Ayodhya News: अयोध्या स्थित डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के व्यवसाय प्रबंधन एवं उद्यमिता विभाग तथा श्रीराम शोधपीठ के संयुक्त तत्वावधान में पीएम-उषा योजना के अंतर्गत एक भव्य आयोजन किया गया. संत कबीर सभागार में “प्रबंधन में भारतीयता: भारतीय ज्ञान परंपरा का समकालीन महत्व” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का माँ सरस्वती की प्रतिमा पर मुख्य अतिथियों द्वारा माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन के साथ उद्घाटन हुआ. उपस्थित सभी अतिथियों को स्मृति चिन्ह एवं पुष्प गुच्छ भेंट कर स्वागत किया गया. कार्यक्रम में देश के प्रख्यात प्रबंधन शिक्षाविद प्रो. एस. एस. खनका मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे. नाका हनुमानगढ़ी के महंत रामदास एवं महंत राजूदास ने विशिष्ट अतिथि के रूप में रहे. कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. बिजेंद्र सिंह ने की.
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अध्यक्षीय संबोधन में कुलपति प्रो. बिजेंद्र सिंह ने भारतीय ज्ञान और सनातन संस्कृति को प्रबंधन का मूल आधार बताया. उन्होंने कहा कि प्रबंधन की सहजता ही इसका असली मूलमंत्र है और हमारी सनातन परंपरा इसका सबसे उत्कृष्ट उदाहरण है. आज से 2000 वर्ष पूर्व आदि शंकराचार्य जी द्वारा चारों दिशाओं में मठ-मंदिरों की स्थापना और शिक्षा की जो व्यवस्था की गई थी, वह भारतीय संस्कृति की उस अद्भुत प्रबंधकीय शक्ति का प्रमाण है, जिसे आज की आधुनिक व उच्च वैज्ञानिक तकनीक से भी हासिल करना संभव नहीं है.
कुलपति ने अयोध्या की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की यह पावन भूमि सदियों से गुरुकुल, ज्ञान और आचार्य परंपरा का केंद्र रही है, जिसने पूरी दुनिया को सही मायनों में प्रबंधन सिखाया है. उन्होंने विद्यार्थियों का आह्वान करते हुए कहा कि वे स्वयं को हर परिस्थिति के अनुरूप ढालें. शिक्षकों को चाहिए कि वे छात्र-छात्राओं को ‘टास्क ओरिएंटेड असाइनमेंट’ दें, ताकि वे व्यावहारिक रूप से समर्थवान और आत्मनिर्भर बन सकें.
मुख्य अतिथि प्रो. एस. एस. खनका ने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि जिस प्रकार सही प्रबंधन और कठिन परिश्रम से एक बेडौल पत्थर को भी सुंदर प्रतिमा में बदला जा सकता है, ठीक वैसे ही मनुष्य अपने जीवन को संवार सकता है. हर व्यक्ति को दूसरों की नकल करने के बजाय खुद का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए. अपने अंतःकरण को शुद्ध रखकर, सकारात्मक सोच के साथ आप जहाँ हैं, वहीं से शुरुआत करें.
विशिष्ट अतिथि महंत रामदास ने कहा कि प्रबंधन में ‘धैर्य’ सबसे महत्वपूर्ण गुण है. भगवान राम का जीवन इसका आदर्श है, जिन्होंने लंका अभियान के दौरान जिसकी जहाँ आवश्यकता थी, वहाँ के लोगों को जोड़कर उनका सहयोग लिया. उन्होंने जोर दिया कि आवश्यकता से अधिक संसाधन जुटाने की होड़ नहीं होनी चाहिए. विश्वविद्यालय को स्वयं में आत्मनिर्भर बनते हुए युवाओं में संस्कारों का सृजन करना होगा. विशिष्ट अतिथि महंत राजूदास ने रेखांकित किया कि भारत की ज्ञान परंपरा की तुलना दुनिया के किसी अन्य देश से नहीं की जा सकती. भारत ने ही पूरे विश्व को ‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (विश्व बंधुत्व) का सच्चा प्रबंधकीय संदेश दिया है.
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कार्यक्रम की शुरुआत में वाणिज्य संकाय के अध्यक्ष प्रो. शैलेंद्र कुमार वर्मा ने सभी अतिथियों का भव्य स्वागत किया और संगोष्ठी की रूपरेखा रखी. उन्होंने बताया कि इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में 227 प्रतिभागियों ने पंजीयन कराया है. कार्यक्रम के समापन पर आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ के निदेशक प्रो. हिमांशु शेखर सिंह ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया. उन्होंने भारत के प्राचीन कृषि प्रबंधन का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत अनादि काल से ही उत्कृष्ट व्यवस्थाओं का केंद्र बिंदु रहा है. मंच संचालन डॉ. मनीषा यादव ने किया. दो दिवसीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में प्रो एसएस मिश्र, अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो. नीलम पाठक, प्रो. शैलेंद्र कुमार, प्रो. सिद्धार्थ शुक्ल, प्रो. फर्रुख जमाल, डॉ. महेंद्र पाल सिंह, डॉ. राकेश कुमार के साथ अन्य शिक्षकगण, शोधार्थी एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे.


