ग्रामीण क्षेत्रों में चारे की उपलब्धता बढ़ाने और पशुपालन से जुड़ी सुविधाओं को मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार ने नई पहल की है. इसके तहत ग्रामीण विकास विभाग और पशुपालन एवं डेयरी विभाग ने संयुक्त रूप से सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को परामर्श जारी किया है. यह पहल विकसित भारत-रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) यानी VB-G RAM G अधिनियम, 2025 के तहत लागू की जाएगी.
इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण इलाकों में चारे की कमी दूर करना, चरागाहों का विकास करना और पशुधन से जुड़े बुनियादी ढांचे को मजबूत करना है. इस पहल में छोटे और सीमांत किसानों के साथ उन भूमिहीन परिवारों पर भी विशेष ध्यान दिया गया है, जिनकी आजीविका पशुपालन और डेयरी गतिविधियों पर निर्भर है.
VB-G RAM G के तहत 22 तरह के कार्यों की पहचान
दोनों विभागों की ओर से जारी संयुक्त परामर्श में अधिनियम के तहत अनुमत 375 कार्यों की सूची में से चारा उत्पादन और पशुधन संबंधी बुनियादी ढांचे से जुड़े 22 कार्यों की पहचान की गई है.
इनमें व्यक्तिगत और सामुदायिक स्तर पर चारा उत्पादन, सामुदायिक चरागाहों और चराई भूमि का विकास, चारा भंडारण केंद्र, चारा बैंक और साइलेज इकाइयों का निर्माण शामिल है. इन सुविधाओं से ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं के लिए चारे की उपलब्धता बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है.
इसके अलावा, पात्र लाभार्थियों और समुदायों के लिए पशु आश्रय स्थलों का निर्माण, मरम्मत और रखरखाव भी किया जा सकेगा. इनमें मवेशियों, बकरियों, सूकरों और मुर्गियों के लिए आश्रय स्थल शामिल हैं.
पशुपालन से जुड़ी अन्य सुविधाओं में सामुदायिक दूध संग्रह केंद्र, पशु चिकित्सा स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक पशु जलपान कुंड और व्यक्तिगत लाभार्थियों के लिए एजोला टैंक का निर्माण भी शामिल किया गया है.
ग्रामीण परिवारों को सालाना 125 दिन के रोजगार की गारंटी
VB-G RAM G अधिनियम 1 जुलाई 2026 से लागू हुआ था. इसके तहत प्रत्येक ग्रामीण परिवार को सालाना 125 दिनों के मजदूरी रोजगार की वैधानिक गारंटी दी गई है.
अधिनियम में आजीविका संबंधी बुनियादी ढांचे के विकास और चरम मौसम की घटनाओं के प्रभाव को कम करने सहित चार प्रमुख विषयगत क्षेत्रों में टिकाऊ परिसंपत्तियों के निर्माण पर जोर दिया गया है.
नई पहल के तहत ग्रामीण रोजगार और परिसंपत्ति निर्माण को पशुधन क्षेत्र की जरूरतों से जोड़ने की कोशिश की जा रही है. इससे ऐसे कार्यों को प्राथमिकता देने का रास्ता तैयार होगा, जो रोजगार उपलब्ध कराने के साथ ग्रामीण परिवारों की पशुपालन आधारित आजीविका को भी समर्थन दें.
ग्राम पंचायत योजनाओं के आधार पर तय होंगे काम
केंद्र के संयुक्त परामर्श में विकेंद्रीकृत और पंचायत आधारित योजना निर्माण पर विशेष जोर दिया गया है. इसके तहत चारा विकास और पशुधन से जुड़ी सुविधाओं को विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं (VGPPs) में शामिल किया जाएगा.
इन योजनाओं को ग्राम सभा से मंजूर स्थानीय विकास प्राथमिकताओं के अनुसार तैयार किया जाएगा. राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सलाह दी गई है कि स्थानीय जरूरतों और स्वीकृत योजनाओं के आधार पर कार्यक्रम के कुल खर्च में से चारा और पशुधन संबंधी कार्यों पर होने वाले व्यय को धीरे-धीरे कम से कम 5 प्रतिशत तक बढ़ाने का प्रयास करें.
