Saharanpur News: दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे और हाईवे के किनारे जिले का पहला बड़ा औद्योगिक गलियारा विकसित करने की योजना पर जमीन का संकट खड़ा हो गया है. करीब एक हजार हेक्टेयर भूमि पर प्रस्तावित लॉजिस्टिक्स हब और औद्योगिक गलियारे के लिए किसानों और प्रशासन के बीच सहमति नहीं बन सकी है. किसानों की सबसे बड़ी आपत्ति जमीन के मुआवजे और सर्किल रेट को लेकर है. ऐसे में करीब छह महीने से चल रही भूमि चयन और सहमति की प्रक्रिया फिलहाल अधर में लटक गई है. अब जिला प्रशासन परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए नई जमीन तलाशने और दूसरे विकल्पों पर विचार कर रहा है.
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13 गांवों की जमीन पर बनना था औद्योगिक गलियारा
उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवेज औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीडा) की ओर से सहारनपुर में करीब एक हजार हेक्टेयर भूमि पर लॉजिस्टिक्स हब और औद्योगिक गलियारा विकसित करने की योजना बनाई गई थी. परियोजना के लिए सदर और नकुड़ तहसील के कुल 13 गांवों की भूमि प्रस्तावित की गई थी. इस औद्योगिक गलियारे के जरिए जिले में दो हजार करोड़ रुपये से अधिक के निवेश का लक्ष्य रखा गया था. योजना के सफल होने पर औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलने के साथ रोजगार के नए अवसर भी पैदा होने की उम्मीद थी. हालांकि भूमि उपलब्ध कराने को लेकर शुरू से ही किसानों की आपत्तियां सामने आती रही हैं.
11 गांवों में से आठ ने पहले ही जताई थी आपत्ति
सदर तहसील के प्रस्तावित 11 गांवों में से आठ गांवों के किसानों ने पहले ही जमीन देने को लेकर आपत्ति जता दी थी. इसके बाद उम्मीद बची थी कि बाकी गांवों में सहमति बन सकती है. लेकिन अब सुभरी, सिडकी और सैदपुर गांवों में भी जमीन को लेकर पेंच फंस गया है. सिडकी गांव को छोड़कर सुभरी और सैदपुर के किसानों ने भी जमीन देने से इन्कार कर दिया है. इस तरह परियोजना के लिए पर्याप्त भूमि उपलब्ध नहीं हो पा रही है और करीब छह महीने से चल रही पूरी प्रक्रिया अभी तक किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है.
सर्किल रेट से ज्यादा है जमीन की बाजार कीमत, किसानों का तर्क
किसानों की सबसे बड़ी आपत्ति जमीन के मुआवजे को लेकर है. किसानों का कहना है कि दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे और हाईवे के आसपास होने के कारण उनकी जमीन की बाजार कीमत काफी बढ़ गई है. उनके अनुसार, जमीन की वास्तविक बाजार कीमत मौजूदा सर्किल रेट से कहीं अधिक है. ऐसे में सर्किल रेट के आधार पर मिलने वाले मुआवजे पर जमीन देना उनके लिए घाटे का सौदा होगा. इसी वजह से प्रशासन और किसानों के बीच जमीन के मूल्य को लेकर सहमति नहीं बन पा रही है.
औद्योगिक गलियारे के लिए इन 13 गांवों की जमीन थी प्रस्तावित
औद्योगिक गलियारे के लिए कुल 13 गांवों की भूमि प्रस्तावित की गई थी. इसमें निजी और सरकारी, दोनों तरह की जमीन शामिल थी. पर्याप्त जमीन उपलब्ध नहीं होने के कारण जिला प्रशासन अब परियोजना के लिए दूसरे विकल्पों पर विचार कर रहा है. प्रशासन का कहना है कि औद्योगिक गलियारे के लिए बड़ी मात्रा में भूमि की आवश्यकता है और कुछ किसानों की असहमति के चलते नई जमीन तलाशने की जरूरत पड़ सकती है. अपर जिला अधिकारी वित्त एवं राजस्व सलिल कुमार पटेल ने कहा कि औद्योगिक गलियारे के लिए पर्याप्त जमीन चाहिए. कुछ किसानों ने जमीन देने में असहमति जताई है. ऐसे में अन्य विकल्पों पर भी विचार किया जा रहा है.
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निवेश और रोजगार की उम्मीदों पर फिलहाल जमीन का पेंच
दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे और हाईवे के किनारे प्रस्तावित यह औद्योगिक गलियारा सहारनपुर के विकास के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा था. दो हजार करोड़ रुपये से अधिक के संभावित निवेश वाली इस परियोजना से उद्योगों के साथ लॉजिस्टिक्स सेक्टर को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद थी. लेकिन फिलहाल किसानों और प्रशासन के बीच मुआवजे की दर को लेकर सहमति न बनने से परियोजना की राह मुश्किल हो गई है. अब सबकी नजर इस बात पर है कि प्रशासन किसानों के साथ कोई नया समाधान निकालता है या औद्योगिक गलियारे के लिए पूरी तरह नई जमीन का चयन किया जाता है.


