अगर आप भारत की विविध सांस्कृतिक विरासत को करीब से समझना चाहते हैं, तो दिल्ली में आयोजित एक नई प्रदर्शनी आपके लिए खास हो सकती है. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) में पूर्वोत्तर भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं को प्रदर्शित करने वाली एक विशेष प्रदर्शनी शुरू हुई है, जिसमें धातु, बांस और मिट्टी से बने पारंपरिक घरेलू उपयोग के बर्तनों और वस्तुओं को प्रदर्शित किया गया है.
प्रदर्शनी का शीर्षक “Living Heritage in Metal, Bamboo and Clay: Traditional Utensils of Northeast India” रखा गया है. इसका उद्देश्य उन पारंपरिक शिल्प कलाओं और जीवनशैली को सामने लाना है जो आज भी पूर्वोत्तर भारत के कई समुदायों की पहचान बनी हुई हैं.
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मशीनों के दौर में पारंपरिक शिल्प की झलक
आज जब अधिकांश वस्तुएं मशीनों से बड़े पैमाने पर तैयार की जा रही हैं, ऐसे समय में यह प्रदर्शनी हस्तनिर्मित कलाकृतियों और पारंपरिक कारीगरी के महत्व को रेखांकित करती है.
प्रदर्शनी में शामिल वस्तुएं केवल घरेलू उपयोग के साधन नहीं हैं, बल्कि वे स्थानीय समुदायों की संस्कृति, परंपरा, जीवनशैली और प्रकृति के साथ उनके संबंध को भी दर्शाती हैं.
क्या-क्या देखने को मिलेगा?
प्रदर्शनी में पूर्वोत्तर भारत के विभिन्न राज्यों से जुड़े पारंपरिक बर्तनों और शिल्प उत्पादों को प्रदर्शित किया गया है.
प्रमुख आकर्षण
| प्रदर्शित वस्तुएं | विशेषता |
|---|---|
| बांस के बर्तन और कंटेनर | पर्यावरण अनुकूल और पारंपरिक उपयोग |
| हस्तनिर्मित टोकरी | स्थानीय कारीगरी का उदाहरण |
| मिट्टी के बर्तन | पारंपरिक घरेलू जीवन की झलक |
| बेल-मेटल (Bell Metal) के पात्र | पीढ़ियों से चली आ रही धातु कला |
| पारंपरिक उपयोगी वस्तुएं | स्थानीय संस्कृति और पहचान का प्रतीक |
इन वस्तुओं के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि कैसे स्थानीय समुदायों ने प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर टिकाऊ जीवनशैली विकसित की.
किन संस्थाओं ने किया आयोजन?
यह प्रदर्शनी National Mission on Cultural Mapping (NMCM) और North Eastern Handicrafts and Handlooms Development Corporation (NEHHDC) के सहयोग से आयोजित की गई है. इसका उद्देश्य पूर्वोत्तर भारत की कला, शिल्प और सांस्कृतिक परंपराओं को व्यापक स्तर पर पहचान दिलाना है.
क्यों खास है यह प्रदर्शनी?
विशेषज्ञों के अनुसार पारंपरिक शिल्प केवल आर्थिक गतिविधि नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा भी है. तेजी से बदलती जीवनशैली और औद्योगिकीकरण के बीच कई पारंपरिक कलाएं धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं.
ऐसे में इस प्रकार की प्रदर्शनियां:
- पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करने में मदद करती हैं.
- स्थानीय कारीगरों को पहचान दिलाती हैं.
- युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ती हैं.
- हस्तशिल्प और लोक कला के प्रति जागरूकता बढ़ाती हैं.
कब तक देख सकते हैं प्रदर्शनी?
यह प्रदर्शनी नई दिल्ली स्थित IGNCA के दर्शनम गैलरी परिसर में आयोजित की गई है और 2 जुलाई (कुछ आधिकारिक कार्यक्रम विवरणों के अनुसार 3 जुलाई तक) आम लोगों के लिए खुली रहेगी. आगंतुक यहां पूर्वोत्तर भारत की पारंपरिक कला और शिल्प की अनूठी झलक देख सकते हैं.
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सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में पहल
भारत की सांस्कृतिक विविधता उसकी सबसे बड़ी ताकतों में से एक है. पूर्वोत्तर भारत की कला और शिल्प पर आधारित यह प्रदर्शनी न केवल पारंपरिक कारीगरी को सम्मान देती है बल्कि लोगों को यह समझने का अवसर भी देती है कि साधारण दिखने वाली घरेलू वस्तुओं के पीछे कितनी समृद्ध सांस्कृतिक कहानियां छिपी होती हैं.
Source: IGNCA, National Mission on Cultural Mapping


