नई दिल्ली: देश में लाखों युवा IAS और IPS बनने का सपना देखते हैं. इसके लिए कई लोग बड़े शहरों में जाकर सालों तक तैयारी करते हैं, लेकिन बहुत कम लोग ही इस कठिन परीक्षा में सफलता हासिल कर पाते हैं. इसी बीच उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा गांव अपनी अनोखी पहचान के कारण पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है.
माधोपट्टी नाम का यह गांव अपनी आबादी या आकार से नहीं, बल्कि अपने अफसरों की लंबी सूची के लिए मशहूर है. करीब 75 घरों वाले इस गांव से अब तक 50 से अधिक IAS, IPS और PCS अधिकारी निकल चुके हैं. यही वजह है कि लोग इस गांव को ‘IAS की फैक्ट्री’ कहकर बुलाते हैं.
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प्रशासनिक सेवाओं में बनाया खास मुकाम
जौनपुर जिले में स्थित यह छोटा सा गांव लखनऊ से लगभग 300 किलोमीटर दूर है. हैरानी की बात यह है कि इतनी छोटी आबादी के बावजूद यहां से दर्जनों लोग देश की शीर्ष प्रशासनिक सेवाओं तक पहुंचे हैं. गांव के कई लोग न केवल प्रशासनिक सेवाओं में बल्कि विज्ञान, बैंकिंग, न्यायपालिका और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में भी अहम पदों पर कार्य कर चुके हैं. यहां के लोग ISRO, भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर और विश्व बैंक जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं.
1952 से शुरू हुआ अफसर बनने का सिलसिला
माधोपट्टी में अफसर बनने की परंपरा दशकों पुरानी है. गांव के पहले IAS अधिकारी डॉ. इंदुप्रकाश थे, जिन्होंने 1952 में UPSC परीक्षा में दूसरी रैंक हासिल की थी. बाद में वे फ्रांस समेत कई देशों में भारत के राजदूत भी रहे.
इसके बाद 1955 में विनय कुमार सिंह IAS बने और उन्होंने परीक्षा में 13वीं रैंक हासिल की. आगे चलकर वे बिहार के मुख्य सचिव भी बने. 1964 में छत्रपाल सिंह और अजय कुमार सिंह IAS बने, जबकि 1968 में शशिकांत सिंह ने भी प्रशासनिक सेवा में जगह बनाई.
एक ही परिवार के कई IAS
डॉ. इंदुप्रकाश के परिवार ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाया. उनके ही परिवार के चार भाइयों ने IAS बनकर गांव का नाम रोशन किया, जिसकी चर्चा आज भी पूरे देश में होती है. बाद की पीढ़ियों में भी यह सिलसिला जारी रहा. डॉ. इंदुप्रकाश के बेटे यशस्वी ने 2002 में UPSC में 31वीं रैंक हासिल कर IAS बने. वहीं अमिताभ सिंह 1994 में IAS बने और बाद में नेपाल में भारत के राजदूत भी रहे.
महिलाओं ने भी दिखाई ताकत
माधोपट्टी की एक खास बात यह भी है कि यहां की महिलाओं ने भी प्रशासनिक सेवाओं में अपनी मजबूत पहचान बनाई है. 1980 में आशा सिंह, 1982 में ऊषा सिंह और 1983 में इंदु सिंह प्रशासनिक सेवाओं में चयनित हुईं. वहीं अमिताभ सिंह की पत्नी सरिता सिंह IPS अधिकारी बनीं.
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पढ़ाई को मिलती है सबसे ज्यादा अहमियत
स्थानीय लोगों के अनुसार गांव में खेती बहुत कम होती है, इसलिए परिवारों का पूरा ध्यान बच्चों की पढ़ाई पर रहता है. यही वजह है कि यहां शिक्षा को सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता है. माधोपट्टी के बारे में एक कहावत भी मशहूर है कि यहां विद्या की देवी मां सरस्वती का वास है.शायद यही कारण है कि इस छोटे से गांव के बच्चों के सपनों में आज भी IAS और IPS बनने की चाह सबसे ऊपर दिखाई देती है.


