भारत में मौसम और जलवायु को लेकर एक बड़ी चिंता सामने आई है. देश के 188 वैज्ञानिकों और पारिस्थितिकीविदों ने 2026-27 में संभावित बेहद शक्तिशाली अल-नीनो को लेकर तैयारी बढ़ाने की अपील की है. वैज्ञानिकों ने कहा है कि आने वाले महीनों में गर्मी, सूखा और मौसम में असामान्य बदलाव का असर केवल इंसानों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि जंगल, खेती, समुद्री जीवन और वन्यजीवों पर भी पड़ सकता है. यह अपील 16 सितंबर 2026 को प्रकाशित की गई थी.
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क्या है अल-नीनो और क्यों बढ़ी चिंता?
अल-नीनो प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय हिस्से में समुद्र की सतह के पानी के असामान्य रूप से गर्म होने से जुड़ी जलवायु घटना है. इसका प्रभाव दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बारिश और तापमान के पैटर्न पर पड़ सकता है. भारत में अल-नीनो को अक्सर कमजोर मानसून और अधिक गर्म परिस्थितियों से जोड़ा जाता है, लेकिन हर अल-नीनो के दौरान एक जैसा असर होना जरूरी नहीं है.
विश्व मौसम विज्ञान संगठन यानी WMO ने 3 सितंबर 2026 को कहा था कि मौजूदा अल-नीनो आने वाले महीनों में बहुत मजबूत हो सकता है और इसके प्रभाव 2027 तक जारी रह सकते हैं. WMO के पूर्वानुमानों में फरवरी 2027 तक इसके बने रहने की संभावना करीब 100 प्रतिशत बताई गई थी.
प्रशांत महासागर में बढ़ रहा तापमान
वैज्ञानिकों की चिंता का एक कारण प्रशांत महासागर का बढ़ता तापमान है. रिपोर्ट के मुताबिक अगस्त 2026 में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य स्तर से 2.6 डिग्री सेल्सियस से अधिक ऊपर पहुंच गया था. कुछ पूर्वानुमानों में तापमान की विसंगति 4 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा होने की संभावना जताई गई है.
भारत के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने भी अगस्त में बताया था कि INCOIS के आकलन के अनुसार मई 2026 में विकसित हुई अल-नीनो स्थितियां जून 2026 से फरवरी 2027 तक जारी रहने की संभावना थी. इसके लिए अलग-अलग समय पर 70 से 90 प्रतिशत तक पूर्वानुमान संभावना बताई गई थी.
गर्मी और सूखे का बढ़ सकता है खतरा
वैज्ञानिकों ने आने वाले समय में अत्यधिक गर्मी और सूखे की स्थिति को लेकर चिंता जताई है. कम बारिश और बढ़ते तापमान से मिट्टी में नमी घट सकती है और जल संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है.
इसका असर खेती पर भी पड़ सकता है. किसान बारिश और तापमान में बदलाव के प्रति काफी संवेदनशील होते हैं. लंबे समय तक गर्म और शुष्क मौसम रहने पर फसलों और ग्रामीण आजीविका पर दबाव बढ़ सकता है. चरवाहों के सामने चारे और पानी की समस्या भी बढ़ सकती है.
जंगलों में आग और पेड़ों पर असर
गर्मी और सूखे की लंबी अवधि जंगलों के लिए भी चुनौती पैदा कर सकती है. सूखी वनस्पति के कारण जंगलों में आग का खतरा बढ़ सकता है. वैज्ञानिकों ने खास तौर पर बड़े पेड़ों और उष्णकटिबंधीय वनों की स्थिति पर निगरानी बढ़ाने की जरूरत बताई है.
भारतीय वैज्ञानिकों ने पश्चिमी घाट के बड़े पेड़ों को लेकर भी चिंता जताई है. लंबे समय तक सूखा और गर्मी ऐसे पेड़ों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकते हैं. शहरों में मौजूद पेड़ भी शहरी गर्मी के प्रभाव के कारण जोखिम में हो सकते हैं.
वन्यजीवों और प्रकृति पर भी असर
मौसम में बड़ा बदलाव केवल तापमान और बारिश के आंकड़ों तक सीमित नहीं रहता. इससे जानवरों के भोजन, प्रजनन और रहने के स्थान में बदलाव आ सकता है. वैज्ञानिकों ने इस तरह के कम दिखाई देने वाले पर्यावरणीय बदलावों को भी दर्ज करने की जरूरत बताई है.
अगर तापमान और बारिश का पैटर्न तेजी से बदलता है तो अलग-अलग प्रजातियों के बीच प्राकृतिक संतुलन प्रभावित हो सकता है. यही वजह है कि वैज्ञानिकों ने घटना के दौरान लगातार निगरानी और फील्ड रिसर्च बढ़ाने की अपील की है.
समुद्र और मछुआरों पर भी पड़ सकता है असर
अल-नीनो का प्रभाव समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर भी पड़ सकता है. समुद्र का तापमान बढ़ने से मरीन हीटवेव और कोरल ब्लीचिंग जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है.
समुद्र के तापमान और परिस्थितियों में बदलाव से मछलियों के रहने और भोजन तलाशने के क्षेत्र भी बदल सकते हैं. इसका असर उन तटीय समुदायों पर पड़ सकता है जो मछली पकड़ने पर निर्भर हैं. वैज्ञानिकों ने समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र की भी लगातार निगरानी करने की जरूरत बताई है.
वैज्ञानिकों ने अभी से तैयारी करने को कहा
188 वैज्ञानिकों की अपील का मुख्य उद्देश्य नुकसान होने के बाद अध्ययन करने के बजाय पहले से निगरानी और शोध की व्यवस्था मजबूत करना है. वैज्ञानिक समुदाय से पुराने आंकड़ों, सैटेलाइट डेटा और लंबे समय से चल रहे पर्यावरणीय अध्ययनों को जारी रखने की अपील की गई है.
स्थानीय स्तर पर तापमान, नमी और पर्यावरणीय बदलावों का रिकॉर्ड रखने से यह समझने में मदद मिल सकती है कि अलग-अलग इलाकों में अल-नीनो का वास्तविक प्रभाव क्या रहा. इससे भविष्य में ऐसी जलवायु घटनाओं के लिए तैयारी करने में भी मदद मिल सकती है.
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भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह चेतावनी?
2026 का मानसून भी सामान्य से कम बारिश के साथ समाप्त होने की ओर बढ़ रहा है. 19 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक देश के कई हिस्सों में बारिश की कमी दर्ज की गई थी. ऐसे में आगे गर्म और शुष्क परिस्थितियां बनीं तो पहले से कम जल उपलब्धता वाले क्षेत्रों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है.
हालांकि, वैज्ञानिक चेतावनी को निश्चित भविष्यवाणी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. अल-नीनो के बावजूद भारत में बारिश और तापमान का वास्तविक असर कई अन्य समुद्री और वायुमंडलीय कारकों पर भी निर्भर करता है. इसलिए आने वाले महीनों में मौसम के आधिकारिक पूर्वानुमानों और निगरानी पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा.


