तमिल सिनेमा में पुरुष किरदारों को अक्सर ताकत, हिंसा, मूंछ, दाढ़ी और हथियारों के साथ जोड़कर देखा गया है. Karthik Subbaraj की नई फिल्म Dorothy इसी स्थापित छवि को चुनौती देती है. फिल्म मर्दानगी को सिर्फ ताकत और हिंसा के नजरिए से देखने के बजाय उसके भीतर छिपे डर, भावनाओं और जेंडर से जुड़े सवालों को सामने लाती है.
फिल्म की शुरुआत दो पुरुषों की बातचीत से होती है. Karthi अपने दोस्त Subbu से कहता है कि वह किसी को मारे या यहां तक कि किसी की जान ले ले, लेकिन रोए नहीं. Subbu इस सोच को एक ऐसे नियम की तरह अपने भीतर लेकर चलता है, जिसे एक पुरुष के लिए निभाना जरूरी समझा गया है. लेकिन कहानी आगे बढ़ने पर यही सोच टूटती है.
Dorothy ने 25 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज से पहले Toronto International Film Festival में अपना वर्ल्ड प्रीमियर किया था. फिल्म में Rishikanth ने Karthi और Sananth ने Subbu का किरदार निभाया है.
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1980 और 1990 के दशक का Madurai
कहानी 1980 और 1990 के दशक के Madurai में सेट है. इस दौर और जगह को देखते हुए दर्शक एक ऐसी कहानी की उम्मीद कर सकता है जिसमें हिंसा, जाति और पुरुष वर्चस्व प्रमुख हों. फिल्म भी इसी सामाजिक माहौल से कहानी शुरू करती है, लेकिन धीरे-धीरे उसका रास्ता अलग हो जाता है.
Subbu और Karthi बचपन से दोस्त हैं. दोनों ऐसे पुरुषों के बीच बड़े होते हैं जो जाति और मर्दानगी के कठोर विचारों से प्रभावित हैं. उनके आसपास व्यक्तिगत और सामाजिक विवादों का समाधान अक्सर हिंसा के जरिए किया जाता है.
बचपन में Subbu अपने आदर्श Bruce Lee से प्रभावित है और शारीरिक ताकत को संघर्ष से निकलने का रास्ता मानता है. इसके उलट Karthi ज्यादा डरपोक है. लेकिन बड़े होने के बाद दोनों की भूमिकाएं बदल जाती हैं. इसके बावजूद दोनों के भीतर हिंसा को सहज तरीके से स्वीकार करने में एक झिझक बनी रहती है.
Subbu एक प्रभावशाली जाति से आता है, जबकि Karthi उत्पीड़ित जाति से है. Subbu के पिता Whistle Veeraiya एक हिंसक साहूकार हैं, जिनका किरदार Muthukumar ने निभाया है.
Dorothy की एंट्री बदल देती है कहानी
Keerthy Suresh फिल्म में Dorothy का किरदार निभाती हैं. वह Veeraiya के घर की बहू है. यह घर मूल रूप से पुरुषों की दुनिया है, जहां महिलाओं के लिए अपनी बात रखने की जगह सीमित है.
Dorothy के आने के बाद कहानी धीरे-धीरे बदलती है. फिल्म में महिलाओं को सिर्फ सहायक किरदार के तौर पर नहीं रखा गया है. वे पुरुषों के भीतर मौजूद डर और असुरक्षा को पहचानती हैं और उन्हें अपनी भावनाओं को स्वीकार करने की जगह देती हैं.
यही फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण विचार बनकर सामने आता है कि पुरुष का रोना कमजोरी नहीं है.
मर्दानगी की परिभाषा पर सवाल
Dorothy का सबसे बड़ा तर्क पारंपरिक मर्दानगी को लेकर है. फिल्म उन पुरुषों पर सवाल उठाती है जो अपनी ताकत और सम्मान को मूंछ, दाढ़ी, हथियार और हिंसा से जोड़ते हैं.
कहानी में महिलाएं कई बार पुरुषों को उनके ही बनाए नियमों से बाहर निकलने में मदद करती हैं. वे पुरुषों को रोने की अनुमति देती हैं, संघर्ष का सामना करती हैं, माफ करती हैं और रिश्तों में जगह बनाए रखती हैं.
इसके उलट कई पुरुष किरदार जाति और पितृसत्ता से जुड़े विचारों में फंसे दिखाई देते हैं. फिल्म दिखाती है कि व्यक्तिगत रिश्ते भी gender, caste और class जैसी सामाजिक शक्तियों से प्रभावित होते हैं.
