Kalpasar Project: क्या समुद्र में करीब 60 किलोमीटर लंबी दीवार बनाई जा सकती है? सुनने में यह भले ही किसी कल्पना जैसा लगे, लेकिन गुजरात का कालपसर प्रोजेक्ट इसी महत्वाकांक्षी योजना पर आधारित है. खंभात की खाड़ी में प्रस्तावित यह परियोजना सिर्फ एक डाइक या बांध बनाने की योजना नहीं है, बल्कि इसके साथ पानी, सिंचाई, सड़क, ऊर्जा और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को जोड़ने की योजना है.
अगर यह परियोजना प्रस्ताव के मुताबिक जमीन पर उतरती है, तो सौराष्ट्र के जल संकट को कम करने के साथ-साथ सूरत और भावनगर के बीच सड़क संपर्क को काफी छोटा किया जा सकता है. हालांकि परियोजना के सामने पर्यावरण, समुद्री इंजीनियरिंग और भारी वित्तीय लागत जैसी बड़ी चुनौतियां भी हैं.
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क्या है कालपसर प्रोजेक्ट?
कालपसर परियोजना का मुख्य विचार खंभात की खाड़ी के एक हिस्से को करीब 60 किलोमीटर लंबी डाइक से घेरकर एक विशाल मीठे पानी का जलाशय तैयार करना है. योजना के तहत नर्मदा, साबरमती, माही, ढाढर समेत क्षेत्र की नदियों के पानी को इस जलाशय में संग्रहित करने की परिकल्पना की गई है. इसका उद्देश्य पानी को समुद्र में बह जाने से पहले उपयोग में लाना और सौराष्ट्र क्षेत्र में जल उपलब्धता बढ़ाना है.
सूरत-भावनगर की दूरी कैसे घट सकती है?
कालपसर परियोजना की सबसे चर्चित विशेषताओं में से एक इसकी संभावित कनेक्टिविटी है. वर्तमान में सूरत और भावनगर के बीच सड़क मार्ग की दूरी करीब 356 किलोमीटर बताई जाती है. प्रस्तावित डाइक पर सड़क और परिवहन कॉरिडोर विकसित करने की योजना है.
परियोजना से जुड़े दस्तावेजों के मुताबिक, इसके बनने के बाद दोनों शहरों के बीच सड़क दूरी घटकर करीब 177 किलोमीटर रह सकती है. यानी दक्षिण गुजरात और सौराष्ट्र के बीच सीधा संपर्क बनने से यात्रा, माल ढुलाई और व्यापारिक गतिविधियों में बदलाव आ सकता है.
कितनी बड़ी है परियोजना और कितना आएगा खर्च?
कालपसर परियोजना की अनुमानित लागत समय के साथ बढ़ी है. 2022 की प्री-फिजिबिलिटी रिपोर्ट में इसकी लागत करीब 1 लाख करोड़ रुपये बताई गई थी. वहीं, 2026 में पर्यावरणीय मंजूरी प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेजों में अनुमानित लागत करीब 1,33,246 करोड़ रुपये बताई गई है.इस स्तर की लागत के कारण यह परियोजना देश की बड़ी जल और तटीय इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में शामिल हो सकती है.
सौराष्ट्र को पानी मिलने की उम्मीद
कालपसर परियोजना का सबसे बड़ा उद्देश्य सौराष्ट्र क्षेत्र में पानी की उपलब्धता बढ़ाना है. यह क्षेत्र लंबे समय से अनियमित बारिश और जल संकट जैसी समस्याओं का सामना करता रहा है.परियोजना से जुड़े प्रस्तावों में सिंचाई और पेयजल के लिए बड़े पैमाने पर पानी उपलब्ध कराने की बात कही गई है. कुछ सरकारी दस्तावेजों में करीब 10 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई लाभ मिलने का उल्लेख किया गया है.
सड़क, व्यापार और लॉजिस्टिक्स को मिल सकता है फायदा
अगर प्रस्तावित डाइक पर सड़क और परिवहन कॉरिडोर विकसित होता है, तो सूरत और भावनगर के बीच संपर्क आसान हो सकता है. इससे दक्षिण गुजरात और सौराष्ट्र के बीच व्यापार, लॉजिस्टिक्स, माल परिवहन और औद्योगिक गतिविधियों को संभावित रूप से बढ़ावा मिल सकता है.
