Ayodhya News: राज्य सरकार के निर्देशों के क्रम में डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के नवीन परिसर में एक बृहद वृक्षारोपण अभियान का आयोजन किया गया. पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक अनूठी पहल करते हुए कुलपति डॉ. बिजेंद्र सिंह की अध्यक्षता में परिसर में ‘मियावाकी गार्डन’ का भव्य उद्घाटन किया गया. लगभग 3200 वर्ग मीटर क्षेत्र में विकसित होने वाले इस विशेष उद्यान में स्थानीय जैवविविधता का पूरा ध्यान रखा जा रहा है, जिससे बेहद कम समय में एक सघन वन क्षेत्र तैयार हो सकेगा.
रिसर्च के लिए ‘लिविंग ग्रीन लेबोरेटरी’ बनेगा यह वन
यह मियावाकी वन केवल वृक्षारोपण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे एक ‘लिविंग ग्रीन लेबोरेटरी’ (जीवंत हरित प्रयोगशाला) के रूप में विकसित किया जाएगा. यहाँ विश्वविद्यालय के छात्र और शोधकर्ता पर्यावरण विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, प्राणी विज्ञान, कृषि, सिविल इंजीनियरिंग, जैव विविधता, जलवायु परिवर्तन, कार्बन पृथक्करण (Carbon Sequestration) तथा पारिस्थितिकी जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर गहन अध्ययन एवं शोध कर सकेंगे.
हर मौसम में महकेगा परिसर: 11,500 से अधिक पौधों का लक्ष्य
इस विशेष वन में लगभग 3 से 5 पौधे प्रति वर्गमीटर की सघनता से रोपे जा रहे हैं, जिसके तहत कुल 10,000 से 11,500 पौधे लगाने का अनुमान है. पौधों का रोपण ‘यादृच्छिक मिश्रित पद्धति’ (Random Mixed Plantation) से किया जाएगा, जिससे पौधों में प्राकृतिक वन जैसी प्रतिस्पर्धा होगी और वे सामान्य की तुलना में कई गुना तेजी से बढ़ेंगे. वन को साल के बारह महीने रंग-बिरंगा बनाए रखने के लिए मौसम के अनुकूल प्रजातियों का चयन किया गया है.
वसंत ऋतु: कचनार, पलाश एवं अमलतास
ग्रीष्म ऋतु: गुलमोहर, कदम्ब एवं चम्पा
वर्षा ऋतु: मधुमालती एवं क्लेरोडेन्ड्रम
शीत ऋतु: बोगनवेलिया, गुड़हल और इक्सोरा
औषधीय पौधों और प्राकृतिक सौंदर्य का संगम
वन के निचले स्तर पर तुलसी, लेमनग्रास, एलोवेरा, अश्वगंधा, ब्राह्मी, गिलोय, पुदीना और वेटीवर (खस) जैसी औषधीय झाड़ियाँ लगाई जाएँगी. मिट्टी के कटाव को रोकने और नमी बनाए रखने के लिए वेडेलिया और मनी प्लांट जैसी ग्राउंड कवर वनस्पतियाँ बिछाई जाएँगी. पूरे क्षेत्र को इको-फ्रेंडली बांस की बाड़ (Bamboo Fencing) और आकर्षक तोरण (Arch) से सजाया जाएगा.
जो वृक्षों की रक्षा करते हैं, वृक्ष उनकी रक्षा करते हैं- कुलपति
अभियान को संबोधित करते हुए कुलपति डॉ. बिजेंद्र सिंह ने कहा कि वन प्रकृति द्वारा मानव सभ्यता को दिया गया सबसे अनमोल उपहार हैं, जिसके बिना जीवन की कल्पना असंभव है. उन्होंने मियावाकी तकनीक की सराहना करते हुए कहा कि यह जापानी तकनीक कम जगह में पारंपरिक वनों की तुलना में 10 गुना तेजी से बढ़ती है और 30 गुना अधिक सघन होती है. हम अपनी समृद्ध भारतीय सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक विज्ञान से जोड़कर आगे बढ़ रहे हैं. हमारे वेदों-पुराणों में भी वनों को पूजनीय माना गया है. कुलपति ने विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं और शिक्षकों से आवाहन किया कि वे केवल पौधे न लगाएं, बल्कि कम से कम एक पौधा गोद लेकर उसके संरक्षण की जिम्मेदारी उठाएं.
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विश्वविद्यालय परिवार ने लिया सामूहिक संकल्प
इस महा-अभियान में विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायों के डीन, विभागाध्यक्षों, शिक्षकों, अधिकारियों, कर्मचारियों और हजारों की संख्या में छात्र-छात्राओं ने पूरे उत्साह के साथ प्रतिभाग किया. सभी ने मिलकर परिसर को हरा-भरा बनाने और प्रकृति संरक्षण का सामूहिक संकल्प लिया.


