नई दिल्ली: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर याचिका दाखिल की गई है. लेकिन इस बार सुनवाई के दौरान अदालत का रुख बेहद सख्त नजर आया. बुधवार को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिका पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि यह जनहित याचिका (PIL) कहीं मीडिया में पब्लिसिटी पाने का जरिया तो नहीं है. हालांकि अदालत ने पहले से लंबित याचिकाओं के बीच इस नई याचिका की प्रासंगिकता पर सवाल उठाए हैं और इसकी मंशा पर भी संदेह जताया है.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने क्या कहा?
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान याचिका पर कड़ी आपत्ति जताई. उन्होंने कहा कि यह जनहित याचिका मीडिया में चर्चा पाने के उद्देश्य से दायर की गई प्रतीत होती है. सीजेआई ने पूछा कि इस याचिका में ऐसा क्या नया है जो पहले से दायर अन्य याचिकाओं में शामिल नहीं था, और पीआईएल की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताई.
इससे पहले जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर अंतरिम रोक लगा दी थी. अदालत ने प्रारंभिक दृष्टि में नियमों को अस्पष्ट बताया और कहा कि इनके व्यापक और संभावित रूप से विभाजनकारी परिणाम हो सकते हैं. पीठ ने यह भी माना कि विनियमों में कुछ ऐसी अस्पष्टताएं हैं जिनके कारण इनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.
याचिकाओं में तर्क दिया गया कि आयोग ने जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को सीमित और गैर-समावेशी रखा है. आरोप है कि विनियमों में भेदभाव को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक सीमित कर दिया गया, जिससे अन्य वर्गों को संस्थागत संरक्षण से बाहर रखा गया. इस आधार पर नियमों को संविधान के समानता सिद्धांत के विरुद्ध बताया गया.
इन नियमों के खिलाफ देश के कई हिस्सों में छात्र संगठनों और विभिन्न समूहों ने विरोध प्रदर्शन किए. प्रदर्शनकारियों की मांग है कि विनियमों को तत्काल वापस लिया जाए या व्यापक परामर्श के बाद संशोधित किया जाए. उनका कहना है कि वर्तमान प्रारूप सामाजिक समावेशन की भावना के अनुरूप नहीं है और इससे शैक्षणिक परिसरों में नई असमानताएं पैदा हो सकती हैं.
FD से ज्यादा ब्याज! इन 3 सरकारी स्कीम्स में पैसा लगाकर पाएं तगड़ा रिटर्न
‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्द्धन हेतु विनियम 2026’ के तहत संस्थानों में गठित समितियों में ओबीसी, एससी, एसटी समुदाय के प्रतिनिधियों के साथ-साथ महिला और दिव्यांग सदस्यों की अनिवार्य भागीदारी का प्रावधान किया गया है. आयोग का उद्देश्य परिसरों में समानता और सुरक्षा सुनिश्चित करना बताया गया है, लेकिन इसकी परिभाषा और दायरे को लेकर ही कानूनी विवाद खड़ा हुआ है.


