उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों में कई ऐसे धार्मिक स्थल हैं, जहां आस्था के साथ प्राकृतिक सुंदरता का भी अद्भुत संगम देखने को मिलता है. टिहरी गढ़वाल जिले के जामनीखाल गांव में स्थित मां चंद्रबदनी देवी मंदिर भी ऐसा ही एक प्रमुख हिंदू तीर्थस्थल है. खास बात यह है कि इस मंदिर के गर्भगृह में देवी की प्रतिमा के स्थान पर श्री यंत्र की पूजा की जाती है.
समुद्र तल से करीब 2277 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर हिमालयी क्षेत्र के प्राकृतिक नजारों और आध्यात्मिक वातावरण के लिए जाना जाता है. मंदिर से आसपास के क्षेत्रों के साथ बर्फ से ढकी पर्वत चोटियों और घने जंगलों का विहंगम दृश्य दिखाई देता है.
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शक्ति पूजा का प्रमुख केंद्र है चंद्रबदनी मंदिर
चंद्रबदनी देवी मंदिर को शक्ति पूजा के प्रमुख केंद्रों में बताया जाता है. उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी मंदिर से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा किया और इसे आस्था, प्रकृति और दिव्यता के संगम वाला स्थान बताया.
मंदिर के आसपास फैली हिमालय की पहाड़ियां और प्राकृतिक वातावरण यहां आने वाले श्रद्धालुओं को अलग आध्यात्मिक अनुभव देते हैं. ऊंचाई पर स्थित होने के कारण मंदिर से आसपास के इलाकों का विस्तृत नजारा दिखाई देता है.
मंदिर में मूर्ति की जगह होती है श्री यंत्र की पूजा
चंद्रबदनी मंदिर की सबसे खास धार्मिक विशेषता यहां गर्भगृह में स्थापित श्री यंत्र है. source के अनुसार, गर्भगृह में माता की मूर्ति के स्थान पर एक श्री यंत्र रखा गया है, जिसे कपड़े के छत्र के नीचे स्थापित किया गया है.
मंदिर के पुजारी और श्रद्धालु इसी श्री यंत्र की पूजा और उपासना करते हैं तथा माता का आशीर्वाद प्राप्त करने की धार्मिक परंपरा निभाते हैं.
श्री यंत्र के अलावा मंदिर परिसर में अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित हैं. मंदिर परिसर में मौजूद त्रिशूल और अन्य मूर्तियां भी यहां के धार्मिक वातावरण का हिस्सा हैं.
टिहरी का तीसरा शक्तिपीठ बताया जाता है
दिए गए विवरण के अनुसार, चंद्रबदनी मंदिर को कुंजापुरी और सुरकंडा मंदिर के बाद टिहरी का तीसरा शक्तिपीठ बताया गया है. यह मंदिर माता सती को समर्पित है.
मंदिर की धार्मिक मान्यता इसे देवी सती की पौराणिक कथा से जोड़ती है. इसी वजह से यहां देश और प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु दर्शन और पूजा के लिए पहुंचते हैं.
स्कंद पुराण से जुड़ी है पौराणिक मान्यता
चंद्रबदनी मंदिर की पौराणिक कथा का संबंध स्कंद पुराण से बताया जाता है. मान्यता के अनुसार, जब माता सती ने अपने पिता दक्ष प्रजापति के महायज्ञ में भगवान शिव के अपमान का विरोध करते हुए अपने प्राण त्याग दिए, तब भगवान शिव उनके जले हुए शरीर को लेकर जा रहे थे.
कथा के अनुसार, इस दौरान माता सती के शरीर के अलग-अलग अंग अलग-अलग स्थानों पर गिरे और वे स्थान सिद्धपीठ बन गए. चंद्रबदनी मंदिर को भी इन्हीं शक्तिपीठों में से एक माना जाता है.
पौराणिक मान्यता के अनुसार, जिस स्थान पर चंद्रबदनी मंदिर स्थित है, वहां भगवान शिव द्वारा माता सती के शरीर को ले जाते समय उनका धड़ गिरा था. इसी स्थान पर उनके कुछ हथियार भी गिरने की मान्यता है.
मंदिर परिसर में दिखाई देते हैं त्रिशूल
पुराणों से जुड़ी मान्यता के अनुसार, जब माता सती का धड़ इस स्थान पर गिरा था, तब माता के कुछ त्रिशूल और मूर्तियां भी यहां गिरी थीं. इसी धार्मिक मान्यता से जुड़े त्रिशूल और मूर्तियां आज भी मंदिर के आसपास दिखाई देती हैं.
मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में स्थापित त्रिशूल इस तीर्थस्थल की पहचान का हिस्सा हैं. इनके साथ मौजूद मूर्तियां भी मंदिर परिसर के धार्मिक स्वरूप को खास बनाती हैं.
अप्रैल में लगता है बड़ा मेला
चंद्रबदनी मंदिर परिसर में हर साल अप्रैल के महीने में बड़ा मेला आयोजित होने की बात कही गई है. यह मेला बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है.
मेले के दौरान मंदिर में धार्मिक गतिविधियां और श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है. मंदिर की धार्मिक मान्यताओं और प्राकृतिक वातावरण के कारण यह स्थान भक्तों के साथ-साथ यहां आने वाले यात्रियों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है.
श्रीनगर और टिहरी से ऐसे पहुंचते हैं
जामनीखाल गांव में स्थित चंद्रबदनी मंदिर श्रीनगर से करीब 52 किलोमीटर और टिहरी से लगभग 57 किलोमीटर की दूरी पर बताया गया है. मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब एक किलोमीटर का trek करना पड़ता है.
ऊंचाई पर स्थित होने के कारण मंदिर तक पहुंचने के दौरान आसपास का प्राकृतिक वातावरण भी यात्रा का हिस्सा बन जाता है. हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियां और घने जंगल यहां के दृश्य को खास बनाते हैं.
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चंद्रबदनी देवी मंदिर इस तरह धार्मिक आस्था, पौराणिक मान्यताओं और हिमालयी प्राकृतिक सुंदरता का अनोखा संगम प्रस्तुत करता है. गर्भगृह में देवी की प्रतिमा के स्थान पर श्री यंत्र की पूजा इसकी सबसे विशिष्ट विशेषताओं में से एक है. यही धार्मिक परंपरा और मंदिर से जुड़ी मान्यताएं इसे उत्तराखंड के प्रमुख आध्यात्मिक स्थलों में एक अलग पहचान देती हैं.