फिल्म की एक खास बात यह है कि यह अपने सबसे दबे हुए किरदारों को भी केवल पीड़ित बनाकर पेश नहीं करती. उन्हें अपने फैसले लेने और अपनी पहचान के लिए खड़े होने की जगह दी जाती है.
Rishikanth और Sananth ने संभाली फिल्म
Rishikanth और Sananth फिल्म के भावनात्मक केंद्र को मजबूती देते हैं. Rishikanth ने लंबे समय तक छोटे और सीमित किरदारों में काम करने के बाद Modha Rathri में मुख्य भूमिका से ध्यान खींचा था. उन्हें Coolie में भी एक छोटे किरदार में देखा गया था.
Sananth पहले ही Demonte Colony, Jil Jung Juk और Mahaan जैसी फिल्मों के जरिए अपनी अलग पहचान बना चुके हैं. Dorothy में उनका प्रदर्शन कहानी के महत्वपूर्ण हिस्से को संभालता है.
Muthukumar Veeraiya के किरदार में कई परतें जोड़ते हैं और कहानी के दौरान कई बार चौंकाते हैं. Keerthy Suresh Dorothy के रूप में शांत और स्पष्ट उपस्थिति देती हैं.
Ilaiyaraaja का संगीत
Dorothy के संगीत की एक बड़ी खासियत Ilaiyaraaja का बैकग्राउंड स्कोर है. यह Subbaraj के साथ उनका पहला सहयोग है.
फिल्म में Ilaiyaraaja की शैली का संगीत कहानी के अलग-अलग हिस्सों के साथ चलता है. स्रोत के मुताबिक फिल्म के गाने म्यूजिक स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर भी लोकप्रिय हो चुके हैं.
फिल्मकार Thiagarajan Kumararaja ने एक इंटरव्यू में युवा फिल्मकारों के Ilaiyaraaja के साथ काम करने की इच्छा जाहिर की थी. Dorothy में उनका सहयोग इस विचार को मजबूत करता दिखाई देता है.
Gender और sexuality पर बहस
फिल्म का विषय रिलीज से पहले और बाद में इंटरनेट पर बहस का कारण भी बना. स्रोत में बताया गया है कि फिल्म के theme को लेकर सोशल मीडिया के एक हिस्से ने विरोध किया, जबकि फिल्म के समर्थन में भी फिल्म इंडस्ट्री और दर्शकों की ओर से प्रतिक्रियाएं आईं.
यह विषय तमिल सिनेमा के लिए नया नहीं है, लेकिन Dorothy इसे सिर्फ मजाक या कहानी के छोटे subplot तक सीमित नहीं रखती. फिल्म gender और sexuality से जुड़े सवालों को कहानी के केंद्रीय हिस्से में रखती है.
इसी वजह से फिल्म केवल दो दोस्तों की कहानी नहीं रह जाती. यह उन सामाजिक धारणाओं को भी सामने लाती है जिनके आधार पर पुरुषों से अपनी भावनाओं को छिपाने और महिलाओं से एक तय भूमिका निभाने की उम्मीद की जाती है.
Karthik Subbaraj का अलग रास्ता
Karthik Subbaraj ने बड़े सितारों और बड़े पैमाने की फिल्मों के साथ काम करने के बावजूद समय-समय पर छोटे बजट और अलग विषयों वाली कहानियों की ओर भी रुख किया है.
2018 की Mercury इसका एक उदाहरण थी, जिसमें उन्होंने साइलेंट थ्रिलर के जरिए अलग प्रयोग किया था. Dorothy में भी वह सामाजिक और सांस्कृतिक विचारों को कहानी के भीतर रखने की कोशिश करते हैं.
Subbaraj का Madurai से व्यक्तिगत जुड़ाव भी उनके सिनेमा में दिखाई देता रहा है. Jigarthanda और Jigarthanda DoubleX जैसी फिल्मों में उन्होंने शहर और उसके आसपास की दुनिया को अलग-अलग तरीकों से इस्तेमाल किया है.
Dorothy में भी Madurai सिर्फ कहानी की लोकेशन नहीं है. यह वह सामाजिक पृष्ठभूमि है जहां जाति, पुरुष वर्चस्व, हिंसा, रिश्ते और बदलती सोच एक-दूसरे से टकराते हैं.
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फिल्म की सबसे अहम बात यही है कि यह मर्दानगी को एक तय और कठोर पहचान मानने के बजाय उसे सवालों के घेरे में लाती है. Dorothy पुरुषों को ताकत दिखाने के साथ-साथ डरने, रोने और भावनाएं व्यक्त करने की भी जगह देती है. इसी वजह से फिल्म तमिल सिनेमा में masculinity को देखने के एक अलग नजरिए की ओर इशारा करती है.


