Jaisalmer fort untold story: राजस्थान की रेत में इतिहास की ऐसी अनगिनत कहानियां दबी हैं, जो आज भी पत्थरों और शिलालेखों में सांस लेती हैं. इन्हीं में से एक रोचक किस्सा जैसलमेर का है- एक ऐसी नर्तकी की कहानी, जिसका नाम आज भी किले के बाहर बने एक प्रवेश द्वार पर अमिट रूप से दर्ज है. यह कहानी है टीलों बाई की- कला, आश्रय, विरोध और चतुराई से इतिहास रच देने की दास्तान.
कैसे पड़ा टीलों की पोल नाम
बताया जाता है कि जब जैसलमेर के महाराज गड़सी सिंह ने जैसलमेर किला का निर्माण करवाया, तब किले के बाहर एक भव्य प्रवेश द्वार बनवाया गया. यह द्वार आज ‘टीलों की पोल’ के नाम से जाना जाता है. किले के बाहर गड़ीसर झील के पास स्थित इस पोल का निर्माण महाराज की आज्ञा से टीलों नाम की एक गणिका (नर्तकी) ने करवाया था. इसी कारण इसका नाम टीलों की पोल पड़ा.
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महाराज ने भी टीलों बाई को अपने दरबार में आश्रय दिया
इतिहास के पन्ने बताते हैं कि राजशाही काल में कलाकारों को दरबार में संरक्षण दिया जाता था. जैसलमेर के महाराज ने भी टीलों बाई को अपने दरबार में आश्रय दिया. टीलों बाई दरबार की पॉपुलर नर्तकी थीं और उनके संरक्षण में यह प्रवेश द्वार अस्तित्व में आया.

कब समस्य बना पोल
इतिहासकार तने सिंह राव सोडा के अनुसार, शुरुआत में महाराज ने किले के प्रवेश द्वार पर इस पोल (घर) के निर्माण की अनुमति दे दी थी. लेकिन समय के साथ समस्या खड़ी हुई. गणगौर सवारी के दौरान, जब माता गणगौर को लेकर राजा किले में प्रवेश करते थे, तब कुछ लोगों ने धार्मिक भावनाओं का हवाला देते हुए नर्तकी के इस घर को हटाने की मांग रखी. दबाव बढ़ा और महाराज ने पोल को हटाने का निर्णय भी ले लिया.

टीलोबाई ने रख दी शिव प्रतिमा
जब यह खबर टीलों बाई तक पहुंची कि उनका घर गिराया जा सकता है, तो उन्होंने घबराने के बजाय समझदारी दिखाई. अनुभवी लोगों की सलाह पर टीलों बाई ने एक चतुर कदम उठाया. उन्होंने गड़ीसर झील के पास बने इस प्रवेश द्वार पर भगवान शिव की मूर्ति स्थापित कर दी. शिव प्रतिमा स्थापित होते ही स्थिति बदल गई. धार्मिक आस्था से जुड़े होने के कारण महाराज ने पोल को ढहाने का फैसला त्याग दिया.

कहा जाता है कि टीलों बाई मूल रूप से भोपाल की रहने वाली थीं. 18वीं सदी में वे जैसलमेर पहुंचीं और राजदरबार में उन्हें संरक्षण मिला. टीलों बाई को लोग केवल एक कलाकार के रूप में ही नहीं, बल्कि एक परोपकारी महिला के तौर पर भी याद करते हैं.
आज भी टीलों की पोल जैसलमेर के इतिहास की उस अनकही ताकत की गवाही देती है, जहां एक कलाकार की बुद्धिमत्ता ने पत्थरों में अपनी अमर छाप छोड़ दी.


