देशभर में सावन (श्रावण) मास की शुरुआत गुरुवार से श्रद्धा और भक्ति के माहौल के बीच हुई. सुबह से ही लाखों श्रद्धालु भगवान शिव के मंदिरों में पहुंचकर जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और विशेष पूजा-अर्चना कर रहे हैं. हिंदू पंचांग का पांचवां महीना माना जाने वाला सावन पूरी तरह भगवान शिव की उपासना को समर्पित होता है और इसे वर्ष के सबसे पवित्र महीनों में गिना जाता है.
सावन के दौरान श्रद्धालु व्रत रखते हैं, शिव मंदिरों में दर्शन करते हैं और भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए विशेष अनुष्ठान करते हैं. इसी महीने निकलने वाली कांवड़ यात्रा भी करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र होती है. कांवड़िये गंगा से पवित्र जल लाकर शिवलिंग पर अर्पित करते हैं. शिवलिंग का अभिषेक दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल और बेलपत्र से किया जाता है, जिनका शिव पूजा में विशेष महत्व माना गया है.
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क्यों खास माना जाता है सावन का महीना?
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान निकले विष से सृष्टि को बचाने के लिए भगवान शिव ने हलाहल विष का पान किया था. विष को अपने कंठ में धारण करने के कारण उनका गला नीला हो गया और उन्हें नीलकंठ कहा गया.
एक अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए सावन महीने में कठोर तपस्या की थी. इसी कारण यह महीना वैवाहिक सुख, समृद्धि, सुख-शांति और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है. सावन के प्रत्येक सोमवार को रखा जाने वाला व्रत भी विशेष महत्व रखता है.
भारत के 12 ज्योतिर्लिंग
भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का हिंदू धर्म में विशेष स्थान है. इनके नाम इस प्रकार हैं:
- सोमनाथ (गुजरात)
- मल्लिकार्जुन (आंध्र प्रदेश)
- महाकालेश्वर (मध्य प्रदेश)
- ओंकारेश्वर (मध्य प्रदेश)
- केदारनाथ (उत्तराखंड)
- भीमाशंकर (महाराष्ट्र)
- काशी विश्वनाथ (उत्तर प्रदेश)
- त्र्यंबकेश्वर (महाराष्ट्र)
- बैद्यनाथ (झारखंड)
- रामेश्वरम (तमिलनाडु)
- घृष्णेश्वर (महाराष्ट्र)
- नागेश्वर (गुजरात)
प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ का धार्मिक महत्व
गुजरात के प्रभास पाटन में अरब सागर के किनारे स्थित सोमनाथ मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माना जाता है. शिव पुराण और द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में इसका विशेष उल्लेख मिलता है.
यह मंदिर भगवान शिव, भगवान श्रीकृष्ण और शक्ति उपासना का प्रमुख केंद्र माना जाता है. समुद्र तट पर स्थित इसका भव्य शिखर लगभग 150 फुट ऊंचा है, जिसके शीर्ष पर विशाल कलश और ऊंचा ध्वजदंड इसकी आध्यात्मिक पहचान को दर्शाते हैं.
कई बार टूटा, लेकिन हर बार हुआ पुनर्निर्माण
सोमनाथ मंदिर का इतिहास संघर्ष और पुनर्निर्माण की प्रेरणादायक कहानी है. इतिहास में इस मंदिर पर कई बार हमले हुए और इसे कई बार क्षति पहुंचाई गई, लेकिन प्रत्येक बार श्रद्धालुओं और विभिन्न शासकों ने इसका पुनर्निर्माण कराया.
राजा कुमारपाल, जूनागढ़ के शासकों और बाद में लोकमाता अहिल्याबाई होलकर ने भी मंदिर के पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. स्वतंत्रता के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल ने 1947 में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया.
इसके बाद वर्तमान मंदिर का निर्माण पारंपरिक कैलाश महामेरु प्रसाद स्थापत्य शैली में किया गया और 11 मई 1951 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इसका विधिवत प्रतिष्ठापन किया.
श्रद्धा और संस्कृति का जीवंत केंद्र
आज सोमनाथ केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आस्था और विरासत का प्रतीक माना जाता है. यहां प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं.
मंदिर परिसर में आयोजित लाइट एंड साउंड शो, आधुनिक 3D लेजर प्रस्तुति और वंदे सोमनाथ कला महोत्सव जैसी सांस्कृतिक गतिविधियां इसकी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य कर रही हैं.
सावन के पवित्र महीने में सोमनाथ सहित देशभर के शिवालयों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है और भगवान शिव की आराधना पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ की जाती है.
स्रोत: धार्मिक परंपराएं एवं उपलब्ध ऐतिहासिक जानकारी.


