Humans Immortal By 2030: इंसान सदियों से अमर होने का सपना देखता आया है. अब यह सपना केवल कहानियों, फिल्मों या कल्पनाओं तक सीमित नहीं रह गया है. दुनिया के प्रसिद्ध भविष्यवक्ता और गूगल के पूर्व इंजीनियर Ray Kurzweil का दावा है कि आने वाले वर्षों में विज्ञान इतनी तेजी से आगे बढ़ेगा कि इंसान की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को रोका जा सकेगा. उनके अनुसार, अगर कोई व्यक्ति 2030 तक जीवित रहता है, तो उसके पास बेहद लंबा जीवन जीने की संभावना हो सकती है.
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नैनोबॉट्स बदल सकते हैं इंसानी शरीर का भविष्य
रे कूर्जवील का मानना है कि 2030 तक नैनोटेक्नोलॉजी इतनी विकसित हो जाएगी कि वैज्ञानिक बेहद सूक्ष्म रोबोट्स यानी ‘नैनोबॉट्स’ तैयार कर लेंगे. ये माइक्रोस्कोपिक रोबोट इंसानी शरीर में इंजेक्ट किए जाएंगे और खून के साथ पूरे शरीर में घूमते रहेंगे.
इनका काम शरीर की कोशिकाओं पर लगातार नजर रखना होगा. जैसे ही कोई सेल डैमेज होगी या कमजोर पड़ेगी, नैनोबॉट्स उसे तुरंत ठीक कर देंगे. इतना ही नहीं, ये तकनीक बूढ़ी हो रही कोशिकाओं को दोबारा सक्रिय और जवान बनाने में भी सक्षम हो सकती है. इससे उम्र बढ़ने की प्रक्रिया काफी हद तक धीमी या पूरी तरह नियंत्रित की जा सकती है.
बीमारियों से पहले ही हो सकेगा बचाव
इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह बताया जा रहा है कि बीमारियां शरीर में फैलने से पहले ही खत्म की जा सकेंगी. नैनोबॉट्स लगातार शरीर की निगरानी करेंगे और किसी भी बीमारी के शुरुआती संकेत मिलते ही उसे रोकने का प्रयास करेंगे. इसका मतलब यह हो सकता है कि भविष्य में इंसान लंबे समय तक स्वस्थ और सक्रिय जीवन जी सकेगा.
क्यों खास मानी जाती हैं रे कूर्जवील की भविष्यवाणियां?
पहली नजर में यह सब किसी साइंस-फिक्शन फिल्म जैसा लग सकता है, लेकिन रे कूर्जवील को तकनीकी दुनिया में गंभीरता से लिया जाता है. उन्होंने वर्षों पहले इंटरनेट क्रांति, स्मार्टफोन के बढ़ते प्रभाव और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के प्रभुत्व जैसी कई भविष्यवाणियां की थीं, जो बाद में सच साबित हुईं. उन्हें अमेरिका के प्रतिष्ठित ‘नेशनल मेडल ऑफ टेक्नोलॉजी’ सम्मान से भी नवाजा जा चुका है. कहा जाता है कि उनकी कई भविष्यवाणियां समय के साथ काफी हद तक सही साबित हुई हैं, इसी वजह से उनकी नई भविष्यवाणियों पर भी दुनिया की नजर बनी हुई है.
2029 तक इंसानी दिमाग के बराबर पहुंच सकता है AI
कूर्जवील का एक और बड़ा दावा है कि 2029 तक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इंसानी दिमाग के स्तर तक पहुंच सकती है और मशहूर ‘ट्यूरिंग टेस्ट’ पास कर लेगी. इसका अर्थ यह होगा कि मशीनें इंसानों की तरह सोचने और व्यवहार करने में सक्षम हो जाएंगी. उनके अनुसार, भविष्य में इंसानी दिमाग सीधे AI से जुड़ सकता है, जिससे याददाश्त, सोचने की क्षमता और निर्णय लेने की ताकत कई गुना बढ़ सकती है.
‘सिंगुलैरिटी’ का दौर बदल सकता है दुनिया
रे कूर्जवील का मानना है कि 2045 तक दुनिया ‘सिंगुलैरिटी’ के दौर में प्रवेश कर सकती है. इस स्थिति में इंसान अपनी चेतना और यादों को डिजिटल रूप में सुरक्षित रखने में सक्षम हो सकता है. यानी जैविक शरीर खत्म होने के बाद भी व्यक्ति की डिजिटल मौजूदगी बनी रह सकती है.
वहीं, Masayoshi Son का भी मानना है कि आने वाले दशकों में सुपर-इंटेलिजेंट मशीनें दुनिया को पूरी तरह बदल सकती हैं और उनमें इंसानों जैसी भावनात्मक समझ भी विकसित हो सकती है.
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आने वाले साल हो सकते हैं सबसे क्रांतिकारी
विज्ञान और तकनीक जिस रफ्तार से आगे बढ़ रही है, उसने यह साफ कर दिया है कि आने वाले कुछ साल मानव इतिहास के सबसे बड़े बदलावों के गवाह बन सकते हैं. हालांकि, इन तकनीकों के फायदे जितने बड़े बताए जा रहे हैं, उनके संभावित खतरे और नैतिक सवाल भी उतने ही गंभीर माने जा रहे हैं.
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