सरकार की BioE3 यानी Biotechnology for Economy, Environment and Employment नीति के तहत जीवाश्म आधारित इनपुट के विकल्प के तौर पर जैव-आधारित उत्पाद विकसित करने और देश में जैव-विनिर्माण को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है. इस पहल का उद्देश्य पर्यावरणीय स्थिरता के साथ घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना और कम कार्बन वाली अर्थव्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ना है.
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) ने BioE3 नीति के तहत जैव-आधारित उत्पादों के विकास और बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए तकनीकी विकास, उत्पादन क्षमता, उपज और Technology Readiness Level (TRL) से जुड़े मापनीय लक्ष्य तय किए हैं.
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जैव-आधारित विकल्पों को बढ़ावा देने पर जोर
BioE3 नीति के तहत ऐसे जैव-विनिर्माण समाधानों को विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है, जो जीवाश्म आधारित इनपुट की जगह इस्तेमाल किए जा सकें. DBT ने ऐसी परियोजनाओं को सहायता भी दी है, जिनका उद्देश्य जीवाश्म आधारित इनपुट के लिए भारत की आयात निर्भरता को कम करना है.
तकनीक से उत्पादन तक बढ़ाने की कोशिश
इस नीति के तहत सिर्फ अनुसंधान पर ही नहीं, बल्कि तकनीकी विकास, उत्पादन क्षमता और बड़े पैमाने पर उत्पादन पर भी ध्यान दिया जा रहा है. इसके लिए अलग-अलग परियोजनाओं में उत्पादन क्षमता, उपज और Technology Readiness Level जैसे मानकों को शामिल किया गया है.
‘सुजीविका’ पोर्टल से स्वदेशी उत्पादों की पहचान
DBT ने जैव-प्रौद्योगिकी से जुड़े आयात के आंकड़ों तक पहुंच उपलब्ध कराने के लिए डिजिटल पोर्टल ‘सुजीविका’ शुरू किया है. इस पोर्टल से आयात संबंधी आंकड़ों के आधार पर स्वदेशी जैव-आधारित उत्पादों की पहचान करने में मदद मिलती है.
आयात पर निर्भरता कम करने का लक्ष्य
‘सुजीविका’ के जरिए उपलब्ध आंकड़ों का इस्तेमाल घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने और आयातित रसायनों, सामग्रियों तथा जीवाश्म आधारित रसायनों, सामग्रियों और ईंधनों पर निर्भरता कम करने की दिशा में किया जा रहा है.
यह पहल आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य के अनुरूप घरेलू जैव-आधारित उत्पादन को बढ़ावा देने से भी जुड़ी है.
कृषि और औद्योगिक कचरे से बनेंगे ईंधन और औद्योगिक सामग्री
DBT ने कृषि अवशेषों, नगरों से निकलने वाले जैविक कचरे और औद्योगिक जैविक कचरे को उपयोगी उत्पादों में बदलने के लिए अनुसंधान, पायलट स्तर और प्रदर्शन परियोजनाओं को समर्थन दिया है.
बायोमास से उन्नत ईंधन और रसायन
इन परियोजनाओं में कृषि और अन्य जैविक कचरे को उन्नत ईंधन, रसायनों और औद्योगिक उपयोग की सामग्रियों में बदलने पर काम किया जा रहा है.
इसके लिए बायोमास प्री-ट्रीटमेंट, बायोकैटेलिस्ट, माइक्रोबियल बायोप्रोसेस और एकीकृत बायोरिफाइनरी प्लेटफॉर्म जैसी स्वदेशी तकनीकों के विकास पर जोर दिया गया है.
इन तकनीकों का उद्देश्य अलग-अलग प्रकार के बायोमास का ज्यादा प्रभावी इस्तेमाल करना और जैव-विनिर्माण मूल्य श्रृंखला में स्थिरता को शामिल करना है.
कार्बन उत्सर्जन कम करने वाली तकनीकों पर फोकस
सरकार ने तकनीकी विशेषज्ञ समितियों, विषय आधारित विशेषज्ञ समूहों और विभिन्न हितधारकों के साथ परामर्श के जरिए ऐसी जैव-प्रौद्योगिकी आधारित तकनीकों और हस्तक्षेपों की पहचान की है, जो भारत के कार्बन उत्सर्जन को कम करने और नेट-जीरो प्रतिबद्धताओं में योगदान दे सकते हैं.
