Paddy cultivation in less water: भारत की खाद्य सुरक्षा की रीढ़ ‘चावल’ है, जो 50 करोड़ से अधिक आबादी का मुख्य आहार है. देश के लगभग 51 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती की जाती है. हालांकि, पारंपरिक ‘कद्दू’ या रोपाई विधि ने वर्तमान में गंभीर पर्यावरणीय और आर्थिक चुनौतियां पेश कर दी हैं. खेतों में लंबे समय तक पानी जमा रहने के कारण मिट्टी की जैविक सामग्री सड़ने लगती है, जिससे भारी मात्रा में मीथेन गैस का उत्सर्जन होता है. आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2020 में धान की खेती से लगभग 32 लाख टन मीथेन उत्सर्जित हुई, जो कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में वैश्विक तापमान (ग्लोबल वार्मिंग) बढ़ाने में कई गुना अधिक घातक है.
इस संकट के समाधान के रूप में धान की सीधी बुवाई (Direct Seeded Rice – DSR) तकनीक एक टिकाऊ और किफायती विकल्प बनकर उभरी है. कटक स्थित आईसीएआर-सीआरआरआई के शोध और कृषि विशेषज्ञों के विश्लेषण इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह विधि न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि किसानों के मुनाफे को भी बढ़ाती है.
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आर्थिक लाभ: प्रति हेक्टेयर 15 हजार तक की बचत
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के पूर्व प्रधान वैज्ञानिक डॉ. वीरेन्द्र सिंह लाठर के अनुसार, डी.एस.आर. तकनीक में नर्सरी तैयार करने और फिर पौधों की रोपाई करने की झंझट खत्म हो जाती है. इससे समय और श्रम की बड़ी बचत होती है.
आईसीएआर के विश्लेषण बताते हैं कि पारंपरिक विधि की तुलना में कुल लागत में 25-30% की गिरावट आती है.
- पानी की बचत: सिंचाई के पानी की खपत 20-25% तक कम हो जाती है.
- मुनाफा: प्रति हेक्टेयर किसानों को 10 से 15 हजार रुपये की अतिरिक्त बचत होती है.
- तकनीकी लाभ: सीड ड्रिल, बूम स्प्रेयर और कंबाइन हार्वेस्टर के उपयोग से उत्पादन लागत में अतिरिक्त 25% की कमी और बीज की खपत में 50% तक की बचत संभव है.
बुवाई की विधियां और समय
सीधी बुवाई मुख्य रूप से दो तरीकों से की जाती है-
- पारंपरिक जुताई विधि: इसमें डिस्किंग, टाइन कल्टीवेटर और पटेला का उपयोग कर मिट्टी को 5-10 सेमी गहरा जोता जाता है.
- जीरो टिलेज (बिना जुताई): इसमें बिना खेत जोते बुवाई होती है. बुवाई से 2-3 दिन पहले ‘ग्लाइफोसेट’ जैसे खरपतवारनाशी का छिड़काव किया जाता है.
- उचित समय: बुवाई के लिए 15 मई से 15 जून का समय, या मानसून आने से 7-10 दिन पहले की अवधि सबसे उपयुक्त है. प्रति हेक्टेयर केवल 20 किलो बीज पर्याप्त होता है, जिसे 2-3 सेमी की गहराई पर बोना चाहिए.
पर्यावरण और फसल चक्र पर प्रभाव
सीधी बुवाई वाली फसल रोपाई वाली फसल की तुलना में 10-15 दिन पहले पककर तैयार हो जाती है. इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि किसान को अगली फसल (गेहूं आदि) के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है, जिससे पराली जलाने की आवश्यकता और प्रवृत्ति कम होती है. साथ ही, इस विधि से मीथेन उत्सर्जन में 30-40% की कमी आती है.
इन बातों का खास तरीके से रखें ध्यान
मिट्टी का चयन: यह तकनीक भारी मिट्टी के लिए सबसे उत्तम है क्योंकि इसमें जल धारण क्षमता अधिक होती है. हल्की बलुई मिट्टी में पोषक तत्वों (लोहा और जस्ता) की कमी और पानी के जल्दी सूखने की समस्या के कारण इसकी सलाह नहीं दी जाती.
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खरपतवार नियंत्रण: डी.एस.आर. में सबसे बड़ी चुनौती खरपतवार हैं. बुवाई के शुरुआती 20-45 दिन बेहद महत्वपूर्ण होते हैं. यदि सही समय पर अनुशंसित खरपतवारनाशी का प्रयोग न किया जाए, तो फसल की वृद्धि और पैदावार पर बुरा असर पड़ता है. बेहतर उत्पादन के लिए नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश का संतुलित उपयोग अनिवार्य है.
धान की सीधी बुवाई तकनीक खेती की लागत घटाकर किसानों की आय बढ़ाने और ग्लोबल वार्मिंग के खतरे को कम करने का एक प्रभावी मार्ग है. उचित मशीनीकरण और खरपतवार प्रबंधन के साथ यह भारतीय कृषि के भविष्य के लिए अनिवार्य है.


