Uttarakhand News: उत्तराखंड के नैनीताल जिले के धारी ब्लॉक का गाड़ियूड़ा गांव अब ‘घोस्ट विलेज’ में तब्दील हो चुका है. कभी 500 से ज्यादा परिवारों की चहल-पहल से गुलजार रहने वाला यह गांव आज सन्नाटे में डूबा है. टूटे घर, जर्जर दीवारें और बंद दरवाजों पर लटके ताले यहां के उजड़ते हालात की गवाही दे रहे हैं.
10 साल में बदल गई तस्वीर
पिछले एक दशक में गाड़ियूड़ा गांव से तेजी से पलायन हुआ है. रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी ने लोगों को शहरों की ओर जाने पर मजबूर कर दिया. जो लोग बेहतर भविष्य की तलाश में गांव छोड़कर गए, वे फिर लौटकर नहीं आए.
30-35 लोगों तक सिमटी आबादी
आज गांव में महज 30 से 35 लोग ही बचे हैं, जिनमें ज्यादातर बुजुर्ग हैं. ये लोग रोज सूनी पगडंडियों पर बैठकर अपनों के लौटने का इंतजार करते नजर आते हैं. गाड़ियूड़ा गांव की कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि उत्तराखंड के उन सैकड़ों गांवों की हकीकत है, जो धीरे-धीरे ‘घोस्ट विलेज’ बनते जा रहे हैं.
स्वास्थ्य और शिक्षा बनी बड़ी समस्या
गांव में स्वास्थ्य सुविधाएं लगभग न के बराबर हैं. किसी के बीमार पड़ने पर 110 किलोमीटर दूर हल्द्वानी या 60 किलोमीटर दूर पहाड़पानी और पदमपुरी जाना पड़ता है. वहीं, बेहतर शिक्षा के अभाव में बच्चों को कई किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाना पड़ता है, जिससे परिवार गांव छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं.
खेती पर जंगली जानवरों का कहर
एक समय में यह गांव सब्जी और दुग्ध उत्पादन के लिए जाना जाता था. आलू, मटर, टमाटर और शिमला मिर्च जैसी फसलों से किसानों को अच्छी आमदनी होती थी. लेकिन जंगली सूअर और बंदरों के बढ़ते आतंक ने खेती को बर्बाद कर दिया, जिससे ग्रामीणों ने खेती और पशुपालन से दूरी बना ली.
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सड़क और सुविधाओं का अभाव
आज भी गांव तक सड़क नहीं पहुंची है. ग्रामीणों को करीब 5 किलोमीटर पैदल चलकर मुख्य सड़क तक जाना पड़ता है, जिससे मरीजों, बुजुर्गों और किसानों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि अगर सरकार रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराए, तो पलायन को रोका जा सकता है. उनका मानना है कि ठोस कदम उठाए बिना गांवों का यूं ही खाली होना जारी रहेगा.


