Kanpur Kidney Racket: उत्तर प्रदेश के कानपुर से सामने आए किडनी तस्करी रैकेट ने पूरे प्रदेश को हिला दिया है. इस सनसनीखेज मामले में बड़ा खुलासा हुआ है कि जो शख्स खुद को डॉ. अली बताकर किडनी ट्रांसप्लांट करता था, वह असल में डॉक्टर नहीं बल्कि एक लैब टेक्नीशियन था. पुलिस जांच में सामने आया कि उसने फर्जी पहचान बनाकर कई अवैध सर्जरी को अंजाम दिया, जिससे पूरे मेडिकल सिस्टम की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं.
पुलिस की छापेमारी और जांच
कानपुर पुलिस ने गाजियाबाद के उत्तम नगर स्थित कथित डॉ. अली के घर पर छापा मारा, वहीं इंदिरा नगर के न्याय खंड वन में डॉ. रोहित के फ्लैट पर ताला मिला. इससे साफ है कि आरोपी पहले से फरार थे और उन्हें भनक लग चुकी थी, जिससे जांच एजेंसियों के सामने चुनौती और बढ़ गई है.
मेरठ कनेक्शन सामने आया
जांच में मेरठ के कई डॉक्टरों और एजेंट्स की भूमिका सामने आई है. पुलिस जब डॉक्टर वैभव के क्लीनिक पहुंची तो पता चला कि वह डेंटिस्ट है. वहीं मेरठ की एक टीम डोनर तलाशने और मरीज-डोनर के बीच संपर्क स्थापित करने का काम करती थी, जिससे रैकेट का नेटवर्क और गहरा दिखाई देता है.
डोनर स्क्रीनिंग की प्रक्रिया
किडनी डोनर आयुष की प्रारंभिक स्क्रीनिंग मेरठ के अल्फा हॉस्पिटल में की गई थी. इससे संकेत मिलता है कि इस रैकेट में मेडिकल जांच की आड़ में पूरी प्रक्रिया को वैध दिखाने की कोशिश की जाती थी, ताकि कानून से बचा जा सके और ट्रांसप्लांट को “सामान्य” ऑपरेशन जैसा दिखाया जा सके.
संदिग्ध अस्पतालों की भूमिका
जांच में कानपुर के मिडी लाइफ हॉस्पिटल का नाम भी सामने आया, हालांकि यह अस्पताल मार्च में बंद हो चुका है. इसके अलावा आहूजा, मेड लाइफ और प्रिया हॉस्पिटल भी जांच के घेरे में हैं, जहां संदिग्ध ट्रांसप्लांट गतिविधियों के संकेत मिले हैं और रिकॉर्ड की गहन जांच जारी है.
STF की बड़ी कार्रवाई
STF, विजिलेंस और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीम ने कई ठिकानों पर एक साथ छापेमारी कर इस पूरे रैकेट का भंडाफोड़ किया. कार्रवाई के दौरान एक डॉक्टर दंपत्ति समेत कई दलालों को हिरासत में लिया गया और महत्वपूर्ण दस्तावेज व इलेक्ट्रॉनिक सबूत बरामद किए गए, जो केस को मजबूत बना रहे हैं.
‘काली सर्जरी’ का खेल
जांच में सामने आया कि कुछ डॉक्टर लखनऊ से आकर कानपुर में अवैध ट्रांसप्लांट करते थे, जिन्हें “काली सर्जरी” कहा जा रहा है. एक किडनी के लिए करीब 60 लाख रुपये तक वसूले जाते थे, जबकि डोनर को केवल 8–9 लाख रुपये दिए जाते थे और बाकी रकम डॉक्टरों व दलालों में बांट ली जाती थी.
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इंटर-स्टेट नेटवर्क का शक
इस रैकेट के तार उत्तराखंड, मेरठ और अन्य राज्यों से जुड़े पाए गए हैं, जिससे यह एक बड़े इंटर-स्टेट गिरोह का हिस्सा लगता है. जांच एजेंसियों को आशंका है कि आने वाले दिनों में कई बड़े नाम सामने आ सकते हैं. प्रशासन ने दोषियों पर सख्त कार्रवाई और पूरे नेटवर्क को खत्म करने का भरोसा दिया है.


