भारत और चीन के बीच व्यापारिक तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है. चीन ने अब World Trade Organization (WTO) से भारत के खिलाफ एक नया dispute panel बनाने की मांग की है. यह मामला भारत द्वारा Solar Equipment और Information Technology (IT) सेक्टर को दिए जा रहे सरकारी समर्थन और प्रोत्साहन से जुड़ा है.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन का आरोप है कि भारत की कुछ नीतियां घरेलू कंपनियों को फायदा पहुंचाती हैं और विदेशी, खासकर चीनी कंपनियों के लिए नुकसानदायक साबित हो रही हैं.
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आखिर क्या है पूरा मामला?
रिपोर्ट्स के अनुसार चीन ने दिसंबर 2025 में WTO में भारत के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी. इसके बाद दोनों देशों के बीच फरवरी 2026 में consultations भी हुईं, लेकिन कोई समाधान नहीं निकल सका. अब चीन ने औपचारिक रूप से WTO dispute panel गठित करने की मांग की है. चीन का कहना है कि:
- भारत कुछ technology products पर tariff और import duty लगाता है
- domestic manufacturing को बढ़ावा देता है
- और कई योजनाओं में स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता दी जाती है
जिससे Chinese exports प्रभावित हो रहे हैं.
Solar Sector को लेकर चीन को क्यों है आपत्ति?
भारत पिछले कुछ वर्षों से Solar Manufacturing में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है. सरकार ने:
- PLI Scheme
- Domestic Content Rules
- Local Manufacturing Incentives
- Approved List Models
जैसी नीतियों के जरिए भारतीय कंपनियों को बढ़ावा दिया है. भारत का उद्देश्य Chinese imports पर निर्भरता कम करना और घरेलू solar ecosystem मजबूत करना है. लेकिन चीन का आरोप है कि ये नीतियां WTO नियमों के खिलाफ हो सकती हैं.
IT सेक्टर भी विवाद में क्यों आया?
रिपोर्ट्स के मुताबिक विवाद सिर्फ Solar Equipment तक सीमित नहीं है. चीन ने भारत के कुछ IT और technology products पर लगाए गए tariff structure पर भी सवाल उठाए हैं. चीन का कहना है कि:
- Import restrictions
- tariff differences
- और domestic preference policies
विदेशी कंपनियों के लिए असमान माहौल बनाती हैं.
भारत के लिए क्यों अहम है यह मामला?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद सिर्फ trade disagreement नहीं बल्कि strategic manufacturing competition का हिस्सा भी है. भारत:
- semiconductor
- electronics
- solar manufacturing
- EV ecosystem
जैसे sectors में local production तेजी से बढ़ाना चाहता है. वहीं चीन लंबे समय से इन sectors में global supply chain leader बना हुआ है. ऐसे में WTO में बढ़ते disputes को दोनों देशों के बीच आर्थिक प्रतिस्पर्धा के तौर पर भी देखा जा रहा है.
भारत-चीन व्यापार में कितना अंतर है?
रिपोर्ट्स के मुताबिक 2025-26 में भारत और चीन के बीच trade deficit रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया. भारत का चीन से आयात लगातार बढ़ रहा है, खासकर:
- electronics
- solar components
- machinery
- chemicals
जैसे sectors में. विशेषज्ञों का कहना है कि भारत अब धीरे-धीरे import dependence कम करने की रणनीति पर काम कर रहा है.
पहले भी WTO पहुंच चुका है विवाद
यह पहला मौका नहीं है जब चीन ने भारत के खिलाफ WTO का रुख किया हो. इससे पहले:
- EV sector
- battery incentives
- automobile schemes
को लेकर भी चीन WTO panel की मांग कर चुका है. इससे साफ संकेत मिलते हैं कि आने वाले समय में दोनों देशों के बीच trade disputes और बढ़ सकते हैं.
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आगे क्या हो सकता है?
यदि WTO panel औपचारिक रूप से गठित होता है, तो दोनों देशों को अपने-अपने पक्ष रखने का मौका मिलेगा. यह प्रक्रिया लंबी चल सकती है और अंतिम फैसला आने में काफी समय लग सकता है.
विशेषज्ञों के अनुसार भारत फिलहाल अपनी manufacturing policy और clean energy goals से पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रहा. ऐसे में यह मामला आने वाले महीनों में और चर्चा में रह सकता है.


