Samrat Chaudhary Political Journey: बिहार की सियासत में एक ऐतिहासिक मोड़ आया है, जहां पहली बार भारतीय जनता पार्टी का मुख्यमंत्री बना है. लंबे समय से इस पल का इंतजार कर रही बीजेपी ने आखिरकार वह मुकाम हासिल कर लिया, जहां वह सिर्फ सत्ता में भागीदार नहीं बल्कि नेतृत्वकर्ता बनकर उभरी है. नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद बीजेपी विधायक दल ने सम्राट चौधरी को अपना नेता चुना और इसके साथ ही उनके सिर मुख्यमंत्री का ताज सज गया.
सम्राट चौधरी का यह सफर बेहद दिलचस्प और उतार-चढ़ाव से भरा रहा है. खास बात यह है कि उनका राजनीतिक बैकग्राउंड न तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा रहा और न ही उन्होंने अपनी सियासी पारी बीजेपी से शुरू की थी. इसके बावजूद उन्होंने बीजेपी में अपनी मजबूत पहचान बनाई और पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं को पीछे छोड़ते हुए शीर्ष पद तक पहुंचे.
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राजनीतिक ऊंचाई उन्हें बीजेपी में ही मिली
सम्राट चौधरी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी से की थी. इसके बाद वे जेडीयू में भी रहे और अंततः करीब 8 साल पहले बीजेपी में शामिल हुए. आरजेडी और जेडीयू में रहते हुए वे विधायक और मंत्री जरूर बने, लेकिन असली राजनीतिक ऊंचाई उन्हें बीजेपी में ही मिली. जिस तेजी से उन्होंने यहां अपनी जगह बनाई, वह उन्हें बाकी नेताओं से अलग करती है.
विरासत में मिली सियासत
सम्राट चौधरी को सियासत विरासत में मिली. उनके पिता शकुनी चौधरी बिहार की राजनीति के एक बड़े ओबीसी चेहरे रहे हैं. उन्होंने कांग्रेस से लेकर समता पार्टी, जेडीयू और आरजेडी तक कई दलों में काम किया और विधायक से लेकर लोकसभा सांसद तक का सफर तय किया. पिता की इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि के सहारे सम्राट ने 90 के दशक में राजनीति में कदम रखा और जल्द ही पहचान बना ली.
सबसे युवा मंत्री बनने के कारण विवादों में भी रहे
1999 में वे राबड़ी देवी की सरकार में मंत्री बने, लेकिन सबसे युवा मंत्री बनने के कारण विवादों में भी आ गए. विपक्ष ने उनकी उम्र को लेकर सवाल उठाए, जिसके चलते उन्हें मंत्री पद छोड़ना पड़ा. हालांकि यह विवाद उनके लिए नुकसानदायक नहीं रहा, बल्कि इससे वे रातों-रात बिहार में चर्चित हो गए और युवाओं के बीच लोकप्रिय चेहरा बनकर उभरे.
इसके बाद 2010 में वे विधायक बने और आरजेडी में एक मजबूत युवा नेता के तौर पर स्थापित हुए. उन्हें पार्टी का मुख्य सचेतक भी बनाया गया, जिससे उनकी राजनीतिक पकड़ और मजबूत हुई. लेकिन समय के साथ उन्होंने सियासी समीकरणों को समझते हुए आरजेडी छोड़ दी और जेडीयू का दामन थाम लिया.
बीजेपी की तरफ बढ़ाए कदम
जेडीयू में उनका कद उस समय बढ़ा जब 2014 में नीतीश कुमार की सरकार अल्पमत में थी और सम्राट ने अहम भूमिका निभाई. इसके बाद वे जीतन राम मांझी सरकार में मंत्री भी बने. हालांकि बाद में जेडीयू में उन्हें अपेक्षित महत्व नहीं मिला, जिससे उनका मोहभंग हो गया और उन्होंने पार्टी छोड़ दी.
इसके बाद उन्होंने बीजेपी का रुख किया और यही फैसला उनके करियर का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ. बीजेपी उस समय अपने संगठन को मजबूत कर रही थी और उसे एक मजबूत ओबीसी चेहरे की जरूरत थी. सम्राट चौधरी इस भूमिका में फिट बैठे. 2017 में बीजेपी में शामिल होने के बाद उन्होंने तेजी से पार्टी में अपनी पकड़ बनाई.
प्रशासनिक अनुभव में भी इजाफा
2019 में उन्हें पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया और इसके बाद उनके संगठनात्मक संबंध और मजबूत होते गए. बीजेपी ने उन्हें ओबीसी चेहरे के तौर पर आगे बढ़ाया और विधान परिषद के जरिए सक्रिय राजनीति में बनाए रखा. नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार में उन्हें पंचायती राज मंत्री भी बनाया गया, जिससे उनके प्रशासनिक अनुभव में भी इजाफा हुआ.
2022 में जब नीतीश कुमार ने बीजेपी से गठबंधन तोड़कर आरजेडी के साथ सरकार बनाई, तब बीजेपी ने सम्राट चौधरी को आगे बढ़ाने का फैसला किया. उन्हें विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष बनाया गया और 2023 में पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया. इस दौरान उन्होंने ‘मुरेठा’ बांधकर नीतीश कुमार को सत्ता से हटाने की कसम खाई, जिसने उन्हें एक आक्रामक और जुझारू नेता के रूप में स्थापित कर दिया.
कैसे बने बीजेपी का सबसे मजबूत चेहरा
सम्राट चौधरी ने ओबीसी राजनीति को साधते हुए खासकर कोइरी-कुशवाहा समाज को बीजेपी के साथ जोड़ने में अहम भूमिका निभाई. उन्होंने नीतीश कुमार के ‘लव-कुश’ वोटबैंक में सेंध लगाई और बीजेपी को सामाजिक समीकरणों में मजबूत किया.
डिप्टी सीएम रहते हुए उन्होंने खुद को एक मजबूत प्रशासक के रूप में स्थापित किया. 2025 के चुनाव में वे विपक्ष के निशाने पर जरूर रहे, लेकिन अपनी राजनीतिक रणनीति और संगठनात्मक पकड़ के दम पर उन्होंने खुद को बीजेपी का सबसे मजबूत चेहरा बना लिया.
तारापुर विधानसभा सीट से जीत ने उनके जनाधार को भी साबित किया. वे कार्यकर्ताओं और नेताओं की आवाज बनकर उभरे, जिससे उनकी स्वीकार्यता लगातार बढ़ती गई. यही कारण रहा कि जब बीजेपी के सामने मुख्यमंत्री चुनने का मौका आया तो सम्राट चौधरी सबसे आगे नजर आए.
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आज वे बिहार के पहले बीजेपी मुख्यमंत्री के रूप में उभरे हैं. यह सिर्फ उनकी व्यक्तिगत सफलता नहीं बल्कि बीजेपी की लंबी राजनीतिक रणनीति का भी परिणाम है. सम्राट चौधरी का यह सफर बताता है कि बदलते राजनीतिक दौर में रणनीति, सामाजिक समीकरण और नेतृत्व क्षमता किस तरह किसी नेता को शिखर तक पहुंचा सकती है.


