isliye roothi ho gauraiya r

….इस लिए रूठी हो गौरैया रानी

इस लिए रूठी हो गौरैया रानी,
माफ करो इंसानों की मनमानी.
घरों में न मिलता तुम्हें दाना है,
बेरहम हुआ अब जमाना है.
किताबों में ही बची है कहानी,
इस लिए रूठी हो गौरैया रानी.

दूसरे कहते रहे आप ‘सास’ हैं मेरी, पर आप मेरे लिए यशोदा बन गई

याद हैं वो पुराने दिन,
जब घर-आंगन में आती थी.
बेखौफ नन्हें पंखों संग,
हर मुंडेर पर चहचहाती थी.
खो सी रही अब तुम्हारी निशानी,
इस लिए रूठी हो गौरैया रानी.

सुबह के समय जब आंगन में थी फुदकती,
मानो घर की हर चीज थी चहकती.
नन्हीं सी चोंच से जब बिखेरती थी तिनके,
मुस्कुराने लगते थे बूढ़े और बच्चे.
सुकूं भरी वो शामें क्या फिर नहीं आनी,
इस लिए रूठी हो गौरैया रानी.

काट दिए गए हैं जंगल,
उजाड़ दिए गए तुम्हारे बसेरे हैं.
नहीं दिखते पेड़-पौधों पर घोंसले,
घरों के जंगलों पर लगे AC-जालियों के घेरे हैं.
विलुप्त होने की कगार पर है तुम्हारी जिंदगानी,
इस लिए रूठी हो गौरैया रानी.

हर किसी को अब तुम्हारी, प्यारी किलकारियों का ही इंतजार है…

देर नहीं हुई है आंखें खोले इंसान,
बनाए घरौंदे, जहां रहें ये बेजुबान.
सुनाई पड़ेगी फिर से इनकी चीं-चीं-चीं-चीं,
फिर मुस्काएगी छत-बालकनी की मुंडेर भी.
डालो दाना, रखो इनके लिए भी पानी,
इस लिए रूठी हो गौरैया रानी.

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