भारत के रक्षा विनिर्माण क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि सामने आई है. रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह के मुताबिक, भारत का रक्षा निर्यात अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुंचकर 38,424 करोड़ रुपये हो गया है. उन्होंने ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि पिछले एक साल के दौरान भारत यूरोप को हथियारों का निर्यात करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश बनकर उभरा है.
रक्षा सचिव के अनुसार, यूरोप की ‘रीआर्म यूरोप’ पहल के तहत रक्षा सामग्री की मांग बढ़ने और भारत में रक्षा विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार होने से निर्यात को बढ़ावा मिला है. इस मांग में मानक गोला-बारूद, तोप के गोले और छोटे-बड़े कैलिबर के गोला-बारूद जैसी सामग्री शामिल है.
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₹38,424 करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा रक्षा निर्यात
रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने शुक्रवार को पत्रकारों से बातचीत में बताया कि भारत का रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है. यह राशि लगभग 3.6 अरब यूरो के बराबर बताई गई है.
उन्होंने कहा कि यूरोप में रक्षा सामग्री की बढ़ती मांग ने भारतीय उत्पादों के निर्यात के लिए अवसर पैदा किए हैं. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने भारत को पिछले एक साल में यूरोप को हथियार निर्यात करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश बताया.
हालांकि, यह रैंकिंग रक्षा सचिव की ओर से रिपोर्ट के हवाले से दी गई है. उपलब्ध जानकारी में इस रैंकिंग के लिए इस्तेमाल किए गए आंकड़ों और तुलना में शामिल देशों का विस्तृत विवरण नहीं दिया गया है.
‘रीआर्म यूरोप’ पहल से बढ़ी रक्षा सामग्री की मांग
रक्षा सचिव के अनुसार, यूरोप की ‘रीआर्म यूरोप’ पहल के कारण विभिन्न प्रकार के गोला-बारूद की मांग बढ़ी है. इससे भारत से मानक गोला-बारूद, तोप के गोले और बड़े तथा छोटे कैलिबर के गोला-बारूद का निर्यात बढ़ाने के अवसर मिले हैं.
भारत का रक्षा निर्यात केवल भारी तोपों और गोला-बारूद तक सीमित नहीं है. इसमें हेलमेट, बुलेटप्रूफ जैकेट, सामरिक उपकरण और छोटे हथियार भी शामिल हैं. इस तरह भारतीय रक्षा उद्योग विभिन्न प्रकार के उत्पादों की आपूर्ति कर रहा है.
रक्षा सचिव ने यह भी बताया कि भारत अब 80 से अधिक देशों को रक्षा सामग्री का निर्यात कर रहा है. इससे भारतीय रक्षा उद्योग की अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मौजूदगी का पता चलता है.
देश में रक्षा विनिर्माण का औद्योगिक आधार हुआ व्यापक
राजेश कुमार सिंह ने कहा कि पिछले 10 वर्षों में भारत के रक्षा विनिर्माण तंत्र का उल्लेखनीय विस्तार हुआ है. उनके मुताबिक, देश में 16 बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा कंपनियां हैं. इनके अलावा लगभग 840 बड़ी और मध्यम आकार की निजी कंपनियां तथा स्टार्टअप समेत करीब 17,000 छोटे उद्यम इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं.
रक्षा सचिव ने कहा कि इस विस्तृत औद्योगिक आधार का असर घरेलू बिक्री के आंकड़ों में भी दिखाई देता है. उनके अनुसार, रक्षा क्षेत्र की घरेलू बिक्री अब लगभग 17 अरब यूरो तक पहुंच गई है.
इस औद्योगिक ढांचे में सरकारी कंपनियों के साथ निजी कंपनियों, स्टार्टअप और छोटे उद्यमों की भागीदारी शामिल है. इससे देश में रक्षा उपकरणों के उत्पादन और आपूर्ति से जुड़े कारोबार का दायरा बढ़ा है.
रक्षा खरीद में घरेलू कंपनियों को प्राथमिकता
सरकार की कोशिश है कि हर साल लगभग 20 से 25 अरब डॉलर के रक्षा पूंजीगत व्यय का 75 प्रतिशत हिस्सा देश के भीतर खर्च किया जाए. रक्षा सचिव के अनुसार, इसके तहत भारतीय डिजाइन, विकास और विनिर्माण वाले उत्पादों यानी आईडीडीएम को प्राथमिकता दी जा रही है.
इस नीति का उद्देश्य घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करना और तकनीकी आत्मनिर्भरता को मजबूत करना है. घरेलू कंपनियों को रक्षा खरीद में अवसर मिलने से उत्पादन क्षमता बढ़ाने और भारतीय उत्पादों को विकसित करने में मदद मिल सकती है.
रक्षा सचिव ने यह भी बताया कि भारत पहले रक्षा उपकरणों के लिए काफी हद तक रूस पर निर्भर था. हालांकि, समय के साथ आयात के स्रोतों में विविधता आई है और भारत ने अन्य देशों के साथ रक्षा संबंधों को मजबूत किया है.
फ्रांस और इजरायल की भी अहम हिस्सेदारी
राजेश कुमार सिंह के मुताबिक, भारत के पास अब भी रूसी मूल के कई रक्षा उपकरण हैं, लेकिन फ्रांस सहित कई यूरोपीय देशों के साथ द्विपक्षीय रक्षा संबंध मजबूत हुए हैं.
उन्होंने बताया कि रूस के बाद फ्रांस की भारत के रक्षा आयात में लगभग 15 प्रतिशत हिस्सेदारी है. इजरायल की हिस्सेदारी भी करीब इतनी ही बताई गई है.
रक्षा सचिव ने हाल ही में ग्रीस और साइप्रस के दौरे का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि भारत इन दोनों देशों के साथ रणनीतिक हितों में काफी समानता देखता है. उनके मुताबिक, ये देश भारत के नए साझेदार हैं और यूरोप तक पहुंच बनाने के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हैं.
यूरोपीय देशों के साथ संयुक्त उद्यम बनाने की योजना
भारत यूरोप के रक्षा खरीद कार्यक्रमों में अपनी भागीदारी बढ़ाना चाहता है. इसके लिए यूरोपीय देशों में संयुक्त उद्यम स्थापित करने की योजना पर काम किया जा रहा है. साथ ही, यूरोपीय साझेदारों को भी भारत में संयुक्त उद्यम स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा, ताकि वे भारतीय रक्षा बाजार तक पहुंच बना सकें.
रक्षा सचिव ने कहा कि यूरोपीय देश भारत के रक्षा खरीद कार्यक्रमों में भी भाग ले सकते हैं. हालांकि, इसके लिए उन्हें सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ संबंधी शर्तों का पालन करना होगा.
उन्होंने उम्मीद जताई कि भारत और यूरोप के बीच प्रस्तावित साझेदारी समझौता दोनों क्षेत्रों के रक्षा विनिर्माताओं की आपूर्ति श्रृंखलाओं को अधिक एकीकृत करने का आधार बनेगा. भारत इस सहयोग के जरिए रक्षा उत्पादन, औद्योगिक साझेदारी और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी भागीदारी को मजबूत करना चाहता है.
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