वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार चौथे कारोबारी सत्र में गिरावट जारी है. गुरुवार को ब्रेंट क्रूड 94 डॉलर प्रति बैरल से नीचे फिसल गया, जबकि अमेरिकी WTI क्रूड भी 87 डॉलर के स्तर से नीचे पहुंच गया. अमेरिकी मिडटर्म चुनावों के नतीजों और ईरान के साथ तनाव कम होने की संभावनाओं ने तेल बाजार पर दबाव बढ़ा दिया है. इसके अलावा, होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की सप्लाई में सुधार के संकेत मिलने से भी कीमतों में गिरावट आई है.
इस बीच भारतीय रुपये में भी मजबूती देखने को मिली. रुपया लगातार पांचवें कारोबारी सत्र में मजबूत हुआ और गुरुवार को 29 पैसे की बढ़त के साथ 94.35 प्रति डॉलर पर खुला. इससे पहले बुधवार को यह 94.64 प्रति डॉलर के स्तर पर बंद हुआ था.
ब्रेंट क्रूड और WTI की कीमतों में कितनी गिरावट?
गुरुवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड करीब 1 प्रतिशत गिरकर 93.65 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. वहीं, अमेरिकी WTI क्रूड की कीमत 1.36 प्रतिशत टूटकर 86.92 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करती दिखाई दी.
इससे पहले बुधवार को दोनों प्रमुख बेंचमार्क में 8 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई थी. दोनों अगस्त के अंत के बाद के सबसे निचले स्तर पर बंद हुए थे. इस सप्ताह अब तक कच्चे तेल की कीमतों में करीब 16 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी है. यह हाल के वर्षों की सबसे तेज साप्ताहिक गिरावटों में से एक मानी जा रही है.
अमेरिकी चुनाव नतीजों से ईरान पर सैन्य कार्रवाई की आशंका कम
तेल की कीमतों में गिरावट की एक बड़ी वजह अमेरिका के मिडटर्म चुनावों के बाद बदलते राजनीतिक हालात को माना जा रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक, डेमोक्रेटिक पार्टी को अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों में बड़ी बढ़त मिली है.
बाजार के निवेशकों का मानना है कि इस राजनीतिक स्थिति में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए ईरान के खिलाफ आक्रामक सैन्य कार्रवाई करना पहले की तुलना में मुश्किल हो सकता है. इससे दोनों देशों के बीच कूटनीतिक समाधान निकलने की उम्मीद बढ़ी है.
रिपोर्ट्स के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप ने भी संकेत दिया है कि फिलहाल अमेरिका की ओर से ईरान पर तत्काल हमला करने की कोई योजना नहीं है. वहीं, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी युद्ध की उपयोगिता पर सवाल उठाए हैं.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी नतीजों के बाद अमेरिकी प्रशासन पर कूटनीतिक रास्ता तलाशने का दबाव बढ़ सकता है. इसी उम्मीद के कारण निवेशकों ने तेल बाजार में बिकवाली की है. इससे कीमतों में शामिल भू-राजनीतिक जोखिम प्रीमियम भी कम हुआ है.
होर्मुज स्ट्रेट से तेल सप्लाई में सुधार के संकेत
पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की उम्मीदों के साथ तेल की सप्लाई को लेकर भी राहत के संकेत मिले हैं. होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आपूर्ति लगभग युद्ध-पूर्व स्तरों के करीब पहुंचने लगी है.
होर्मुज स्ट्रेट वैश्विक तेल सप्लाई के लिहाज से बेहद अहम समुद्री रास्ता है. यहां किसी भी तरह की बाधा से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की उपलब्धता और कीमतों पर असर पड़ सकता है. अब इस रास्ते से सप्लाई में सुधार के संकेत मिलने से बाजार की चिंताएं कम हुई हैं.
जब बाजार को लगता है कि तेल की सप्लाई सामान्य हो सकती है और किसी बड़े सैन्य टकराव का खतरा घट रहा है, तो कीमतों पर दबाव बढ़ जाता है. मौजूदा गिरावट में भी यही दोनों परिस्थितियां अहम मानी जा रही हैं.
तेल की मांग और भंडार को लेकर तस्वीर पूरी तरह कमजोर नहीं
कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट के बावजूद मांग और भंडार से जुड़े कुछ संकेत बाजार के लिए महत्वपूर्ण हैं. प्रमुख उपभोक्ता देशों में वाणिज्यिक तेल भंडार पिछले 15 वर्षों के निचले स्तर के करीब बताए जा रहे हैं.
अमेरिका में भी पिछले सप्ताह कच्चे तेल, पेट्रोल और डिस्टिलेट के भंडार में कमी आई है. इसके साथ ही अमेरिकी तेल मांग एक साल के उच्च स्तर पर पहुंची है.
इससे संकेत मिलता है कि तेल बाजार की स्थिति केवल कीमतों में गिरावट से तय नहीं हो रही. एक तरफ पश्चिम एशिया में तनाव कम होने और सप्लाई बेहतर होने की उम्मीदें हैं, तो दूसरी तरफ कम भंडार और मजबूत मांग का दबाव भी मौजूद है.
क्या कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट जारी रहेगी?
फिलहाल तेल बाजार में निवेशकों की नजर अमेरिका और ईरान के बीच आगे बनने वाले हालात पर है. अगर तनाव कम होता है और होर्मुज स्ट्रेट से सप्लाई सामान्य बनी रहती है, तो कीमतों पर दबाव जारी रह सकता है.
हालांकि, प्रमुख देशों में तेल भंडार का निचले स्तर के करीब होना और अमेरिका में मांग का एक साल के उच्च स्तर पर पहुंचना गिरावट को सीमित कर सकता है. इसलिए मौजूदा हालात में यह कहना जल्दबाजी होगी कि कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज गिरावट लंबे समय तक बनी रहेगी.
यह भी पढ़ें- मुंबई में 14 इंटरनेशनल रूट की उड़ानें होंगी शिफ्ट, नवी मुंबई एयरपोर्ट से भरेंगी उड़ान, जानें किन देशों पर पड़ेगा असर


