क्रोनिक हेपेटाइटिस बी से पीड़ित मरीजों के इलाज के लिए अमेरिका से एक नई चिकित्सा प्रगति सामने आई है. अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने हिब्सागो (बेपिरोविरसेन) नाम की नई दवा को मंजूरी दी है. जीएसके द्वारा विकसित यह दवा इंजेक्शन के रूप में दी जाती है. इसके जरिए कुछ पात्र मरीज नियमित एंटीवायरल दवाएं बंद करने के बाद भी हेपेटाइटिस बी वायरस को नियंत्रित रखने में सफल हो सकते हैं.
हालांकि, यह उपचार सभी मरीजों के लिए प्रभावी नहीं है. क्लिनिकल परीक्षणों में हिब्सागो लेने वाले कुछ मरीजों में उपचार बंद करने के बाद भी वायरस पर नियंत्रण बना रहा, लेकिन अधिकांश मरीज इस स्तर तक नहीं पहुंच पाए. दवा के साथ लिवर पर गंभीर दुष्प्रभाव, प्लेटलेट्स में कमी और अन्य स्वास्थ्य जोखिमों की चेतावनी भी दी गई है.
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FDA ने हेपेटाइटिस बी के लिए किस नई दवा को मंजूरी दी?
FDA ने हिब्सागो को क्रोनिक हेपेटाइटिस बी से पीड़ित ऐसे वयस्क मरीजों के लिए मंजूरी दी है, जिन्हें लिवर सिरोसिस नहीं है. यह दवा एंटीसेंस ओलिगोन्यूक्लियोटाइड तकनीक पर आधारित है. FDA के अनुसार, हेपेटाइटिस बी के इलाज के लिए मंजूरी पाने वाली यह इस श्रेणी की पहली दवा है.
यह तकनीक वायरस के प्रजनन और वायरल प्रोटीन के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले आनुवंशिक निर्देशों को बाधित करने के लिए तैयार की गई है. इसका उद्देश्य शरीर में वायरस की गतिविधि को नियंत्रित करने में मदद करना है.
FDA के संक्रामक रोग कार्यालय की कार्यवाहक निदेशक वेंडी कार्टर ने कहा कि क्रोनिक हेपेटाइटिस बी से पीड़ित कई लोगों को वायरस को नियंत्रित रखने के लिए वर्षों तक एंटीवायरल दवाएं लेनी पड़ती हैं. उनके मुताबिक, हिब्सागो उपचार का एक नया विकल्प उपलब्ध कराती है, जिससे कुछ मरीज सभी हेपेटाइटिस बी दवाएं बंद करने के बाद भी वायरस को नियंत्रित रख सकते हैं.
किन मरीजों को मिल सकती है हिब्सागो की मंजूरी?
यह दवा हर क्रोनिक हेपेटाइटिस बी मरीज के लिए नहीं है. दिए गए FDA मानदंडों के अनुसार, इसके लिए मरीजों को कुछ निर्धारित शर्तें पूरी करनी होंगी.
- मरीज वयस्क होना चाहिए और उसे क्रोनिक हेपेटाइटिस बी होना चाहिए.
- मरीज को लिवर सिरोसिस नहीं होना चाहिए.
- वह कम से कम छह महीने से एंटीवायरल उपचार ले रहा हो.
- उसके रक्त में हेपेटाइटिस बी वायरस का स्तर नियंत्रित हो.
- रक्त में हेपेटाइटिस बी सरफेस एंटीजन का स्तर 3,000 अंतरराष्ट्रीय इकाई प्रति मिलीलीटर या उससे कम हो.
आखिरी मानदंड की पुष्टि FDA से अधिकृत जांच के जरिए की जाएगी. किसी मरीज के लिए यह दवा उपयुक्त है या नहीं, इसका फैसला उसकी मेडिकल स्थिति और जांच रिपोर्ट के आधार पर चिकित्सक करेंगे.
क्लिनिकल ट्रायल में क्या सामने आया?
हिब्सागो की प्रभावशीलता का आकलन दो क्लिनिकल परीक्षणों में किया गया. इन परीक्षणों में दवा की तुलना प्लेसीबो यानी बिना सक्रिय दवा वाले उपचार से की गई.
परीक्षण के दौरान मरीजों को 24 सप्ताह तक त्वचा के नीचे हिब्सागो के इंजेक्शन दिए गए. इस अवधि में वे अपनी नियमित एंटीवायरल दवाएं भी लेते रहे. आखिरी इंजेक्शन के बाद भी उन्हें कम से कम 24 सप्ताह तक पुराना एंटीवायरल उपचार जारी रखना था.
इसके बाद निर्धारित चिकित्सकीय और प्रयोगशाला मानदंडों को पूरा करने वाले कुछ मरीजों को एंटीवायरल दवाएं बंद करने की अनुमति दी गई.
