Lucknow, August 19: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं. बहुजन समाज पार्टी यानी बसपा भी अपने पुराने जनाधार को वापस पाने की कोशिश में जुटी है. पार्टी प्रमुख मायावती आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर सक्रिय हैं और पार्टी की रणनीति को मजबूत करने में लगी हैं.
बसपा की रणनीति में 2007 के सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले की झलक दिखाई दे रही है. उस समय दलित-ब्राह्मण गठजोड़ के जरिए पार्टी ने उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई थी. अब एक बार फिर इसी सामाजिक समीकरण को मजबूत करने की कोशिश के बीच मायावती ने पार्टी के प्रमुख ब्राह्मण चेहरे सतीश चंद्र मिश्रा को अहम जिम्मेदारी दी है.
सतीश चंद्र मिश्रा को मिली बड़ी जिम्मेदारी
मायावती ने बसपा के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा की भूमिका बढ़ा दी है. मायावती ने बुधवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इसकी जानकारी दी.
अब सतीश चंद्र मिश्रा के पास लीगल और मीडिया से जुड़े कामों के साथ-साथ चुनाव आयोग से संबंधित महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी रहेंगी. विधानसभा चुनाव के दौरान निर्वाचन आयोग से जुड़े मामलों में उनकी भूमिका अहम होगी.
पार्टी स्तर पर चुनावी प्रक्रिया, कानूनी मामलों और मीडिया से जुड़े कामों के अलावा अब निर्वाचन आयोग से संबंधित जिम्मेदारियां भी सतीश चंद्र मिश्रा संभालेंगे.
बसपा में लंबे समय से अहम भूमिका में हैं मिश्रा
सतीश चंद्र मिश्रा लंबे समय से बसपा के राष्ट्रीय महासचिव हैं. वह मायावती सरकार के दौरान उत्तर प्रदेश के महाधिवक्ता और कैबिनेट मंत्री भी रह चुके हैं.
इसके अलावा वह उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के कई बार अध्यक्ष रहे हैं. सतीश चंद्र मिश्रा बसपा की ओर से कई बार राज्यसभा सांसद भी रह चुके हैं.
कानूनी मामलों में उनकी विशेषज्ञता और पार्टी के भीतर लंबे राजनीतिक अनुभव को देखते हुए चुनाव से जुड़ी जिम्मेदारियों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है.
आकाश आनंद के बाद मिश्रा को आगे करने की तैयारी
बसपा प्रमुख मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को भी चुनाव प्रचार में सक्रिय किया है. अब सतीश चंद्र मिश्रा को नई जिम्मेदारी दिए जाने को पार्टी की चुनावी रणनीति के विस्तार के तौर पर देखा जा रहा है.
मायावती की कोशिश सर्वसमाज के बीच पार्टी की पकड़ मजबूत करने की है. इसी रणनीति में ब्राह्मण मतदाताओं तक पार्टी की पहुंच बढ़ाने के लिए सतीश चंद्र मिश्रा को आगे करने का फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
2007 के सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले पर नजर
बसपा की चुनावी रणनीति में दलित-ब्राह्मण गठजोड़ को एक बार फिर महत्व दिया जा रहा है. 2007 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने सोशल इंजीनियरिंग के जरिए सत्ता हासिल की थी.
अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले मायावती उसी सामाजिक समीकरण को नए तरीके से मजबूत करने की कोशिश कर रही हैं. सतीश चंद्र मिश्रा को चुनाव आयोग, कानूनी मामलों और मीडिया से जुड़ी अहम जिम्मेदारी देना भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.
संभावित उम्मीदवारों के चयन पर भी काम
मायावती इन दिनों विधानसभा चुनाव के लिए संभावित उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया में भी जुटी हुई हैं. विधानसभा स्तर पर कार्यकर्ता सम्मेलनों का आयोजन किया जा रहा है और इन सम्मेलनों में प्रत्याशियों के नामों की घोषणा भी की जा रही है.
ऐसे समय में पार्टी के प्रमुख नेताओं की जिम्मेदारियों में बदलाव और विस्तार को चुनावी तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है. बसपा अपने संगठन को सक्रिय करने के साथ-साथ अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है.
अनंत मिश्रा के निष्कासन के बाद आया फैसला
मायावती का यह फैसला ऐसे समय में सामने आया है, जब पिछले सप्ताह सतीश चंद्र मिश्रा के भांजे अनंत मिश्रा उर्फ अंटू को पार्टी से बाहर कर दिया गया था.
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इसके बाद सतीश चंद्र मिश्रा को बड़ी जिम्मेदारी दिए जाने से पार्टी के भीतर और बाहर चल रहे राजनीतिक कयासों को भी विराम देने की कोशिश के तौर पर इसे देखा जा रहा है.
अब सतीश चंद्र मिश्रा के पास चुनावी प्रक्रिया, कानूनी मामलों, मीडिया और निर्वाचन आयोग से जुड़े कामों की जिम्मेदारी होगी. 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बसपा की यह रणनीति पार्टी के सामाजिक और संगठनात्मक विस्तार के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है.


