आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले में स्थित अडुर्रू (Adurru) भारत की प्राचीन बौद्ध विरासत का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है. करीब 2,400 वर्ष पुराने इस ऐतिहासिक स्थल का संबंध सम्राट अशोक के समय से माना जाता है. यहां मौजूद विशाल बौद्ध स्तूप और अन्य पुरातात्विक अवशेष आज भी देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की गवाही देते हैं.
यह स्थल गोदावरी नदी की सहायक वैनेतेय (Vainateya) नदी के किनारे स्थित है, जो आगे चलकर बंगाल की खाड़ी में मिलती है.
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संघमित्रा से जुड़ा है इस स्थल का इतिहास
ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार अडुर्रू के इस बौद्ध स्तूप की नींव संघमित्रा ने रखी थी. संघमित्रा सम्राट अशोक की पुत्री थीं और श्रीलंका में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए प्रस्थान करने से पहले उन्होंने इस क्षेत्र में बौद्ध गतिविधियों को बढ़ावा दिया था.
इसी कारण यह स्थान बौद्ध इतिहास और धर्म के अध्ययन में विशेष महत्व रखता है.
1923 में ASI ने की थी खुदाई
इस प्राचीन स्थल की खुदाई भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने वर्ष 1923 में कराई थी.
खुदाई के दौरान यहां कई महत्वपूर्ण संरचनाएं मिलीं, जिनमें शामिल हैं.
- प्राचीन बौद्ध स्तूप
- चैत्य (Chaitya)
- विहार (Vihara)
- धार्मिक एवं आवासीय संरचनाओं के अवशेष
इन खोजों ने यह प्रमाणित किया कि अडुर्रू प्राचीन काल में बौद्ध शिक्षा और धार्मिक गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र था.
महास्तूप की क्या है खासियत?
अडुर्रू का सबसे बड़ा आकर्षण यहां स्थित महास्तूप है.
यह स्तूप पहिए (Wheel-shaped) के आकार की योजना पर निर्मित है और इसका व्यास लगभग 17 फीट बताया जाता है. इसके चारों दिशाओं में आयक (Ayaka) प्लेटफॉर्म बनाए गए हैं, जो बौद्ध स्थापत्य कला की महत्वपूर्ण विशेषता माने जाते हैं.
आज भी इस स्तूप के अवशेष प्राचीन भारतीय वास्तुकला और बौद्ध संस्कृति की झलक प्रस्तुत करते हैं.
पर्यटन और इतिहास प्रेमियों के लिए खास आकर्षण
अडुर्रू केवल धार्मिक महत्व का स्थल नहीं है, बल्कि इतिहास, पुरातत्व और संस्कृति में रुचि रखने वाले पर्यटकों के लिए भी एक प्रमुख आकर्षण है.
शांत प्राकृतिक वातावरण, ऐतिहासिक अवशेष और बौद्ध विरासत इसे आंध्र प्रदेश के महत्वपूर्ण पर्यटन स्थलों में शामिल करते हैं. यहां हर वर्ष बड़ी संख्या में पर्यटक, शोधकर्ता और बौद्ध अनुयायी पहुंचते हैं.
भारतीय सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा
विशेषज्ञों के अनुसार अडुर्रू भारत के उन ऐतिहासिक स्थलों में शामिल है, जहां बौद्ध धर्म के विकास और उसके प्रसार से जुड़े महत्वपूर्ण प्रमाण सुरक्षित हैं.
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ऐसे विरासत स्थल न केवल भारत के प्राचीन इतिहास को संरक्षित करते हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को देश की सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर से भी परिचित कराते हैं.
Source: Archaeological Survey of India (ASI)


