Thoughts and Violence Philosophy: हमारे तमाम धार्मिक शास्त्र और महापुरुष हमेशा से हिंसा का विरोध करते आए हैं. इसके बावजूद दुनिया भर में हिंसा, युद्ध और क्रूरता का सिलसिला थमता नहीं है. आखिर ऐसा क्यों होता है? क्या कभी आपने सोचा है कि इस समस्त क्रूरता और विनाश की असली जड़ कहाँ है? दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो इस पूरी तबाही के पीछे कोई और नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर उठने वाले ‘विचार’ (Thoughts) ही जिम्मेदार हैं. अगर हम मन में उठने वाली हिंसा की भावना से दूर रहना चाहते हैं, तो हमें सबसे पहले विचारों की इस रहस्यमयी गति और इसके स्वरूप को समझना होगा.
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विचार ही है क्रूरता और युद्ध का असली जनक
दुनिया में आज जितने भी युद्ध हो रहे हैं, चाहे वह बमबारी हो, आतंकवाद हो या किसी उद्देश्य के लिए इंसानों को बंधक बनाना,इस समस्त बर्बरता के पीछे विचार ही काम कर रहा होता है.
हैरानी की बात यह है कि विचार ही एक तरफ खूबसूरत कविताओं, कलाकृतियों, भव्य मंदिरों और कंप्यूटर जैसी आधुनिक तकनीकों का निर्माण करता है, तो दूसरी तरफ यही विचार विनाश का सबसे बड़ा हथियार भी बन जाता है. मनुष्य की मदद करने वाले इस विचार ने ही आज दुनिया में आतंक का माहौल भी खड़ा किया है.
कैसे काम करता है विचारों का यह चक्र?
सोचना या विचार करना असल में हमारी स्मृति (Memory) की एक प्रतिक्रिया है. इंसान का मस्तिष्क एक तय पैटर्न पर काम करता है, जिसे इस चक्र से समझा जा सकता है.
अनुभव ➔ जानकारी (मस्तिष्क में संचित) ➔ स्मृति ➔ विचार ➔ कर्म ➔ नया अनुभव
लाखों वर्षों से मनुष्य को जो अनुभव मिले हैं, वे जानकारी के रूप में मस्तिष्क में जमा हैं. इसी जानकारी से स्मृति बनती है और स्मृति से विचार पैदा होते हैं. अतीत में भोगे गए दुख या सुख की यादें ही हमें भविष्य में वैसा ही कर्म करने के लिए प्रेरित करती हैं. यह एक ऐसा यंत्रवत (Mechanical) चक्र है, जिसमें मनुष्य फंसा हुआ है.
विचार कभी स्वतंत्र क्यों नहीं हो सकता?
अक्सर इंसान को लगता है कि वह सोचने और कार्य करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है, लेकिन सच यह है कि विचार कभी स्वतंत्र नहीं हो सकता. विचार हमेशा हमारी जानकारी पर निर्भर करता है, और जानकारी हमेशा सीमित होती है क्योंकि यह समय का एक हिस्सा है. जब विचार सीमित होगा, तो उससे पैदा होने वाला हर कर्म भी सीमित होगा. यही सीमितता समाज में राष्ट्रीयता, धर्म और जातियों के नाम पर विभाजन पैदा करती है. विचार ने ही अलग-अलग धर्मों को जन्म दिया और फिर उनके बीच की दूरियों को भी बढ़ावा दिया, जिससे समाज में लगातार संघर्ष बना रहता है.
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वैचारिक हिंसा से दूरी ही है एकमात्र समाधान
हमारा मस्तिष्क सदियों से इसी ढर्रे पर काम करने के लिए संस्कारबद्ध (Conditioned) हो चुका है. जैसे शरीर की जैविक क्रियाएं (सांस लेना, दिल का धड़कन) अपने आप चलती हैं, वैसे ही हमारी सोच भी हमारे पुराने संस्कारों के हिसाब से चलती रहती है.


