UP News: होली का नाम आते ही रंग, उमंग और मस्ती की तस्वीर आंखों के सामने तैरने लगती है, लेकिन बदलते दौर में जहां भोजपुरी गीतों में अश्लीलता की शिकायतें बढ़ी हैं, वहीं बलिया जिले का चौरा गांव अपनी सदियों पुरानी ‘फगुआ’ परंपरा से एक अनोखी मिसाल पेश कर रहा है. यहां होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि संस्कृति, अनुशासन और सामूहिक एकता का जीवंत उत्सव है.
बसंत पंचमी से शुरू होता है फगुआ का सुर
चौरा गांव में बसंत पंचमी से ही फगुआ के गीतों की शुरुआत हो जाती है. परंपरा के अनुसार, गांव के हर घर पर फगुआ गाया जाता है, जैसे ही शाम ढलती है, पूरा गांव एक मंच में बदल जाता है और हर नागरिक कलाकार बन जाता है. ढोलक, ढपली और झाल की थाप पर गूंजते पारंपरिक गीत पूरे माहौल को होली के रस में सराबोर कर देते हैं.
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देवी-देवताओं पर आधारित गीतों की मधुर धुन जब सामूहिक स्वर में उठती है, तो गांव का दृश्य अद्भुत हो उठता है. गीत, संगीत और उत्साह का ऐसा संगम देखने के लिए लोग दूर-दूर से यहां पहुंचते हैं.
अनुशासन और परंपरा का अनोखा संगम
फगुआ केवल मस्ती का नाम नहीं, बल्कि अनुशासन और मर्यादा का भी प्रतीक है। गांव के बुजुर्ग फगुआ कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार करते हैं, जबकि युवा पूरी ऊर्जा के साथ इस परंपरा को निभाते हैं. यही कारण है कि यह सांस्कृतिक विरासत पीढ़ी दर पीढ़ी सुरक्षित बनी हुई है.
सात समंदर पार से भी लौट आते हैं लोग
चौरा गांव के कई लोग देश के अलग-अलग राज्यों के साथ-साथ विदेशों में भी नौकरी करते हैं, लेकिन होली के समय फगुआ का आकर्षण ऐसा होता है कि वे सात समंदर पार से भी अपने गांव लौट आते हैं. उनके लिए यह केवल त्योहार नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर होता है.
हर जाति-धर्म की भागीदारी
गांव की खास बात यह है कि यहां हर जाति और धर्म के लोग मिलकर फगुआ गाते हैं. होली के दिन फगुआ की टोली हर दरवाजे पर जाती है और गीत गाकर आपसी प्रेम और सौहार्द का संदेश देती है। होली की पारंपरिक गालियां भी रस और हास्य के साथ गाई जाती हैं, जो उत्सव को और रंगीन बना देती हैं.
संस्कृति को नई पहचान
जहां एक ओर कुछ भोजपुरी होली गीतों में अश्लीलता बढ़ रही है, वहीं चौरा गांव के लोग पारंपरिक गीतों और वाद्य यंत्रों के जरिए फगुआ को एक नई पहचान दे रहे हैं. गांव की खुशबू, गांव की बोली और गांव की होली आज भी यहां की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है.
चौरा गांव का यह फगुआ महोत्सव न सिर्फ होली के रंगों को संजोए हुए है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए संस्कृति और संस्कार की मजबूत नींव भी तैयार कर रहा है.