इसके साथ ही जरूरत आधारित संतृप्ति दृष्टिकोण अपनाने को कहा गया है. इसका मतलब है कि जिन पात्र परिवारों और समुदायों को चारा तथा पशुधन संबंधी परिसंपत्तियों की जरूरत है, उनकी पहचान कर योजनाओं का लाभ पहुंचाने पर ध्यान दिया जाए.
जिन ग्राम पंचायतों में 30 प्रतिशत से अधिक आबादी पशुधन पर निर्भर है, वहां स्थानीय जरूरतों के अनुसार इन कार्यों को प्राथमिकता देने की बात कही गई है.
ICAR की चारा विकास योजनाओं से मिलेगी मदद
चारा उत्पादन और चरागाह विकास की योजना बनाने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के भारतीय घासभूमि एवं चारा अनुसंधान संस्थान (IGFRI) की ओर से तैयार राज्य-विशिष्ट चारा संसाधन विकास योजनाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है.
इन योजनाओं को जिला और ब्लॉक स्तर पर योजना तैयार करने के लिए मार्गदर्शक दस्तावेज के रूप में उपयोग किया जा सकेगा.
इसके अलावा, उपयुक्त चारा किस्मों, बारहमासी घास और एकीकृत फसल-पशुधन प्रणालियों जैसे जलवायु अनुकूल उपायों पर भी ध्यान देने को कहा गया है. इसका उद्देश्य स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप चारा संसाधनों का विकास करना और पशुपालन को अधिक टिकाऊ बनाना है.
राज्यों को विभागों के बीच समन्वय बढ़ाने के निर्देश
संयुक्त परामर्श में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से ग्रामीण विकास, पशुपालन, कृषि और अन्य संबंधित विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने को कहा गया है. इसके जरिए चारा सुरक्षा और पशुधन बुनियादी ढांचे के लिए व्यापक राज्य कार्ययोजना तैयार करने पर जोर दिया गया है.
इसके साथ ही योजना के क्रियान्वयन में अधिनियम के वैधानिक प्रावधानों का पालन जरूरी होगा. इनमें पंचायत आधारित योजना निर्माण, अनिवार्य सामाजिक अंकेक्षण, सामग्री घटक पर जिला स्तर की 40 प्रतिशत सीमा और अनुसूची-1 के प्रावधानों के अनुसार व्यक्तिगत लाभार्थियों का चयन शामिल है.
परामर्श में साप्ताहिक सार्वजनिक जानकारी और शिकायत निवारण व्यवस्था सुनिश्चित करने की बात भी कही गई है. राज्यों को निर्देश दिया गया है कि वे इस परामर्श को संबंधित विभागों, पंचायती राज संस्थाओं और क्षेत्रीय स्तर के अधिकारियों तक पहुंचाएं.
ग्रामीण आजीविका और पशुधन विकास को जोड़ने की कोशिश
केंद्र की यह पहल ग्रामीण रोजगार, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और पशुधन विकास को एक साथ जोड़ने का प्रयास है. चारा उत्पादन, चरागाह विकास, पशु आश्रय और दूध संग्रह जैसी सुविधाओं को ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम से जोड़कर स्थानीय जरूरतों के अनुसार टिकाऊ परिसंपत्तियां विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है.
छोटे और सीमांत किसानों तथा पशुपालन पर निर्भर भूमिहीन परिवारों के लिए ऐसी सुविधाएं महत्वपूर्ण हो सकती हैं. विभागों के बीच बेहतर समन्वय और पंचायत स्तर पर योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से ग्रामीण क्षेत्रों में चारा सुरक्षा और पशुधन आधारित आजीविका को समर्थन देने का लक्ष्य रखा गया है. यह पहल विकसित भारत @2047 के लक्ष्य की दिशा में भी एक कदम है.
यह भी पढ़ें- उत्तराखंड के सरकारी कर्मचारियों को दिवाली के बाद बड़ा तोहफा, CM धामी ने 3% बढ़ाया DA, अब मिलेगा 63% महंगाई भत्ता


