UP News: उत्तर प्रदेश का रामपुर शहर अपनी नवाबी तहजीब, लजीज कोरमे और रूहानी शायरी के लिए तो मशहूर है ही लेकिन यहां की फिजाओं में एक और चीज़ की ‘धार’ महसूस की जाती है – वह है विश्वप्रसिद्ध रामपुरी चाकू. एक दौर था जब बॉलीवुड की फिल्मों में विलेन जेब से रामपुरी चाकू निकालकर जब उसकी ‘गरारी’ घुमाता था, तो सिनेमाघरों में तालियां गूंज उठती थीं. आज वही रामपुरी चाकू अपनी पुरानी पहचान को नए और आधुनिक अवतार में ढालकर एक बार फिर चर्चा में है.
चाकू व्यापार की बारीकियों को समझने वाले स्थानीय व्यापारी शहजाद आलम बताते हैं कि रामपुरी चाकू केवल एक औजार नहीं बल्कि रामपुर की धड़कन और यहाँ की विरासत का हिस्सा है. आइए जानते हैं कि वक्त के साथ इस ‘शाही हथियार’ में क्या बदलाव आए हैं और इसकी बनावट में छिपे रहस्य क्या हैं.
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कारीगरी का अनूठा संगम
रामपुरी चाकू की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह किसी कारखाने में मशीनों से नहीं, बल्कि इंसानी हाथों के हुनर से तैयार होता है. शहजाद आलम के अनुसार, मुख्य रूप से रामपुरी चाकू तीन श्रेणियों में बंटा हुआ है-
हाथ से खुलने वाला चाकू: यह सबसे सरल और पारंपरिक रूप है, जिसे सावधानी से हाथ से खींचकर खोला जाता है.
बटन वाला चाकू (द ओल्ड क्लासिक): यह रामपुरी चाकुओं का ‘दादा’ कहा जाता है. बटन दबाते ही बिजली की तेजी से ब्लेड बाहर आता है. इसी ने रामपुर को दुनिया भर में पहचान दिलाई.
गरारी वाला चाकू: यह वह चाकू है, जिसे फिल्मों ने अमर बना दिया. इसे खोलते समय ‘कच-कच’ की जो आवाज आती है, वह इसकी खास मैकेनिज्म (गरारी) की वजह से होती है.
दिलचस्प बात यह है कि इन तीनों चाकुओं को बनाने वाले कारीगर अलग-अलग होते हैं. हाथ से खुलने वाले चाकू की ढलाई अलग होती है, तो गरारी वाले चाकू में लगने वाली तकनीक के लिए गणितीय सटीकता की जरूरत होती है.
लोहे से स्टेनलेस स्टील तक का सफर
वक्त बदला तो रामपुरी चाकू ने भी अपना चोला बदल लिया. पहले ये चाकू साधारण लोहे से बनाए जाते थे. इनमें धार तो बहुत तेज होती थी लेकिन नमी लगते ही जंग (Rust) लग जाती थी, जिससे इनकी उम्र कम हो जाती थी.
शहजाद आलम बताते हैं कि अब ग्राहकों की डिमांड को देखते हुए इन्हें हाई-ग्रेड स्टेनलेस स्टील से बनाया जाने लगा है. इसका फायदा यह है कि अब ये चाकू सालों-साल चमकते रहते हैं और इनमें जंग नहीं लगती. इसके अलावा, नए दौर के चाकुओं का वजन भी पहले से बढ़ाया गया है. भारी वजन के कारण इनकी पकड़ (Grip) बेहतर हुई है और ये पहले से कहीं अधिक मजबूत और प्रभावी हो गए हैं.
नक्काशी ऐसी कि नजर न हटे
रामपुरी चाकू की पहचान सिर्फ उसकी धार से नहीं बल्कि उसके हैंडल (मूंठ) से भी होती है. कारीगर इन हैंडल्स पर ऐसी नक्काशी करते हैं कि ये किसी शो-पीस जैसे लगने लगते हैं. हैंडल बनाने के लिए ब्रास (पीतल), सिल्ली और शुद्ध स्टील का इस्तेमाल किया जाता है.
कलाकारी: पीतल के हैंडल पर बारीक फूलों और पारंपरिक रूपांकनों को उकेरा जाता है. कुछ खास चाकुओं में हड्डियों और सींगों का इस्तेमाल भी उनकी खूबसूरती बढ़ाने के लिए किया जाता रहा है.
जानिए कैसा था बटन वाला ‘पहला’ चाकू
इतिहासकारों की मानें तो रामपुरी चाकू का विकास नवाबी दौर में शिकार और आत्मरक्षा के उद्देश्य से हुआ था. इसकी शुरुआत बटन वाले चाकू से हुई थी. इसे रामपुर के उस्ताद कारीगरों ने सबसे पहले डिजाइन किया था. इसकी मैकेनिज्म इतनी शानदार थी कि देखते ही देखते यह पूरे उत्तर भारत में रसूख और सुरक्षा का प्रतीक बन गया. आज भी पुराने लोग बटन वाले चाकू को ही ‘असली रामपुरी’ की संज्ञा देते हैं.
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विरासत को बचाने की जद्दोजहद
आज भले ही आधुनिक तकनीक आ गई हो, लेकिन रामपुर के तंग गलियों में बैठे कारीगर आज भी अपनी पुरानी परंपरा को जीवित रखे हुए हैं. उत्तर प्रदेश सरकार की ‘एक जनपद-एक उत्पाद’ योजना ने भी इस शिल्प को नई संजीवनी दी है. अब रामपुरी चाकू सिर्फ लड़ाई-झगड़े का प्रतीक नहीं बल्कि रामपुर के शिल्प कौशल का एक बेहतरीन ‘स्मृति चिन्ह’ बन चुका है.
अगर आप कभी रामपुर जाएं, तो इस नवाबी शान को देखना न भूलें क्योंकि यह चाकू नहीं, लोहे और स्टील पर लिखी गई रामपुर की गौरवशाली गाथा है.
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