नई दिल्ली: भारत और जापान ने जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए Joint Crediting Mechanism (JCM) के कार्यान्वयन नियमों को अपनाने पर सहमति जताई है. यह व्यवस्था पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6.2 के तहत दोनों देशों को कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने वाली परियोजनाओं पर मिलकर काम करने का अवसर प्रदान करेगी. इस पहल से स्वच्छ प्रौद्योगिकी, हरित निवेश और कार्बन क्रेडिट व्यापार को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है.
Joint Crediting Mechanism को भारत और जापान के बीच जलवायु सहयोग का एक महत्वपूर्ण ढांचा माना जा रहा है. इसके तहत दोनों देश ऐसी परियोजनाओं को बढ़ावा देंगे जो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने में मदद करेंगी. इन परियोजनाओं से उत्पन्न कार्बन क्रेडिट को निर्धारित नियमों के तहत साझा किया जा सकेगा. इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ हरित अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी.
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क्या है Joint Crediting Mechanism
Joint Crediting Mechanism या JCM एक द्विपक्षीय व्यवस्था है जिसे जापान ने कई देशों के साथ विकसित किया है. इसका उद्देश्य कम-कार्बन प्रौद्योगिकियों के उपयोग को बढ़ावा देना और उत्सर्जन में कमी के परिणामों को मापना है. इस प्रणाली के माध्यम से किसी परियोजना से होने वाली उत्सर्जन कटौती को दोनों साझेदार देशों के जलवायु लक्ष्यों में शामिल किया जा सकता है.
भारत और जापान के बीच इस व्यवस्था का आधार पेरिस समझौते का अनुच्छेद 6.2 है. यह अनुच्छेद देशों को आपसी सहयोग के जरिए उत्सर्जन में कमी लाने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्बन क्रेडिट के आदान-प्रदान की अनुमति देता है.
भारत को क्या होगा लाभ
विशेषज्ञों का मानना है कि इस व्यवस्था से भारत में हरित निवेश को बढ़ावा मिलेगा. जापानी कंपनियां भारत में स्वच्छ ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, हरित विनिर्माण और अन्य कम-कार्बन प्रौद्योगिकी आधारित परियोजनाओं में निवेश कर सकेंगी. इससे नई तकनीकों का हस्तांतरण होगा और भारतीय उद्योगों को आधुनिक समाधान अपनाने में मदद मिलेगी.
इसके अलावा JCM के तहत विकसित परियोजनाएं भारत के दीर्घकालिक जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने में भी योगदान देंगी. भारत ने वर्ष 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन हासिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया है. इस लक्ष्य को प्राप्त करने में अंतरराष्ट्रीय सहयोग और स्वच्छ प्रौद्योगिकी की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा रही है.
कार्बन क्रेडिट बाजार को मिलेगा बढ़ावा
JCM के लागू होने से भारत के उभरते कार्बन बाजार को भी मजबूती मिल सकती है. परियोजनाओं से उत्पन्न कार्बन क्रेडिट का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार किया जा सकेगा. इससे परियोजना डेवलपर्स और उद्योगों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर पैदा होंगे. साथ ही जलवायु-अनुकूल परियोजनाओं में निवेश की गति बढ़ सकती है.
विशेषज्ञों के अनुसार कार्बन क्रेडिट व्यापार आने वाले वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने जा रहा है. ऐसे में भारत और जापान के बीच यह समझौता भविष्य की हरित अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण आधार तैयार कर सकता है.
किन क्षेत्रों में हो सकता है सहयोग
भारत और जापान के बीच सहयोग के कई क्षेत्र सामने आ सकते हैं. इनमें सौर ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, स्वच्छ विनिर्माण, हरित हाइड्रोजन, कार्बन कैप्चर तकनीक, सतत परिवहन और अन्य कम-कार्बन समाधान शामिल हो सकते हैं. इन क्षेत्रों में संयुक्त परियोजनाओं से उत्सर्जन में कमी के साथ आर्थिक विकास को भी बढ़ावा मिलेगा.
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भारत-जापान संबंधों को मिलेगी नई मजबूती
भारत और जापान पहले से ही आर्थिक, रणनीतिक और तकनीकी क्षेत्रों में करीबी सहयोगी हैं. जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में यह नया कदम दोनों देशों की साझेदारी को और मजबूत करेगा. विशेषज्ञों का मानना है कि स्वच्छ ऊर्जा और हरित प्रौद्योगिकी भविष्य में भारत-जापान संबंधों के प्रमुख स्तंभों में शामिल हो सकते हैं.
जलवायु परिवर्तन आज पूरी दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है. ऐसे में भारत और जापान द्वारा Joint Crediting Mechanism के कार्यान्वयन नियमों को अपनाना वैश्विक जलवायु प्रयासों की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है. इससे दोनों देशों को अपने जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने के साथ-साथ सतत विकास को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी.
स्रोत. DD News.


