केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने दवाओं की मैन्युफैक्चरिंग क्वालिटी और सेफ्टी को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम उठाया है. मंत्रालय ने 28 अक्टूबर को G.S.R. नंबर 953(E) के जरिए ड्रग्स रूल्स, 1945 के शेड्यूल M में संशोधन का प्रस्ताव दिया है. इस बदलाव का संबंध स्टेराइल फार्मास्यूटिकल प्रोडक्ट्स बनाने वाली यूनिट्स के ग्रेड A क्लीन एरिया में माइक्रोबियल कंटैमिनेशन की लिमिट से है.
इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य भारत के मौजूदा रेगुलेटरी नियमों को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाना है. इससे स्टेराइल दवाओं के निर्माण के दौरान माइक्रोबियल कंट्रोल और क्वालिटी स्टैंडर्ड्स को और मजबूत करने में मदद मिल सकती है.
ड्रग्स रूल्स के शेड्यूल M में क्या बदलाव प्रस्तावित है?
स्वास्थ्य मंत्रालय ने ड्रग्स रूल्स, 1945 के शेड्यूल M में बदलाव का प्रस्ताव दिया है. इसके तहत स्टेराइल फार्मास्यूटिकल प्रोडक्ट्स के लिए गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिस (GMP) से जुड़े नियमों में संशोधन किया जाएगा.
प्रस्ताव WHO की टेक्निकल रिपोर्ट सीरीज (TRS) नंबर 1044 के एनेक्सर 2 में दी गई गाइडलाइंस के आधार पर तैयार किया गया है. इसका खास फोकस ग्रेड A क्लीन एरिया में माइक्रोबियल कंटैमिनेशन की तय लिमिट को WHO के मानकों के अनुरूप करने पर है.
मंत्रालय के मुताबिक, मौजूदा शेड्यूल M में निर्धारित माइक्रोबियल कंटैमिनेशन लिमिट और WHO की संबंधित जरूरतों के बीच अंतर है. प्रस्तावित संशोधन इसी अंतर को दूर करने की कोशिश है.
क्या होते हैं ग्रेड A क्लीन एरिया?
स्टेराइल फार्मास्यूटिकल मैन्युफैक्चरिंग में ग्रेड A एरिया बेहद महत्वपूर्ण होते हैं. इन जगहों पर ऐसे प्रोडक्ट्स और कॉम्पोनेंट्स को हैंडल किया जाता है, जिन्हें स्टेराइल बनाए रखना जरूरी होता है.
इन एरिया में एक्सपोज्ड फार्मास्यूटिकल प्रोडक्ट्स, कंटेनर्स और स्टेराइल किए गए कॉम्पोनेंट्स रखे या संभाले जाते हैं. इसलिए यहां माइक्रोबियल कंटैमिनेशन को नियंत्रित रखना बेहद जरूरी है.
अगर इन जगहों पर माइक्रोबियल कंटैमिनेशन होता है, तो इससे स्टेराइल प्रोडक्ट्स की क्वालिटी और सेफ्टी प्रभावित होने का जोखिम हो सकता है. इसी वजह से इन एरिया में सख्त निगरानी और साफ-सफाई के मानकों का पालन जरूरी माना जाता है.
ग्रेड A एरिया में माइक्रोबियल ग्रोथ मिलने पर होगी जांच
प्रस्तावित संशोधन का एक अहम पहलू यह है कि ग्रेड A एरिया में किसी भी तरह की माइक्रोबियल ग्रोथ मिलने पर उसे जांच शुरू करने का संकेत माना जाएगा.
यह प्रावधान WHO की गाइडलाइंस के अनुरूप रखा गया है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ग्रेड A एरिया में माइक्रोबियल ग्रोथ की किसी भी घटना को नजरअंदाज न किया जाए और उसकी जांच की जाए.
इससे स्टेराइल दवाएं बनाने वाली कंपनियों के लिए माइक्रोबियल कंट्रोल की निगरानी और गुणवत्ता प्रबंधन को अधिक व्यवस्थित बनाने में मदद मिल सकती है.
दवा कंपनियों और मरीजों को क्या होगा फायदा?
प्रस्तावित बदलाव से भारत में स्टेराइल फार्मास्यूटिकल मैन्युफैक्चरिंग के रेगुलेटरी फ्रेमवर्क को WHO के अंतरराष्ट्रीय मानकों के करीब लाने में मदद मिलेगी.
इसके संभावित फायदे इस प्रकार हैं:
- बेहतर क्वालिटी कंट्रोल: स्टेराइल दवाओं के निर्माण में माइक्रोबियल कंटैमिनेशन पर सख्त निगरानी रखने में मदद मिलेगी.
- अंतरराष्ट्रीय मानकों से तालमेल: भारत के शेड्यूल M के नियम WHO की गाइडलाइंस के अनुरूप हो सकेंगे.
- समय पर जांच: ग्रेड A एरिया में माइक्रोबियल ग्रोथ मिलने पर जांच शुरू करने का स्पष्ट प्रावधान होगा.
- दवा की सेफ्टी पर जोर: स्टेराइल फार्मास्यूटिकल प्रोडक्ट्स की क्वालिटी और सेफ्टी सुनिश्चित करने की व्यवस्था मजबूत हो सकती है.
- मैन्युफैक्चरिंग स्टैंडर्ड्स में सुधार: दवा कंपनियों के लिए GMP से जुड़े गुणवत्ता मानकों को बेहतर बनाने की दिशा मिलेगी.
हालांकि, ये प्रस्तावित संशोधन के संभावित फायदे हैं. इसका वास्तविक प्रभाव नियमों के अंतिम रूप और उनके पालन पर निर्भर करेगा.
आम जनता और हितधारकों से मांगे गए सुझाव
स्वास्थ्य मंत्रालय ने प्रस्तावित संशोधन पर हितधारकों और आम जनता से आपत्तियां और सुझाव मांगे हैं. यदि किसी व्यक्ति या संस्था को प्रस्तावित बदलाव पर कोई आपत्ति या सुझाव देना है, तो वह मंत्रालय के अवर सचिव (ड्रग्स रेगुलेशन), स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को ईमेल के माध्यम से भेज सकता है.
इस प्रस्ताव के जरिए सरकार स्टेराइल फार्मास्यूटिकल मैन्युफैक्चरिंग की गुणवत्ता को मजबूत करने और घरेलू नियमों को अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क के अनुरूप बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है. फिलहाल यह संशोधन प्रस्ताव के स्तर पर है. इसे लागू होने से पहले संबंधित प्रक्रिया पूरी करनी होगी.


