नई दिल्ली, 12 अगस्त 2026. प्लास्टिक कचरे के दोबारा इस्तेमाल और 3D प्रिंटिंग के लिए सस्ते फिलामेंट की जरूरत को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान राउरकेला के शोधकर्ताओं ने एक नई एक्सट्रूडर प्रणाली विकसित की है. करीब 45,000 रुपये की लागत वाली यह प्रणाली प्लास्टिक कचरे से 3D प्रिंटिंग के लिए मजबूत कंपोजिट फिलामेंट तैयार कर सकती है. संस्थान के शोधकर्ताओं को इस तकनीक के लिए पेटेंट भी मिला है.
इस तकनीक की खासियत यह है कि इसमें पुनर्चक्रित प्लास्टिक के साथ दूसरी सुदृढ़ीकरण सामग्री मिलाकर ऐसा फिलामेंट तैयार किया जा सकता है, जो मजबूत और टिकाऊ हो. इससे एक तरफ नए प्लास्टिक पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है, वहीं दूसरी तरफ प्लास्टिक कचरे के दोबारा उपयोग का रास्ता भी खुलता है.
3D प्रिंटर में फिलामेंट की होती है अहम भूमिका
सामान्य प्रिंटर में जहां स्याही का इस्तेमाल होता है, वहीं 3D प्रिंटर में फिलामेंट का इस्तेमाल किया जाता है. 3D प्रिंटिंग का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है. चिकित्सा क्षेत्र में शरीर के मॉडल और कृत्रिम अंग बनाने से लेकर ड्रोन के पुर्जे, ब्रैकेट, खिलौने और सजावटी सामान तैयार करने तक इसका इस्तेमाल किया जा रहा है.
फिलामेंट की बढ़ती मांग के साथ उसकी कीमत भी एक चुनौती बनी हुई है. अच्छी गुणवत्ता वाला फिलामेंट महंगा होता है, जबकि कमजोर गुणवत्ता वाले फिलामेंट से तैयार वस्तुओं की मजबूती और सटीकता प्रभावित हो सकती है.
प्लास्टिक कचरे से फिलामेंट बनाने की कोशिश में थी चुनौतियां
पुनर्चक्रित प्लास्टिक से फिलामेंट तैयार करने की कोशिश पहले भी की जाती रही है. हालांकि, इस प्रक्रिया में ज्यादा प्रसंस्करण लागत, सामग्री की बर्बादी और तैयार फिलामेंट की कम मजबूती जैसी समस्याएं सामने आती रही हैं.
NIT राउरकेला की नई एक्सट्रूडर प्रणाली इन चुनौतियों को दूर करने की दिशा में विकसित की गई है. प्रणाली में नियंत्रित शीतलन व्यवस्था और PID तापमान नियंत्रक समेत कई घटक लगाए गए हैं. इससे फिलामेंट बनाने की प्रक्रिया पर बेहतर नियंत्रण मिलने की बात कही गई है.
प्रयोगशाला परीक्षण में मिले संतोषजनक परिणाम
संस्थान के अनुसार, प्रयोगशाला परीक्षणों में तैयार किए गए फिलामेंट में संतोषजनक यांत्रिक गुण और अपेक्षित आयामी सटीकता पाई गई.
मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर प्रो. संध्यारानी बिस्वास ने कहा कि यह तकनीक फिलामेंट उत्पादन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति है. उनके अनुसार, इससे बेहतर यांत्रिक गुणों वाले पुर्जे तैयार किए जा सकते हैं और पुनर्चक्रित प्लास्टिक के इस्तेमाल से पर्यावरण को भी फायदा होगा.
केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर प्रो. सुजीत सेन ने कहा कि यह प्रणाली अलग-अलग प्रकार के प्लास्टिक को उपयोगी 3D प्रिंटर फिलामेंट में बदल सकती है.
कई क्षेत्रों में हो सकता है इस्तेमाल
इस तकनीक से तैयार फिलामेंट का इस्तेमाल कई क्षेत्रों में किया जा सकता है. इनमें वाहन और विमान उद्योग के विशेष पुर्जे, इलेक्ट्रॉनिक्स और उपभोक्ता उत्पाद, शैक्षणिक संस्थान और शोध प्रयोगशालाएं शामिल हैं.
इसके अलावा दंत चिकित्सा मॉडल, चिकित्सकीय स्कैफोल्ड, मरीज के अनुसार तैयार किए जाने वाले कृत्रिम अंग, ड्रोन के पुर्जे और अन्य हल्के लेकिन मजबूत उत्पादों में भी इसके इस्तेमाल की संभावना बताई गई है.
प्लास्टिक कचरे से मूल्यवान उत्पाद बनाने की कोशिश
NIT राउरकेला की इस तकनीक का उद्देश्य प्लास्टिक कचरे को फेंकने के बजाय उसका दोबारा इस्तेमाल कर उपयोगी और मूल्यवान उत्पाद तैयार करने की दिशा में काम करना है.
इससे ऐसी चक्रीय व्यवस्था विकसित करने में मदद मिल सकती है, जिसमें प्लास्टिक कचरा दोबारा उत्पादन प्रक्रिया का हिस्सा बन सके. साथ ही 3D प्रिंटिंग के लिए अपेक्षाकृत कम लागत में मजबूत फिलामेंट तैयार करने का विकल्प भी उपलब्ध हो सकता है.
शोधकर्ताओं को मिला पेटेंट
इस तकनीक का पेटेंट प्रो. संध्यारानी बिस्वास, प्रो. सुजीत सेन, जगदीश उदय खाटू, हिमांशु सिंह और किरण सुना ने हासिल किया है.
NIT राउरकेला की यह तकनीक प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन और 3D प्रिंटिंग के लिए फिलामेंट तैयार करने, दोनों क्षेत्रों से जुड़ी जरूरतों को एक साथ संबोधित करने की कोशिश करती है.