दोनों परीक्षणों के संयुक्त नतीजों के मुताबिक:
- हिब्सागो लेने वाले 24 प्रतिशत मरीज नियमित एंटीवायरल दवाएं बंद करने के निर्धारित मानदंडों पर खरे उतरे.
- प्लेसीबो समूह में कोई भी मरीज इन मानदंडों पर खरा नहीं उतरा.
- सभी हेपेटाइटिस बी उपचार बंद करने के 24 सप्ताह बाद हिब्सागो समूह के 19 प्रतिशत मरीजों में वायरस पर नियंत्रण बना रहा और उनके रक्त में हेपेटाइटिस बी सरफेस एंटीजन का पता नहीं चला.
इन नतीजों से संकेत मिलता है कि कुछ मरीजों को नियमित एंटीवायरल उपचार बंद करने के बाद भी वायरस को नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है. लेकिन अधिकांश मरीज इस स्तर तक नहीं पहुंचे. इसलिए इन परिणामों को सभी मरीजों के लिए उपचार बंद करने की गारंटी नहीं माना जा सकता.
हिब्सागो के क्या हैं गंभीर जोखिम?
FDA ने इस दवा के साथ कई गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों की चेतावनी दी है. इसके उपयोग संबंधी निर्देशों में लिवर पर गंभीर दुष्प्रभाव और प्लेटलेट्स की संख्या घटने का जोखिम शामिल है. प्लेटलेट्स कम होने से गंभीर और जानलेवा रक्तस्राव का खतरा बढ़ सकता है.
इसके अलावा, किडनी की कार्यक्षमता बिगड़ने, रक्त वाहिकाओं में सूजन जैसी गंभीर प्रतिक्रियाओं और दवा देने की प्रक्रिया में गड़बड़ी से जुड़ी जटिलताओं को लेकर भी चेतावनी दी गई है.
उपचार से पहले और इसके दौरान मरीजों की नियमित रक्त जांच तथा चिकित्सकीय निगरानी जरूरी होगी. इंजेक्शन लगाने की जगह पर प्रतिक्रिया, बुखार, थकान और सिरदर्द इसके सामान्य रूप से बताए गए दुष्प्रभावों में शामिल हैं.
मरीजों को डॉक्टर की सलाह के बिना अपनी मौजूदा एंटीवायरल दवाएं बंद नहीं करनी चाहिए. हिब्सागो के इस्तेमाल और उपचार में बदलाव का फैसला विशेषज्ञ की निगरानी में ही किया जाना चाहिए.
मरीजों की पहचान के लिए जांच को भी मंजूरी
FDA ने पात्र मरीजों की पहचान करने और उपचार संबंधी निर्णयों में सहायता के लिए रोशे द्वारा विकसित एक सहायक जांच को भी मंजूरी दी है. इसका उद्देश्य यह निर्धारित करने में मदद करना है कि कौन से मरीज हिब्सागो के लिए निर्धारित मानदंडों को पूरा करते हैं.
दवा को फास्ट ट्रैक, ब्रेकथ्रू थेरेपी और प्रायोरिटी रिव्यू जैसी श्रेणियों के तहत भी मान्यता मिली थी. ये व्यवस्थाएं उन उपचारों की समीक्षा को तेज करने के लिए बनाई गई हैं, जिनमें किसी महत्वपूर्ण चिकित्सा जरूरत को पूरा करने की क्षमता हो सकती है.
भारत में कब उपलब्ध होगी यह दवा?
हिब्सागो की मंजूरी जीएसके पीएलसी को दी गई है. हालांकि, उपलब्ध जानकारी में अमेरिका के बाहर, विशेष रूप से भारत में, इसकी व्यावसायिक उपलब्धता की तारीख नहीं बताई गई है. इसलिए भारत में इसके उपलब्ध होने की तारीख या कीमत के बारे में फिलहाल कोई निश्चित दावा नहीं किया जा सकता.
क्रोनिक हेपेटाइटिस बी एक दीर्घकालिक वायरल संक्रमण है, जो लिवर को प्रभावित करता है. कई मरीजों को वायरस को दबाए रखने और सिरोसिस तथा लिवर कैंसर जैसी जटिलताओं का जोखिम कम करने के लिए लंबे समय तक एंटीवायरल दवाएं लेनी पड़ती हैं.
इस बीमारी की रोकथाम और नियंत्रण के लिए टीकाकरण, समय पर जांच और उचित उपचार तक पहुंच महत्वपूर्ण है. हिब्सागो की मंजूरी कुछ पात्र मरीजों के लिए एक नया उपचार विकल्प प्रस्तुत करती है, लेकिन इसके लाभ और जोखिमों को समझकर ही चिकित्सकीय निर्णय लेना जरूरी है.
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