सौरभ राजपूत हत्याकांड की जांच और मुकदमे में पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती वारदात की हर कड़ी को साक्ष्यों के साथ जोड़ना था. मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था. ऐसे में पुलिस ने गुमशुदगी की शिकायत से लेकर हत्या से जुड़े साक्ष्य जुटाने, आरोपितों की गतिविधियों की पड़ताल करने और गवाहों के बयान दर्ज करने तक कई पहलुओं पर काम किया. मुकदमे की कार्रवाई 64 दिन तक चली, जबकि चार्जशीट में शामिल 22 गवाहों को अदालत में पेश किया गया.
सौरभ की गुमशुदगी और उसकी हत्या की आशंका से शुरू हुई पुलिस की पड़ताल धीरे-धीरे घटना से जुड़ी विभिन्न कड़ियों तक पहुंची. इस मामले में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की अहमियत अधिक थी, क्योंकि पुलिस के सामने हत्या को प्रत्यक्ष रूप से देखने वाले किसी गवाह की जानकारी नहीं थी.
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गुमशुदगी की शिकायत से शुरू हुई पड़ताल
सौरभ की गुमशुदगी और उसकी हत्या की आशंका को लेकर उसके भाई बबलू ने शिकायत की थी. इसके बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की. स्रोत के अनुसार, उस समय साहिल और मुस्कान फरार मिले. पुलिस ने उनके लौटने का इंतजार किया. दोनों के हिमाचल से घर वापस आने के बाद उन्हें हिरासत में ले लिया गया.
इसके बाद पुलिस ने मामले के खुलासे से लेकर विवेचना पूरी होने तक घटनाक्रम से जुड़ी कड़ियों को जोड़ने का प्रयास किया. जांच में हत्या से पहले की तैयारी, वारदात और उसके बाद आरोपितों की गतिविधियों को साक्ष्यों के आधार पर समझने पर ध्यान दिया गया.
मेरठ से मनाली-कसौल तक जोड़ी गईं कड़ियां
तत्कालीन एसएसपी डॉ. विपिन ताडा के अनुसार, पुलिस ने मेरठ से मनाली और कसौल तक घटना से जुड़ी कड़ियों की पड़ताल की. वारदात के बाद साहिल और मुस्कान मनाली तथा कसौल गए थे. पुलिस ने मेरठ से उनके जाने और वापस लौटने तक की गतिविधियों की जांच की.
इस प्रक्रिया में कैमरों में दर्ज गतिविधियों और घटनाक्रम से जुड़े लोगों को जांच का हिस्सा बनाया गया. पुलिस ने अलग-अलग स्थानों से मिली जानकारियों को जोड़कर घटना से पहले और बाद की गतिविधियों की तस्वीर स्पष्ट करने की कोशिश की.
चाकू, गंडासे, ड्रम और सीमेंट की खरीद भी जांच में शामिल
मामले की विवेचना में हत्या में इस्तेमाल किए गए चाकू और गंडासे की खरीद से संबंधित कड़ियों को भी शामिल किया गया. इसके अलावा, शव को छिपाने के लिए इस्तेमाल किए गए ड्रम और सीमेंट की खरीद से जुड़े पहलुओं की पड़ताल की गई.
पुलिस ने घटनाक्रम से जुड़े लोगों के बयान दर्ज किए और उनसे संबंधित साक्ष्यों को चार्जशीट का हिस्सा बनाया. नींद की गोलियों के लिए पर्चा लिखने वाले डॉक्टर और संबंधित दुकानदारों को भी गवाह बनाया गया.
मामले में सौरभ की मां रेनू, भाई बबलू और दोस्त सौरभ की गवाही को भी अहम बताया गया. इन बयानों और अन्य साक्ष्यों के जरिए घटनाक्रम की विभिन्न कड़ियों को अदालत के सामने रखने की कोशिश की गई.
प्रत्यक्षदर्शी नहीं था, इसलिए 22 गवाहों की भूमिका अहम
इस मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं होने के कारण परिस्थितिजन्य साक्ष्यों और गवाहियों का महत्व बढ़ गया था. चार्जशीट में शामिल 22 गवाहों को अलग-अलग समय पर अदालत में पेश किया गया.
पुलिस की कोशिश थी कि घटना से जुड़ी प्रत्येक महत्वपूर्ण कड़ी को अदालत के सामने रखा जाए और जांच में सामने आए तथ्यों को साक्ष्यों के साथ प्रस्तुत किया जाए. हत्या से पहले की तैयारी, वारदात से जुड़े सामान की खरीद और बाद की गतिविधियों से संबंधित जानकारी इसी जांच का हिस्सा रही.
जांच और अभियोजन से जुड़े अधिकारियों की भूमिका
इस मामले की विवेचना और अभियोजन से जुड़े कार्यों में तत्कालीन एसएसपी डॉ. विपिन ताडा, एसपी सिटी आयुष विक्रम सिंह, विवेचक आरके पचौरी, थाने के पैरोकार दिलशाद अहमद और शिवकुमार सिंह की अहम भूमिका बताई गई.
वहीं, जिला शासकीय अधिवक्ता (डीजीसी) कृष्ण कुमार चौबे और सौरभ की ओर से पैरवी करने वाले अधिवक्ता विजय बहादुर सिंह ने अदालत में मुकदमे की कार्रवाई को आगे बढ़ाया.
इस तरह गुमशुदगी की शिकायत से शुरू हुई पड़ताल में पुलिस ने घटनास्थल से जुड़े साक्ष्यों, खरीदारी के रिकॉर्ड और संबंधित लोगों के बयानों को जांच में शामिल किया. 64 दिन तक चले मुकदमे में 22 गवाहों की पेशी इस मामले की न्यायिक प्रक्रिया का अहम हिस्सा रही.
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