Where most uranium in world: दुनिया की सबसे शक्तिशाली और खतरनाक धातुओं में से एक यूरेनियम आज वैश्विक राजनीति, युद्ध और ऊर्जा का केंद्र बना हुआ है. डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेताओं के बयान हों या ईरान का न्यूक्लियर कार्यक्रम हर जगह यूरेनियम ही चर्चा में है. लेकिन सवाल यह है कि आखिर यह मिलता कहां है और इसे निकालना इतना मुश्किल क्यों है?
कहां पर सबसे ज्यादे यूरेनियम है?
दुनिया में सबसे ज्यादा यूरेनियम भंडार ऑस्ट्रेलिया में पाया जाता है, जो कुल वैश्विक भंडारका लगभग 28% है. इसके बाद कजाकिस्तान और कनाडा आते हैं. खासकर कनाडा के सस्केचेवान क्षेत्र में हाई-ग्रेड यूरेनियम मिलता है, जिससे कम मात्रा में भी ज्यादा ऊर्जा पैदा की जा सकती है.
यूरेनियम धरती के अंदर यूरेनाइट नामक खनिज में बहुत कम मात्रा में मिलता है. कई बार एक टन पत्थर से सिर्फ कुछ किलो यूरेनियम ही निकलता है. यही वजह है कि इसकी माइनिंग बेहद महंगी और तकनीकी रूप से कठिन होती है. इसे निकालने के लिए हाईटेक मशीनों और सुरक्षित तकनीकों का इस्तेमाल करना जरूरी होता है.
आर्टिफिशियल ग्राउंड फ्रीजिंग क्या होती है?
यूरेनियम माइनिंग में सबसे बड़ी चुनौती पानी होती है. कई खदानों के ऊपर मोटी सैंडस्टोन लेयर होती है, जिसमें भारी मात्रा में पानी भरा रहता है. अगर सीधे खुदाई की जाए तो खदान में अचानक बाढ़ आ सकती है, जिससे जान-माल का बड़ा खतरा पैदा हो जाता है और पूरा ऑपरेशन फेल हो सकता है.
इसी खतरे से बचने के लिए आर्टिफिशियल ग्राउंड फ्रीजिंग तकनीक अपनाई जाती है. इसमें जमीन में सैकड़ों गहरे छेद किए जाते हैं और उनमें पाइप डाले जाते हैं. इन पाइपों के जरिए बेहद ठंडा लिक्विड घुमाया जाता है, जो आसपास की मिट्टी और पानी को जमाकर एक मजबूत बर्फ की दीवार बना देता है.
यह प्रक्रिया बहुत जोखिम भरी होती
इस प्रक्रिया में आमतौर पर कैल्शियम क्लोराइड ब्राइन का उपयोग किया जाता है, जिसका तापमान करीब -30°C होता है. यह तरल जमीन के अंदर फैलकर पानी को पूरी तरह जमा देता है. इससे खदान के चारों तरफ एक आइस बैरियर बन जाता है, जो पानी के रिसाव को रोकता है और माइनिंग को सुरक्षित बनाता है.
जब बर्फ की दीवार तैयार हो जाती है, तब अंदर ड्रिलिंग शुरू की जाती है. इस दौरान यूरेनियम अयस्क (ore) को सावधानी से निकाला जाता है. अधिकतर काम रिमोट कंट्रोल मशीनों से किया जाता है ताकि मजदूरों को रेडिएशन और दुर्घटनाओं से बचाया जा सके, क्योंकि यह प्रक्रिया बहुत जोखिम भरी होती है.
यूरेनियम निकालने के बाद इसे कई केमिकल और औद्योगिक प्रक्रियाओं से गुजारा जाता है. इसे शुद्ध करके येलोकेक (yellowcake) बनाया जाता है, जो आगे जाकर न्यूक्लियर फ्यूल में बदलता है. इस पूरी प्रक्रिया में जरा-सी गलती भी खतरनाक साबित हो सकती है, इसलिए हर स्टेप पर सख्त निगरानी रखी जाती है.
यूरेनियम का असली उपयोग उसके आइसोटोप यूरेनियम-235 में होता है. जब इस पर न्यूट्रॉन गिरता है, तो यह टूटकर भारी ऊर्जा छोड़ता है. इस प्रक्रिया को नाभिकीय विखंडन कहते हैं, जो न्यूक्लियर पावर प्लांट्स और परमाणु हथियारों की आधारशिला है.
यूरेनियम बेहद खतरनाक क्यों होता है?
प्राकृतिक यूरेनियम में यूरेनियम-235 की मात्रा बहुत कम होती है, इसलिए इसे बढ़ाने की प्रक्रिया को एनरिचमेंट कहा जाता है. बिजली उत्पादन के लिए इसे 3–5% तक ही संवर्धित किया जाता है, जबकि परमाणु हथियारों के लिए 90% से ज्यादा एनरिचमेंट की जरूरत होती है, जिससे इसकी ताकत कई गुना बढ़ जाती है
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यूरेनियम बेहद खतरनाक भी होता है. इसकी धूल अगर सांस के जरिए शरीर में चली जाए तो फेफड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है और कैंसर का खतरा बढ़ जाता है. इसके अलावा रेडिएशन लंबे समय तक शरीर पर असर डाल सकता है, इसलिए माइनिंग और प्रोसेसिंग के दौरान सख्त सुरक्षा उपाय अपनाना बेहद जरूरी होता है.


