वैश्विक बाजार में सोना और चांदी एक बार फिर दबाव में आ गए हैं. अमेरिका से आए मजबूत रोजगार आंकड़ों के बाद निवेशकों की धारणा में बड़ा बदलाव देखने को मिला, जिसके चलते दोनों कीमती धातुओं में तेज गिरावट दर्ज की गई. बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मजबूती ने निवेशकों को यह संकेत दिया है कि ब्याज दरों में जल्द कटौती की संभावना कम हो सकती है.
यही कारण है कि डॉलर मजबूत हुआ और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी देखने को मिली. इन दोनों घटनाओं का सीधा असर सोने और चांदी की कीमतों पर पड़ा.
रोजगार आंकड़ों ने क्यों बदला बाजार का रुख?
अमेरिका के ताजा रोजगार आंकड़े उम्मीद से बेहतर रहे. इससे यह संकेत मिला कि वहां की अर्थव्यवस्था अभी भी मजबूत स्थिति में है और रोजगार बाजार में कमजोरी नहीं आई है.
जब रोजगार और आर्थिक गतिविधियां मजबूत रहती हैं तो निवेशक यह मानने लगते हैं कि केंद्रीय बैंक को ब्याज दरों में जल्द राहत देने की जरूरत नहीं पड़ेगी. इसी सोच ने बाजार की दिशा बदल दी.
विशेषज्ञों के अनुसार मजबूत आर्थिक आंकड़ों ने सुरक्षित निवेश माने जाने वाले सोने की मांग को कुछ समय के लिए कमजोर कर दिया.
डॉलर मजबूत होने से सोने पर कैसे पड़ता है असर?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत डॉलर में तय होती है. जब अमेरिकी डॉलर मजबूत होता है तो अन्य देशों के निवेशकों के लिए सोना खरीदना अपेक्षाकृत महंगा हो जाता है.
इसका परिणाम यह होता है कि मांग में कमी आ सकती है और कीमतों पर दबाव बढ़ जाता है.
हाल के कारोबारी सत्र में भी यही देखने को मिला, जहां डॉलर इंडेक्स में मजबूती के साथ सोने की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई.
चांदी में गिरावट क्यों रही ज्यादा?
चांदी को अक्सर सोने की तुलना में अधिक उतार-चढ़ाव वाला निवेश माना जाता है.
इसके पीछे दो प्रमुख कारण हैं:
- चांदी निवेश धातु होने के साथ-साथ औद्योगिक धातु भी है.
- बाजार में जोखिम बढ़ने पर चांदी की कीमतों में तेज बदलाव देखने को मिलता है.
इसी वजह से कई बार सोने की तुलना में चांदी में अधिक गिरावट या अधिक तेजी दिखाई देती है.
इस बार भी चांदी में सोने से ज्यादा कमजोरी देखने को मिली.
बॉन्ड यील्ड बढ़ने से क्या होता है?
जब अमेरिकी सरकारी बॉन्ड पर मिलने वाला रिटर्न बढ़ता है तो निवेशकों को बिना जोखिम वाले निवेश से बेहतर आय मिलने लगती है.
ऐसी स्थिति में कुछ निवेशक सोने जैसे गैर-ब्याज देने वाले निवेशों से पैसा निकालकर बॉन्ड बाजार की ओर रुख कर सकते हैं.
इसी कारण बॉन्ड यील्ड में वृद्धि को आमतौर पर सोने के लिए नकारात्मक माना जाता है.
क्या फेडरल रिजर्व की नीति है वजह?
बाजार की बड़ी चिंता अमेरिकी फेडरल रिजर्व की अगली रणनीति को लेकर है.
यदि महंगाई और रोजगार दोनों मजबूत बने रहते हैं तो ब्याज दरों में कटौती का रास्ता कठिन हो सकता है.
निवेशक अब आने वाले महीनों में:
- महंगाई के आंकड़े
- फेड अधिकारियों के बयान
- रोजगार रिपोर्ट
- आर्थिक विकास के आंकड़े
पर विशेष नजर रखेंगे.
इन संकेतकों के आधार पर ही सोने और चांदी की आगे की दिशा तय हो सकती है.
भारतीय बाजार पर क्या असर पड़ सकता है?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में गिरावट का असर भारत के सर्राफा बाजार पर भी देखने को मिल सकता है.
हालांकि भारतीय कीमतें केवल अंतरराष्ट्रीय दरों पर निर्भर नहीं करतीं. इनमें कई अन्य कारक भी भूमिका निभाते हैं:
- डॉलर-रुपया विनिमय दर
- आयात शुल्क
- स्थानीय मांग
- शादी और त्योहारों का सीजन
इसी वजह से वैश्विक गिरावट का पूरा असर भारतीय बाजार में हमेशा समान रूप से नहीं दिखाई देता.
निवेशकों को क्या करना चाहिए?
विशेषज्ञों का मानना है कि अल्पकालिक उतार-चढ़ाव को देखकर जल्दबाजी में निर्णय लेने से बचना चाहिए.
यदि कोई निवेशक लंबी अवधि के लिए सोना या चांदी खरीदता है, तो उसे केवल एक दिन या एक सप्ताह की कीमतों के आधार पर फैसला नहीं करना चाहिए.
बाजार में उतार-चढ़ाव निवेश का सामान्य हिस्सा माना जाता है और वैश्विक आर्थिक घटनाएं समय-समय पर कीमतों को प्रभावित करती रहती हैं.
IIT में दाखिले की उम्मीद बरकरार! 75% से कम अंक वाले छात्रों को भी मिला बड़ा मौका
आगे क्या रह सकती है दिशा?
आने वाले दिनों में निवेशकों की नजर अमेरिकी महंगाई के आंकड़ों और फेडरल रिजर्व की अगली बैठक पर रहेगी.
यदि आर्थिक आंकड़े लगातार मजबूत बने रहते हैं तो सोने और चांदी पर दबाव जारी रह सकता है. वहीं यदि ब्याज दरों में कटौती की संभावना बढ़ती है तो कीमती धातुओं में फिर से खरीदारी लौट सकती है.
फिलहाल बाजार में सतर्कता का माहौल है और निवेशक अगले बड़े आर्थिक संकेत का इंतजार कर रहे हैं.


