क्या आने वाले वर्षों में भारत की बड़ी आबादी अस्थायी और ऐप-आधारित कामों पर निर्भर हो सकती है? क्या स्थायी नौकरियों की जगह धीरे-धीरे गिग वर्क ले रहा है? ये सवाल इन दिनों चर्चा में हैं, क्योंकि लेखिका और शोधकर्ता वंदना वासुदेवन ने गिग इकॉनमी को लेकर एक ऐसी टिप्पणी की है जिसने रोजगार के भविष्य पर नई बहस छेड़ दी है.
भारत में पिछले कुछ वर्षों के दौरान फूड डिलीवरी, कैब सर्विस, क्विक कॉमर्स और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म आधारित कामों का तेजी से विस्तार हुआ है. लाखों लोग इन प्लेटफॉर्म्स से जुड़कर आय अर्जित कर रहे हैं. लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या यह व्यवस्था लंबे समय तक टिकाऊ और सुरक्षित रोजगार का विकल्प बन सकती है.
आखिर क्या कहा वंदना वासुदेवन ने?
एक हालिया बातचीत में वंदना वासुदेवन ने कहा कि भारत “डिलीवरी वर्कर्स का देश” बनने के बेहद करीब पहुंच रहा है. उनका तर्क था कि गिग कार्य मूल रूप से अस्थायी प्रकृति का होता है, लेकिन आज बड़ी संख्या में लोग इसे स्थायी रोजगार के रूप में कर रहे हैं. उन्होंने इसे चिंताजनक प्रवृत्ति बताया.
उनकी यह टिप्पणी केवल डिलीवरी सेक्टर तक सीमित नहीं है, बल्कि उस व्यापक बदलाव की ओर इशारा करती है जो तकनीक और ऐप आधारित सेवाओं के कारण श्रम बाजार में दिखाई दे रहा है.
गिग इकॉनमी आखिर है क्या?
गिग इकॉनमी उस व्यवस्था को कहा जाता है जिसमें लोग किसी कंपनी के स्थायी कर्मचारी बनने के बजाय प्लेटफॉर्म या ऐप के माध्यम से सेवाएं प्रदान करते हैं.
इसके उदाहरण हैं:
- फूड डिलीवरी
- क्विक कॉमर्स डिलीवरी
- कैब और बाइक टैक्सी सेवाएं
- होम सर्विस प्लेटफॉर्म
- फ्रीलांस डिजिटल कार्य
इस मॉडल ने लाखों लोगों को रोजगार के अवसर दिए हैं, लेकिन इसके साथ नौकरी की स्थिरता, सामाजिक सुरक्षा और आय की निश्चितता जैसे मुद्दे भी जुड़े हुए हैं.
क्यों बढ़ रही हैं ऐसी नौकरियां?
भारत में स्मार्टफोन और इंटरनेट की पहुंच बढ़ने के बाद ऑनलाइन सेवाओं का बाजार तेजी से विस्तारित हुआ है. उपभोक्ता अब खाना, किराना, टैक्सी और कई अन्य सेवाएं मोबाइल ऐप के जरिए प्राप्त कर रहे हैं.
जैसे-जैसे उपभोक्ताओं की मांग बढ़ी, वैसे-वैसे प्लेटफॉर्म कंपनियों को बड़ी संख्या में डिलीवरी पार्टनर्स और सेवा प्रदाताओं की जरूरत पड़ी. इससे गिग आधारित रोजगार में तेजी आई.
बहस का दूसरा पक्ष भी है
गिग इकॉनमी के समर्थकों का कहना है कि इसने लाखों लोगों को रोजगार का अवसर दिया है, खासकर उन लोगों को जिन्हें पारंपरिक नौकरियां आसानी से नहीं मिल पातीं.
कई युवाओं, छात्रों और पार्ट-टाइम काम करने वालों के लिए यह आय का महत्वपूर्ण स्रोत बना है. इसके अलावा प्लेटफॉर्म आधारित मॉडल ने लोगों को काम के घंटे चुनने की कुछ स्वतंत्रता भी दी है.
यानी यह बहस केवल अच्छी या बुरी व्यवस्था की नहीं बल्कि रोजगार की बदलती प्रकृति की है.
सबसे बड़ी चिंता क्या है?
विशेषज्ञों के अनुसार मुख्य चिंता यह है कि बड़ी संख्या में लोग यदि केवल अस्थायी और प्लेटफॉर्म आधारित कामों पर निर्भर हो जाएं तो भविष्य में सामाजिक सुरक्षा से जुड़े सवाल खड़े हो सकते हैं.
जैसे:
- पेंशन
- स्वास्थ्य सुरक्षा
- बीमा
- नौकरी की स्थिरता
- आय की नियमितता
इन्हीं मुद्दों को लेकर दुनिया के कई देशों में चर्चा चल रही है और नई नीतियों पर विचार किया जा रहा है.
तकनीक कैसे बदल रही है रोजगार की तस्वीर?
आज का श्रम बाजार पहले जैसा नहीं रहा. ऐप, एल्गोरिदम और डिजिटल प्लेटफॉर्म अब यह तय करने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं कि कौन काम करेगा, कितना काम मिलेगा और कितनी कमाई होगी.
यही कारण है कि तकनीक और रोजगार का संबंध पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में रोजगार का स्वरूप और तेजी से बदल सकता है.
क्या भारत को नई नीति की जरूरत है?
गिग इकॉनमी का विस्तार जारी है और इसके साथ ही श्रमिक अधिकारों को लेकर भी चर्चा बढ़ रही है. कई विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य की अर्थव्यवस्था में गिग वर्कर्स की भूमिका महत्वपूर्ण होगी, इसलिए उनके लिए बेहतर सुरक्षा और स्पष्ट नियमों की आवश्यकता पड़ सकती है.
रोजगार का भविष्य केवल नई नौकरियां पैदा करने का सवाल नहीं है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करने का है कि काम करने वालों को सम्मानजनक और सुरक्षित कार्य वातावरण मिले.
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क्यों चर्चा में है यह बयान?
वंदना वासुदेवन का बयान इसलिए चर्चा में है क्योंकि यह केवल डिलीवरी ऐप्स की बात नहीं करता, बल्कि भारत के रोजगार मॉडल के भविष्य पर सवाल उठाता है. क्या देश स्थायी नौकरियों की ओर बढ़ रहा है या अस्थायी प्लेटफॉर्म आधारित कामों की ओर? यही वह प्रश्न है जिसने इस चर्चा को राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण बना दिया है.
आने वाले वर्षों में तकनीक, नीतियां और श्रम बाजार किस दिशा में जाते हैं, उसी से तय होगा कि भारत की नई कार्य संस्कृति कैसी दिखाई देगी.
Source: Hindustan Times Books Interview with Vandana Vasudevan (10 June 2026), तथा उनकी पुस्तक OTP Please! से जुड़े साक्षात्कार और शोध चर्चाएं.


