नई दिल्ली: रमजान के पाक महीने में एक बार फिर पश्चिम एशिया में युद्ध के बादल मंडराने लगे हैं. ईरान ने साफ शब्दों में कह दिया है कि वह यूरेनियम संवर्धन जारी रखने के अपने फैसले से पीछे नहीं हटेगा, चाहे उस पर कितने भी दबाव क्यों न हों. साथ ही तेहरान ने अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हटाने की मांग दोहराई है.
अमेरिका की ओर से संभावित सैन्य कार्रवाई की आशंकाओं के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड के रुख पर उनके ही देश में सवाल उठने लगे हैं. कई सांसदों का मानना है कि कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. ट्रंप पहले भी कह चुके हैं कि यदि बातचीत विफल रही तो वे सैन्य विकल्प अपनाने से पीछे नहीं हटेंगे.
सोमालियाई मूल की अमेरिकी सांसद इल्हान उमर ने रमजान के महीने में मुस्लिम देशों को निशाना बनाए जाने पर कड़ा एतराज जताया है. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए आरोप लगाया कि अमेरिका पहले भी रमजान के दौरान इराक पर हमला कर चुका है और अब ईरान को लेकर भी वही स्थिति बन रही है.
इल्हान उमर ने यह भी सवाल उठाया कि क्या इन हमलों का कारण अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन है या फिर धार्मिक पहचान. उनके बयान ने अमेरिकी राजनीति में नई बहस छेड़ दी है. उन्होंने संकेत दिया कि मुस्लिम देशों के साथ अमेरिका का व्यवहार पक्षपातपूर्ण नजर आता है, खासकर जब सैन्य कार्रवाई की टाइमिंग धार्मिक महीनों से जुड़ती दिखती है.
जिनेवा में हाल ही में ईरान और अमेरिका के बीच अप्रत्यक्ष वार्ता हुई, जिसमें ओमान के विदेश मंत्री बदर अलबुसैदी ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई. कई घंटे चली बातचीत के बाद भी कोई ठोस समझौता सामने नहीं आया, हालांकि ओमान की ओर से ‘महत्वपूर्ण प्रगति’ होने की बात कही गई है.
ईरान के विदेश मंत्री बदर अलबुसैदी ने इस दौर की बातचीत को अब तक की सबसे लंबी और गहन वार्ताओं में से एक बताया. उन्होंने कहा कि मतभेद अभी भी कायम हैं, खासकर यूरेनियम संवर्धन को लेकर. अमेरिका ने आधिकारिक रूप से वार्ता पर टिप्पणी नहीं की है, जिससे अनिश्चितता और बढ़ गई है.


