नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के आर्टिकल 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए एक रिटायर्ड कर्मचारी के रिटायरमेंट और पेंशन से जुड़े लाभों को सुरक्षित रखने का आदेश दिया है. कर्मचारी का कम्युनिटी सर्टिफिकेट 25 साल से ज्यादा की सेवा के बाद अमान्य पाया गया था. हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस सुरक्षा का मतलब उनके ‘टोकरे कोली’ अनुसूचित जनजाति से जुड़े दावे को सही या मान्य ठहराना नहीं है.
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने जूनियर इंजीनियर (सिविल) की अपील पर सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया. कर्मचारी को 1994 में ‘टोकरे कोली’ अनुसूचित जनजाति के कम्युनिटी सर्टिफिकेट के आधार पर म्युनिसिपल कॉरपोरेशन ऑफ ग्रेटर मुंबई में नियुक्त किया गया था.
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2020 में जाति प्रमाण पत्र हुआ अमान्य
मामले में कर्मचारी के जाति प्रमाण पत्र की जांच के बाद साल 2020 में स्क्रूटनी कमेटी ने उसे अमान्य घोषित कर दिया था. इसके बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी स्क्रूटनी कमेटी के फैसले को सही ठहराया.
हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ रिटायर्ड कर्मचारी ने सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटिशन यानी SLP दायर की.
अपील की सुनवाई के दौरान कर्मचारी कोर्ट के अंतरिम आदेश के तहत अपनी नौकरी में बना रहा. बाद में उसने 30 जून 2025 को रिटायरमेंट की उम्र पूरी होने पर सेवा से रिटायरमेंट ले लिया.
30 साल से ज्यादा की सेवा को देखते हुए राहत
सुप्रीम कोर्ट ने जाति प्रमाण पत्र को अमान्य घोषित करने वाले स्क्रूटनी कमेटी और हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा. यानी कोर्ट ने कर्मचारी के ‘टोकरे कोली’ ST दावे को स्वीकार नहीं किया.
इसके बावजूद बेंच ने कर्मचारी की लंबी सेवा अवधि को ध्यान में रखते हुए रिटायरमेंट और पेंशन से जुड़े लाभों को सुरक्षित रखने का फैसला किया. कोर्ट ने माना कि कर्मचारी ने 21 अक्टूबर 1994 से 30 जून 2025 तक सेवा की, जो तीन दशकों से अधिक की अवधि है.
बेंच ने कहा कि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए कर्मचारी को उसकी लंबी सेवा के बदले रिटायरमेंट और पेंशन से जुड़े लाभों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए.
आर्टिकल 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट ने इस्तेमाल की विशेष शक्ति
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में संविधान के आर्टिकल 142 के तहत अपनी शक्ति का इस्तेमाल किया. कोर्ट ने आदेश दिया कि कर्मचारी की 21 अक्टूबर 1994 से 30 जून 2025 तक की सेवा को लागू सेवा नियमों के अनुसार रिटायरमेंट और पेंशन से जुड़े लाभों की गणना और भुगतान के सीमित उद्देश्य के लिए सुरक्षित माना जाएगा.
कोर्ट ने इस राहत को विशेष रूप से इसी मामले की परिस्थितियों तक सीमित रखा है.
गलत जाति प्रमाण पत्र के मामलों में भी अदालत दे सकती है राहत
सुनवाई के दौरान ‘सुरेखा बलजोरसिंह ठाकुर बनाम जाति स्क्रूटनी कमेटी और अन्य (2024)’ मामले का हवाला दिया गया. इसके अलावा ‘चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर, फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया और अन्य’ तथा ‘जगदीश बलराम बहिरा और अन्य (2017)’ मामले का भी उल्लेख किया गया.
जगदीश बलराम बहिरा मामले में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने माना था कि आम तौर पर गलत जाति या जनजाति प्रमाण पत्र के आधार पर हासिल की गई नौकरी बरकरार नहीं रहती. हालांकि, उचित मामले में पूरा न्याय करने के लिए सुप्रीम कोर्ट आर्टिकल 142 के तहत अपनी शक्ति का इस्तेमाल कर सकता है.
भविष्य में जाति प्रमाण पत्र के आधार पर नहीं मिलेगा लाभ
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में एक अहम स्पष्टीकरण भी दिया. कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी को दी गई यह सुरक्षा उनके ‘टोकरे कोली’ अनुसूचित जनजाति से संबंधित होने के दावे को सही ठहराने या मान्यता देने के रूप में नहीं देखी जाएगी.
साथ ही कर्मचारी या उनके परिवार का कोई सदस्य इस अमान्य किए गए जाति प्रमाण पत्र के आधार पर भविष्य में किसी लाभ का दावा नहीं कर सकेगा.
इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने एक तरफ जाति प्रमाण पत्र को अमान्य करने वाले फैसले को बरकरार रखा, वहीं दूसरी तरफ कर्मचारी की तीन दशकों से अधिक की सेवा को देखते हुए रिटायरमेंट और पेंशन संबंधी लाभों की सुरक्षा दी.
नतीजतन, कर्मचारी की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया गया.


