Sonipat old age home case: हरियाणा के सोनीपत से रिश्तों को झकझोर देने वाला मामला सामने आया है. एक वृद्धाश्रम में रहने वाले 74 वर्षीय बुजुर्ग की मौत के बाद उनकी तीनों बेटियां अंतिम संस्कार में शामिल होने नहीं पहुंचीं. अंतिम संस्कार से लेकर अस्थि विसर्जन तक बेटियां वीडियो कॉल के जरिए जुड़ी रहीं. हैरानी की बात यह है कि पिता की मौत के 13 दिन बाद आयोजित तेरहवीं में भी तीनों बेटियों में से कोई नहीं पहुंची. मृतक की पहचान शिवचरण राम रतन गुप्ता के रूप में हुई है. वह मुंबई के पूर्व कपड़ा व्यापारी थे और पिछले कुछ वर्षों से सोनीपत के एक वृद्धाश्रम में रह रहे थे. 4 अगस्त को बीमारी के बाद उनकी मौत हो गई.
बेटियां अंतिम संस्कार में नहीं पहुंचीं
शिवचरण गुप्ता की तीन बेटियां हैं. बताया गया कि एक बेटी नेपाल, दूसरी आजमगढ़ और तीसरी मुंबई में रहती है. पिता के बीमार होने की जानकारी वृद्धाश्रम प्रबंधन ने पहले ही तीनों बेटियों को दे दी थी. हालांकि, समय की कमी का हवाला देते हुए उन्होंने सोनीपत आने में असमर्थता जताई. पिता की मौत के बाद भी कोई बेटी अंतिम संस्कार में शामिल होने नहीं पहुंची. वृद्धाश्रम प्रबंधन की ओर से उनका अंतिम संस्कार कराया गया. इस दौरान तीनों बेटियां वीडियो कॉल के जरिए अंतिम संस्कार से जुड़ीं. बाद में अस्थि विसर्जन के दौरान भी बेटियां वीडियो कॉल पर ही मौजूद रहीं.
13वीं में भी नहीं आईं बेटियां
मामला तब और भावुक हो गया जब 13 दिन बाद शिवचरण गुप्ता की तेरहवीं आयोजित की गई. इस कार्यक्रम में भी उनकी तीनों बेटियों में से कोई नहीं पहुंची. वृद्धाश्रम के संचालक आनंद कुमार के मुताबिक, बेटियों ने पहले ही तेरहवीं में शामिल होने से मना कर दिया था. इसके बाद सामाजिक संस्थाओं और स्थानीय लोगों की मदद से तेरहवीं की सभी रस्में पूरी की गईं. कार्यक्रम के बाद समाज के लोगों ने प्रसाद भी वितरित किया.
बड़ी बेटी ने भेजे थे 5100 रुपये
आनंद कुमार ने बताया कि मृतक की बड़ी बेटी ने अंतिम संस्कार के लिए 5,100 रुपये भेजे थे. हालांकि, वृद्धाश्रम प्रबंधन ने वह राशि वापस कर दी. वृद्धाश्रम संचालक और स्थानीय प्रबुद्ध लोगों ने इस घटना पर चिंता जताते हुए कहा कि बुजुर्गों की इस तरह की उपेक्षा समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है. उनका कहना है कि आधुनिक जीवन की व्यस्तता के बीच बुजुर्गों के प्रति जिम्मेदारी और संवेदनशीलता को नहीं भूलना चाहिए. शिवचरण गुप्ता की कहानी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जिस पिता ने पूरी जिंदगी अपनी संतानों को पालने में लगा दी, क्या जीवन के आखिरी पड़ाव पर उन्हें अपनों की मौजूदगी के लिए भी तरसना चाहिए?


