छत्तीसगढ़ का कोरबा जिला जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बना रहा है. केंद्रीय आवास और शहरी कार्य मंत्रालय की पहल “कैच द रेन – व्हेयर इट फॉल्स, व्हेन इट फॉल्स” अभियान के तहत जिले में किए गए कार्यों को महत्वपूर्ण सफलता मिली है. जल संकट से जूझ रहे कोरबा में अब वर्षा जल के संरक्षण और जल निकायों के पुनर्जीवन की दिशा में व्यापक प्रयास किए जा रहे हैं.
जल संकट से जूझ रहे कोरबा को मिला नया समाधान
हसदेव नदी के किनारे स्थित होने के बावजूद कोरबा लंबे समय से जल संकट की समस्या का सामना कर रहा था. इसी चुनौती को देखते हुए केंद्रीय आवास और शहरी कार्य मंत्रालय ने जिले को “कैच द रेन” अभियान से जोड़ा.
इस अभियान का उद्देश्य वर्षा जल का अधिकतम संरक्षण करना, भूजल स्तर में सुधार लाना और जल निकायों का पुनर्जीवन करना है, ताकि भविष्य में जल संकट की स्थिति को कम किया जा सके.
ISRO ने की संवेदनशील क्षेत्रों की मैपिंग
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने देश के 10 अति संवेदनशील क्षेत्रों की मैपिंग के दौरान कोरबा की पहचान ऐसे जिले के रूप में की, जहां भूजल स्तर काफी नीचे पहुंच चुका था.
सर्वेक्षण में यह भी सामने आया कि बारिश के दौरान बड़ी मात्रा में पानी नालियों के माध्यम से सीधे नदी में बह जाता था, जिससे वर्षा जल का पर्याप्त संरक्षण नहीं हो पा रहा था.
‘जल संचय – जन भागीदारी’ मिशन पर विशेष जोर
कोरबा के कलेक्टर कुणाल दुदावत ने बताया कि जिले में “कैच द रेन” अभियान और “जल संचय – जन भागीदारी” मिशन के तहत जल संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है.
उन्होंने कहा कि प्रशासन का उद्देश्य वर्षा जल का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करना, भूजल स्तर में सुधार लाना और लोगों को जल संरक्षण के प्रति जागरूक बनाना है. इसके लिए विभिन्न स्तरों पर जनभागीदारी को भी बढ़ावा दिया जा रहा है.
जल संरक्षण को मिल रही नई दिशा
जिले में जल संरक्षण को लेकर किए जा रहे प्रयासों से वर्षा जल के बेहतर प्रबंधन और जल संसाधनों के संरक्षण की दिशा में सकारात्मक परिणाम मिलने की उम्मीद है. प्रशासन का मानना है कि जनभागीदारी और वैज्ञानिक योजना के माध्यम से जल संकट जैसी चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटा जा सकता है.
स्रोत: केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय / जिला प्रशासन, कोरबा.