ऊर्जा उत्पादन की भी योजना
कालपसर परियोजना केवल पानी और सड़क तक सीमित नहीं है. इससे जुड़े प्रस्तावों में करीब 2,470 मेगावाट की हाइब्रिड रिन्यूएबल ऊर्जा क्षमता विकसित करने की संभावना भी बताई गई है. यानी परियोजना को पानी, परिवहन और ऊर्जा तीनों क्षेत्रों से जोड़कर देखा जा रहा है.
कब शुरू होगा निर्माण?
यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है. फिलहाल परियोजना निर्माण चरण में नहीं पहुंची है. उपलब्ध जानकारी के अनुसार दिसंबर 2025 तक इसकी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट यानी DPR को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया चल रही थी. कुछ सार्वजनिक दस्तावेजों में करीब 2028 में निर्माण शुरू होने और 2035 के आसपास पूरा करने का अनुमान दिया गया है. हालांकि, इन तारीखों को अंतिम सरकारी समयसीमा नहीं माना जा सकता, क्योंकि निर्माण शुरू करने और पूरा करने की आधिकारिक अंतिम तारीख अभी घोषित नहीं हुई है.
नीदरलैंड से मिला तकनीकी सहयोग
परियोजना की जटिलता को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय तकनीकी विशेषज्ञता का भी सहारा लिया जा रहा है. मई 2026 में भारत और नीदरलैंड ने कालपसर परियोजना के लिए तकनीकी सहयोग को लेकर Letter of Intent पर हस्ताक्षर किए. नीदरलैंड की विशेषज्ञता का इस्तेमाल तटीय इंजीनियरिंग, समुद्री जल प्रबंधन, जल नियंत्रण और जलाशय डिजाइन जैसे क्षेत्रों में किए जाने की बात कही गई है.
सबसे बड़ी चुनौती समुद्र ही है
कालपसर प्रोजेक्ट जितना बड़ा है, उसकी चुनौतियां भी उतनी ही गंभीर हैं. सबसे पहली चिंता समुद्री पारिस्थितिकी पर संभावित प्रभाव को लेकर है. खंभात की खाड़ी में डाइक बनने से समुद्री जल के प्रवाह और स्थानीय पारिस्थितिकी में बदलाव का सवाल उठता है. इसके अलावा निर्माण के दौरान ज्वार-भाटा, तेज समुद्री धाराओं और बड़े पैमाने पर तटीय इंजीनियरिंग से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना होगा. एक और अहम चुनौती खारे समुद्री पानी और प्रस्तावित मीठे पानी के जलाशय के बीच संतुलन बनाए रखना है. इसके साथ ही करीब 1.33 लाख करोड़ रुपये की अनुमानित लागत भी परियोजना के सामने एक बड़ी वित्तीय चुनौती है.
दशकों पुराना सपना, अब भी इंतजार
कालपसर परियोजना कोई नई अवधारणा नहीं है. यह गुजरात की लंबे समय से चर्चा में रही महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक है. लेकिन इसकी तकनीकी जटिलता, पर्यावरणीय चिंताओं, वित्तीय लागत और विस्तृत योजना की जरूरत के कारण यह अभी तक निर्माण चरण में नहीं पहुंची है. अगर भविष्य में परियोजना को सभी जरूरी मंजूरियां मिलती हैं और निर्माण होता है, तो इसका असर सिर्फ पानी तक सीमित नहीं रहेगा. सौराष्ट्र का जल संकट, सूरत-भावनगर कनेक्टिविटी, सिंचाई, व्यापार और ऊर्जा कई क्षेत्रों में बदलाव की संभावना इससे जुड़ी है.
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लेकिन फिलहाल इसे एक प्रस्तावित मेगा प्रोजेक्ट के रूप में देखना जरूरी है, जिसके कई अहम पहलू अभी अध्ययन, मंजूरी और DPR प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं.


