Jaipur, August 22: राजस्थान के बाड़मेर जैसे रेगिस्तानी इलाके में खेती करना आसान नहीं है. कम पानी और कठिन मौसम के बावजूद जानपालिया गांव के किसान हरिराम भाखर ने खेती का ऐसा मॉडल तैयार किया है, जिसमें बागवानी, पशुपालन, चारा उत्पादन, जैविक खाद और बायोगैस को एक साथ जोड़ा गया है.
हरिराम के खेत में अब सिर्फ पारंपरिक फसलें ही नहीं उगाई जातीं, बल्कि खेती से जुड़े अलग-अलग संसाधनों का दोबारा इस्तेमाल भी किया जाता है. यही वजह है कि उनके फार्म को देखने के लिए आसपास के गांवों के अलावा दूर-दराज से भी किसान पहुंच रहे हैं.
चंडीगढ़ में पंजाब सरकार के खिलाफ ETT शिक्षकों का प्रदर्शन, पुलिस से झड़प के बाद कई हिरासत में
बायोगैस से लेकर बागवानी तक सब एक ही मॉडल में
हरिराम भाखर ने अपने फार्म पर बायोगैस प्लांट, अनार और खजूर की बागवानी, नेपियर घास और पशुपालन को एक साथ जोड़ा है.
इस मॉडल में एक काम से निकलने वाला संसाधन दूसरे काम में इस्तेमाल होता है. पशुओं से मिलने वाले गोबर का इस्तेमाल बायोगैस प्लांट में किया जाता है. वहीं बायोगैस प्लांट से निकलने वाली स्लरी को खेत में जैविक खाद के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है.
इससे खेती में उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने की कोशिश की गई है.
गोबर से गैस और खेत के लिए जैविक खाद
नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की योजनाओं के सहयोग और सब्सिडी से हरिराम ने अपने फार्म पर गोबर गैस प्लांट लगाया.
इस प्लांट से घर में खाना पकाने के लिए गैस मिलती है. वहीं, प्लांट से निकलने वाली स्लरी को खेत में जैविक खाद के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है.
इससे रासायनिक खाद पर निर्भरता कम करने और मिट्टी की सेहत बेहतर करने में मदद मिलने की उम्मीद है.
500 भेड़ों का फार्म भी तैयार किया
समन्वित खेती के इस मॉडल में पशुपालन को भी अहम जगह दी गई है. राष्ट्रीय पशुधन मिशन के तहत हरिराम के फार्म पर करीब 500 भेड़ों का फार्म स्थापित किया गया है.
इसके अलावा मवेशियों का पालन भी किया जा रहा है. पशुओं से मिलने वाला गोबर बायोगैस प्लांट के लिए इस्तेमाल होता है, जबकि पशुपालन परिवार के लिए अतिरिक्त आय का जरिया भी बन रहा है.
इस तरह पशुपालन और खेती को अलग-अलग रखने के बजाय दोनों को एक-दूसरे से जोड़ा गया है.
नेपियर घास से तैयार होता है पशुओं का चारा
फार्म पर नेपियर घास भी उगाई जा रही है. इसका इस्तेमाल पशुओं के चारे के तौर पर किया जाता है.
इससे खेत में उगने वाला चारा सीधे पशुपालन के काम आ रहा है. दूसरी तरफ पशुओं से मिलने वाला गोबर फिर बायोगैस प्लांट और जैविक खाद के लिए इस्तेमाल हो रहा है.
यानी खेत, पशुपालन और बायोगैस एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं.
पहले जीरा, बाजरा और ईसबगोल की खेती
हरिराम भाखर बताते हैं कि पहले उनके खेत में मुख्य रूप से जीरा, बाजरा और ईसबगोल जैसी पारंपरिक फसलें उगाई जाती थीं.
बाद में खेती में बदलाव और नए प्रयोग शुरू किए गए. बागवानी, पशुपालन, चारा उत्पादन और बायोगैस को जोड़ने से अब उनके फार्म पर आय के कई अलग-अलग स्रोत तैयार हुए हैं.
उनके बड़े भाई डॉ. रावताराम भाखर के मार्गदर्शन ने भी इस पहल को आगे बढ़ाने में मदद की.
दूर-दूर से मॉडल देखने पहुंच रहे किसान
हरिराम का फार्म अब सिर्फ खेती की जगह नहीं रह गया है. आसपास के गांवों के किसान और ग्रामीण यहां पहुंचकर समन्वित खेती के मॉडल को समझ रहे हैं.
किसान यह देख रहे हैं कि कम पानी वाले इलाके में उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल किस तरह खेती और पशुपालन दोनों के लिए किया जा सकता है.
खास बात यह है कि मॉडल में किसी एक फसल या एक आय स्रोत पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग गतिविधियों को आपस में जोड़ा गया है.
SI भर्ती में डमी अभ्यर्थी का खेल, CCTV से खुला फर्जीवाड़ा, पुलिस जांच में जुटी
रेगिस्तानी क्षेत्र के किसानों के लिए नई राह
बाड़मेर जैसे इलाके में पानी की कमी खेती के सामने बड़ी चुनौती है. ऐसे में फसल विविधीकरण, पशुपालन, बागवानी, जैविक खाद और नवीकरणीय ऊर्जा को एक साथ जोड़ने का यह मॉडल किसानों के लिए उपयोगी हो सकता है.
हरिराम भाखर का फार्म यह दिखाता है कि सीमित संसाधनों के बीच भी खेती को सिर्फ फसल उत्पादन तक सीमित रखने के बजाय उससे जुड़े दूसरे कामों को साथ लेकर चला जा सकता है.
इससे खेती से जुड़े संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल, अतिरिक्त आय के रास्ते और पर्यावरण के लिहाज से ज्यादा sustainable farming की संभावनाएं बन सकती हैं.


