Hamari Ramleela Documentary: शहर बदल रहे हैं. खुली ज़मीनें सिमट रही हैं. परंपराएँ धीरे-धीरे भीड़ और शोर में दबती जा रही हैं लेकिन दिल्ली के एक कामकाजी मोहल्ले में हर साल कुछ ऐसा होता है, जो इस धारणा को तोड़ देता है. यहां रामलीला किसी सरकारी मंच पर नहीं, बल्कि लोगों की ज़िंदगी के बीच, गलियों और उधार ली गई जगहों पर रची जाती है. इसी जीवित परंपरा को बेहद करीब से दर्ज करती है डॉक्यूमेंट्री ‘हमारी रामलीला’.
यह फिल्म रामलीला को एक भव्य धार्मिक आयोजन की तरह नहीं बल्कि मानवीय मेहनत, सामूहिक भरोसे और रोज़मर्रा के संघर्ष की कहानी के रूप में सामने लाती है.
जहां मंच नहीं, वहां लोग बनाते हैं रंगमंच
‘हमारी रामलीला’ उस शहरी समुदाय की दुनिया में ले जाती है, जहां न कोई सरकारी फंड है, न कोई संस्थागत सहारा. दिहाड़ी मज़दूर, दुकानदार, छात्र, महिलाएं और बुज़ुर्ग, सब मिलकर तय करते हैं कि इस साल रामलीला कैसे होगी.
कहीं कोई दिन की मजदूरी छोड़कर सेट बना रहा है, तो कोई दुकान बंद कर रिहर्सल में पहुंच रहा है. पोशाकें घरों में सिली जाती हैं, संवाद याददाश्त से चलते हैं और मंच अस्थायी ढांचों पर खड़ा होता है. फिल्म इन अदृश्य श्रमों को सामने लाती है, जो अक्सर दर्शकों की तालियों में खो जाते हैं.

रामलीला एक दिन का आयोजन नहीं, साल भर चलने वाली प्रक्रिया
यह डॉक्यूमेंट्री रामलीला को “शो” नहीं मानती. कैमरा उस प्रक्रिया के साथ चलता है, जो महीनों पहले शुरू होती है. जगह तलाशने से लेकर समय तय करने तक, और हर छोटी-बड़ी बातचीत तक.
फिल्म दिखाती है कि कैसे बिना लिखित स्क्रिप्ट और औपचारिक प्रशिक्षण के, पीढ़ियों से यह सांस्कृतिक ज्ञान आगे बढ़ता है. बच्चे बड़ों को देखकर सीखते हैं, नए कलाकार पुराने कलाकारों से संवाद पकड़ते हैं. परंपरा यहां किताबों में नहीं, लोगों के जीवन में सांस लेती है.
शहर, जगह और संघर्ष
जैसे-जैसे शहर फैलते हैं, सार्वजनिक स्थान घटते जाते हैं. ‘हमारी रामलीला’ इस बदलाव को बेहद संवेदनशील ढंग से दर्ज करती है. कभी सड़क पर मंच लगता है, कभी किसी खाली प्लॉट में. हर साल हालात नए होते हैं, लेकिन जिद वही रहती है- रामलीला होगी.
यही संघर्ष इस फिल्म को आज के शहरी भारत के लिए बेहद प्रासंगिक बनाता है. यह सवाल उठाती है- क्या परंपराएं सिर्फ सरकारी संरक्षण से ही जिंदा रह सकती हैं, या समुदाय की साझी जिम्मेदारी भी काफी है?

चुपचाप देखने वाली नजर
फिल्म की खास बात इसका ऑब्ज़र्वेशनल एथ्नोग्राफिक अंदाज़ है. निर्देशक रिंकू शर्मा कैमरे को उपदेश देने वाला नहीं बनाते. वे लोगों को खुद बोलने देते हैं- अपने शब्दों में, अपने अनुभवों के साथ. कैमरा कभी मंच पर है, तो कभी घरों के अंदर. कहीं थकान है, कहीं हंसी, कहीं बहस, तो कहीं अपार लगाव. यही ईमानदारी ‘हमारी रामलीला’ को एक जीवंत दस्तावेज़ बना देती है.
देखिए फिल्म का ट्रेलर
दुनिया तक पहुंचती एक मोहल्ले की आवाज़
फिल्म का डायरेक्टर कट (2025) अब देश-विदेश में क्यूरेटेड स्क्रीनिंग्स के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है. इसे न्यू दिल्ली फिल्म फेस्टिवल 2026 (इंटरनेशनल) में आधिकारिक नामांकन मिला है और पहले यह FIPRESCI-India Grand Prix 2024 में भी सराही जा चुकी है.
आने वाले महीनों में यह डॉक्यूमेंट्री विश्वविद्यालयों, सांस्कृतिक संस्थानों और भारतीय दूतावासों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंचेगी, जहां रामलीला सिर्फ धार्मिक कथा नहीं, बल्कि सामुदायिक जीवन का आईना बनकर उभरेगी.
क्यों ज़रूरी है ‘हमारी रामलीला’?
यह फिल्म याद दिलाती है कि परंपराएँ सिर्फ मंचों पर नहीं टिकतीं, वे लोगों की मेहनत, विश्वास और सामूहिक स्मृति से जीवित रहती हैं. ‘हमारी रामलीला’ सिर्फ एक डॉक्यूमेंट्री नहीं- यह उन अनगिनत लोगों को सलाम है, जो हर साल चुपचाप संस्कृति को संभाले रखते हैं.

डायरेक्चर रिंकू शर्मा का कहना है कि एक तरफ जहां लोग रामायण से जुड़ी छोटी-छओटी बातों पर नाक-मुंह बनाने लगते हैं, वहीं, दूसरी तरफ इस रामलीला को देखने के लिए आने वाले लोगों के सामने जब तक मजेदार और देसी भाषा का यूज न किया जाए, उनके चेहरे पर मुस्कान तक नहीं आती है.
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जानिए डायरेक्टर रिंकू शर्मा के बारे में
रिंकू शर्मा मुंबई स्थित लेखक और निर्देशक हैं. वे डॉक्यूमेंट्री, फीचर फ़िल्म, ऑडियो शो और थिएटर में सक्रिय हैं. हमारी रामलीला के निर्देशक और सर जी व तरंग के लेखक रिंकू, अपनी ज़मीनी और सामाजिक कहानियों के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने कहानी खतरनाक गोई और रियल क्राइम स्टोरीज़ जैसे ऑडियो प्रोजेक्ट्स पर भी काम किया है.


