नई दिल्ली: दुनिया की राजनीति में एक बार फिर भूचाल आ गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को बड़ा ऐलान करते हुए कहा कि अमेरिका ने ईरान में ‘प्रमुख सैन्य अभियान’ शुरू कर दिए हैं. इस घोषणा के साथ ही उन्होंने अमेरिकी नागरिकों को आगाह किया कि इस संघर्ष में अमेरिकी सैनिकों को नुकसान उठाना पड़ सकता है और जानें भी जा सकती हैं.
ट्रंप ने कहा कि कुछ ही समय पहले अमेरिकी सेना ने ईरान में प्रमुख सैन्य अभियान शुरू किए हैं. हमारा उद्देश्य ईरानी शासन से उत्पन्न खतरों को खत्म कर अमेरिकी लोगों की रक्षा करना है. यह एक क्रूर और भयानक समूह है, जिसकी गतिविधियां सीधे तौर पर अमेरिका और हमारे सहयोगियों के लिए खतरा हैं.
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ट्रुथ सोशल पर संदेश, युद्ध की गंभीर चेतावनी
अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर जारी वीडियो संदेश में ट्रंप ने साफ कहा कि यह फैसला हल्के में नहीं लिया गया है. उन्होंने माना कि युद्ध में अमेरिकी सैनिकों की जान जा सकती है, लेकिन इसे “भविष्य की सुरक्षा के लिए जरूरी कदम” बताया. उनका दावा है कि इस अभियान का मुख्य लक्ष्य ईरान की मिसाइल क्षमताओं को खत्म करना और उसकी नौसैनिक ताकत को कमजोर करना है.
इस्लामिक क्रांतिकारी गार्ड कोर को सीधी चेतावनी
ट्रंप ने ईरान की सेना, खासकर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) को सीधे संबोधित करते हुए आत्मसमर्पण की अपील की. उन्होंने कहा कि जो हथियार डाल देंगे उन्हें माफी दी जाएगी, लेकिन जो नहीं मानेंगे उनके लिए “निश्चित परिणाम” तय हैं. यह बयान दोनों देशों के बीच तनाव को और भड़का सकता है.
कूटनीति विफल, युद्ध का रास्ता
पिछले कुछ हफ्तों से अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर वार्ताएं चल रही थीं. लेकिन ताजा दौर की बातचीत बेनतीजा खत्म हो गई. ट्रंप ने आरोप लगाया कि ईरान ने अपनी “परमाणु महत्वाकांक्षाओं” को छोड़ने का हर मौका ठुकरा दिया.
परमाणु हथियार या सत्ता परिवर्तन?
आधिकारिक तौर पर अमेरिका कहता है कि उसका मकसद सिर्फ ईरान को परमाणु शक्ति बनने से रोकना है.
अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की रिपोर्टों में भी ईरान द्वारा उच्च स्तर तक यूरेनियम संवर्धन की बात सामने आ चुकी है, जिसे अमेरिका वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा मानता है. लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि असली कहानी इससे कहीं बड़ी है.
‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ की चिंता
ईरान मध्य पूर्व में जिन संगठनों का समर्थन करता है, हिज़्बुल्लाह, हमास और हौथिस उन्हें अमेरिका और उसके सहयोगी अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानते हैं. विश्लेषकों का कहना है कि जब तक मौजूदा नेतृत्व सत्ता में है, यह समर्थन खत्म नहीं होगा.
क्या निशाने पर हैं अली खामेनेई?
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका इस नतीजे पर पहुंच चुका है कि 2015 जैसा परमाणु समझौता स्थायी समाधान नहीं है. ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की विचारधारा स्पष्ट रूप से अमेरिका विरोधी रही है. इसी बीच देश के निर्वासित शहजादे रेजा पहलवी का नाम भी चर्चा में है. कूटनीतिक हलकों में अटकलें हैं कि यदि ईरान में सत्ता परिवर्तन की स्थिति बनती है, तो बाहरी समर्थन किसे मिलेगा?
दशकों पुरानी दुश्मनी, खतरनाक मोड़
अमेरिका और ईरान के बीच दुश्मनी नई नहीं है, लेकिन मौजूदा हालात बेहद संवेदनशील हैं. एक ओर परमाणु कार्यक्रम का सवाल है, दूसरी ओर क्षेत्रीय शक्ति संतुलन की लड़ाई. अब दुनिया की निगाहें इस पर टिकी हैं कि यह संघर्ष सीमित सैन्य कार्रवाई तक रहेगा या पूरे मध्य पूर्व को एक बड़े युद्ध की आग में झोंक देगा. यह सिर्फ दो देशों का टकराव नहीं यह वैश्विक राजनीति का वह मोड़ है, जहां एक फैसला आने वाली पीढ़ियों की दिशा तय कर सकता है.