Bio-Enablers और Bio-AI Hubs पर काम
BioE3 नीति को संबंधित मंत्रालयों और विभागों के बीच समन्वय के जरिए लागू किया जा रहा है. इसका उद्देश्य अलग-अलग सरकारी विभागों के प्रयासों के बीच तालमेल बनाना है.
DBT संबंधित मंत्रालयों और विभागों के साथ मिलकर Bio-Enablers जैसे बायोफाउंड्री और Bio-AI Hubs विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है.
इनका इस्तेमाल जैव-विनिर्माण के लिए जरूरी क्षमता बढ़ाने, बायोमास सप्लाई चेन मजबूत करने, तकनीकी विकास और उत्पादन बढ़ाने तथा उच्च मूल्य वाले रसायनों, APIs, एंजाइम और स्मार्ट प्रोटीन की पहचान और व्यावसायीकरण के लिए किया जाएगा.
सर्कुलर बायोइकोनॉमी को बढ़ावा
BioE3 नीति सर्कुलर इकोनॉमी और नेट-जीरो उत्सर्जन के सिद्धांतों के अनुरूप जैव-विनिर्माण समाधानों के विकास और प्रदर्शन के लिए मंच उपलब्ध कराती है. इसमें पायलट और प्री-कमर्शियल स्तर की तकनीकों पर काम किया जा रहा है.
कचरे को मूल्यवान उत्पादों में बदलने पर जोर
नीति का एक प्रमुख उद्देश्य जीवाश्म आधारित इनपुट के विकल्प तैयार करना और कम कार्बन वाली अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना है.
पर्यावरणीय परिणामों और सर्कुलर बायोइकोनॉमी की दिशा में प्रगति को मापने के लिए कई संकेतकों पर ध्यान दिया जा रहा है. इनमें भूमि उपयोग को कम करना, नवीकरणीय संसाधनों को बढ़ावा देना, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करना, कचरे को मूल्यवान उत्पादों में बदलना और स्वदेशी क्लीन-टेक समाधान विकसित करना शामिल है.
कई क्षेत्रों में जैव-तकनीकी हस्तक्षेप
DBT ने पर्यावरणीय लक्ष्यों के अनुरूप कई प्रमुख पहलों को समर्थन दिया है. इनमें सुंदरबन जैसे क्षतिग्रस्त पारिस्थितिकी तंत्र का जैव-पुनर्स्थापन और संरक्षित क्षेत्रों के संरक्षण के लिए आणविक तकनीकों का इस्तेमाल शामिल है.
प्लास्टिक के विकल्प विकसित करने पर भी काम
सिंगल-यूज प्लास्टिक और पॉलिमर के विकल्प विकसित करने के लिए भी जैव-प्रौद्योगिकी आधारित समाधानों पर काम किया जा रहा है.
इसके अलावा लिग्नोसेल्यूलोसिक, औद्योगिक और जैविक कचरे को Sustainable Aviation Fuel, विशेष रसायनों और बायोमटेरियल में बदलने की तकनीकों पर भी काम हो रहा है.
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कार्बन कैप्चर और इंजीनियर्ड एंजाइम पर जोर
कचरे से मूल्यवान उत्पाद तैयार करने के लिए इंजीनियर्ड एंजाइम और Carbon Capture, Utilisation जैसी तकनीकों को भी समर्थन दिया जा रहा है. इसके साथ एकीकृत जैव-विनिर्माण समाधानों के विकास पर भी ध्यान दिया जा रहा है.
BioE3 नीति के जरिए सरकार जैव-प्रौद्योगिकी के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण, आर्थिक विकास और रोजगार सृजन को एक साथ आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है. इसके तहत जैव-आधारित उत्पादन को बढ़ावा देने, जीवाश्म आधारित संसाधनों पर निर्भरता कम करने और कम कार्बन वाली अर्थव्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ने पर जोर है.
यह जानकारी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने गुरुवार को राज्यसभा में लिखित उत्तर में दी.


