
नुसरत परवीन की भूमिका और फैसला
घटना के बाद नुसरत परवीन को लेकर भी कई तरह की चर्चाएं शुरू हुईं. कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया कि वह इस घटना से आहत थीं और सरकारी सेवा ज्वॉइन करने को लेकर असमंजस में थीं. बाद में उनके ज्वॉइन करने की समय-सीमा बढ़ाई गई.
आखिरकार, नुसरत परवीन ने सरकारी सेवा ज्वॉइन कर ली. इस फैसले को कुछ लोगों ने उनके पेशेवर रवैये और मजबूती के तौर पर देखा, जबकि कुछ ने इसे दबाव में लिया गया निर्णय बताया.
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संवैधानिक सवाल क्या हैं?
यह मामला कई अहम सवाल खड़े करता है:
क्या किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति को किसी नागरिक के धार्मिक प्रतीक को छूने का अधिकार है?
क्या सत्ता और नागरिक के बीच शक्ति असंतुलन को नजरअंदाज किया जा सकता है?
महिलाओं की गरिमा और सहमति की सीमा कहां खत्म होती है?
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि लोकतंत्र में व्यक्ति की सहमति और सम्मान सबसे महत्वपूर्ण हैं, चाहे सामने कोई भी पद क्यों न हो.
सोशल मीडिया पर बहस
सोशल मीडिया पर यह मुद्दा दो हिस्सों में बंट गया. एक वर्ग ने इसे गंभीर संवैधानिक और महिला अधिकारों का मामला बताया, जबकि दूसरे वर्ग ने इसे छोटी बात कहकर नजरअंदाज करने की कोशिश की. हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे मामलों में सार्वजनिक बहस जरूरी है, क्योंकि यही लोकतंत्र को आत्ममंथन का मौका देती है.
पटना हिजाब विवाद केवल एक व्यक्ति या एक घटना तक सीमित नहीं है. यह मामला व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सत्ता की सीमाएं और सार्वजनिक आचरण जैसे व्यापक मुद्दों से जुड़ा है. इसने एक बार फिर यह सवाल सामने रखा है कि लोकतंत्र में सत्ता का व्यवहार कैसा होना चाहिए और व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए.

