नई दिल्ली: हिंदू धर्म में पूजा-पाठ, व्रत, त्योहार और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि किसी भी शुभ कार्य या पूजा को शुरू करने से पहले ‘संकल्प’ लेना क्यों अनिवार्य माना जाता है? मान्यताओं के अनुसार, बिना संकल्प के की गई पूजा अधूरी मानी जाती है. आइए जानते हैं इसके पीछे का धार्मिक, ज्योतिषीय और वैज्ञानिक कारण…
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क्या होता है संकल्प का अर्थ?
आमतौर पर संकल्प का अर्थ किसी कार्य को करने की दृढ़ इच्छाशक्ति से है. पूर्ण श्रद्धा, आत्मविश्वास और एकाग्रता के साथ किसी शुभ कार्य को पूरा करने की मानसिक धारणा को ही संकल्प कहते हैं. शास्त्रों के अनुसार, दान और यज्ञ का पूर्ण पुण्य तभी प्राप्त होता है जब उन्हें संकल्प के साथ पूरा किया जाए.
मनुस्मृति में भी संकल्प के महत्व को रेखांकित करते हुए लिखा गया है.
संकल्पमूलः कामयो वै यज्ञः संकल्पसंभवा:.
व्रतानि यमधर्मश्च सर्वे संकल्पजाः स्मृताः॥ (मनुस्मृति 2/3)
अर्थात, सभी कामनाओं का मूल संकल्प ही है. यज्ञ, व्रत और समस्त धर्मानुष्ठान संकल्प से ही उत्पन्न और पूर्ण होते हैं.
संकल्प क्यों है अनिवार्य?
ज्योतिष शास्त्र और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, संकल्प देवी-देवताओं के प्रति एक प्रतिज्ञा है. इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं, संकल्प लेते समय हम भगवान को साक्षी मानकर अपनी मनोकामना और कार्य पूर्ति का वचन देते हैं. संकल्प मंत्र के माध्यम से व्यक्ति को अपने गोत्र, नाम, कुल और जाति का स्मरण रहता है, जिससे गौरव की अनुभूति होती है. सच्चे मन से लिया गया संकल्प व्यक्ति के भीतर नकारात्मकता और दुष्कर्मों का नाश कर नई शक्ति और स्फूर्ति का संचार करता है.
संकल्प में जल का महत्व और वरुण देव का दंड
पूजा के दौरान पुरोहित (पंडित जी) यजमान के हाथ में जल, अक्षत और फूल देकर संकल्प कराते हैं. हाथ में जल लेने के पीछे गहरा धार्मिक रहस्य है, बता दें कि वेदों में कहा गया है कि ‘अप्सु वै वरुण’ अर्थात जल में वरुण देव का निवास है.
वचन तोड़ने पर दंड
‘अनृते खलु वै क्रियमाणे वरुणो गृह्णति’ के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति हाथ में जल लेकर संकल्प पूरा नहीं करता, तो वरुण देव उसे कठोर दंड देते हैं. इसलिए जल हाथ में लेकर प्रतिज्ञा करने के बाद व्यक्ति उस कार्य को पूरा करने के लिए बाध्य हो जाता है.
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दैनिक पूजा के लिए मुख्य संकल्प मंत्र
यदि आप घर पर नियमित पूजा करते हैं, तो हाथ में जल और अक्षत लेकर इस सरल मंत्र का जाप कर सकते हैं.
“ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः, ॐ अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे… मम आत्मनः (अपना नाम लें) समस्त दुरितक्षयपूर्वकं मनोवाञ्छित फलसिद्ध्यर्थम्… (अपनी मनोकामना बोलें) करिष्ये.”
स्रोत: ‘हिंदुओं के रीति रिवाज तथा मान्यताएं’, पुस्तक महल, दिल्ली


