पिछले चार साल में देश की राजनीति में बड़ी संख्या में सांसदों और विधायकों ने अपनी पार्टी बदली है. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी ADR और नेशनल इलेक्शन वॉच के एक विश्लेषण के मुताबिक, 2022 से 2026 के बीच हुए चुनाव और उपचुनावों में कुल 111 सांसदों और विधायकों के पार्टी बदलने के मामले सामने आए.
इस आंकड़े में 26 लोकसभा सांसद, सात राज्यसभा सांसद और 78 विधायक शामिल हैं. विश्लेषण के मुताबिक, इन 111 जनप्रतिनिधियों में 29 यानी करीब 26 फीसदी बीजेपी में गए. वहीं नागा पीपुल्स फ्रंट यानी NPF के साथ 32 जनप्रतिनिधियों का नाम जुड़ा, जो करीब 29 फीसदी है. हालांकि, NPF के मामले में यह आंकड़ा अलग-अलग नेताओं के पार्टी बदलने के बजाय 2025 में हुए मर्जर से जुड़ा बताया गया है.
ADR की 24 सितंबर को जारी रिपोर्ट के अनुसार, इस अवधि में 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पार्टी बदलने के मामले दर्ज किए गए. नागालैंड में सबसे ज्यादा 32 मामले सामने आए. इसके बाद पश्चिम बंगाल में 20, तेलंगाना में 9 तथा गोवा और पंजाब में आठ-आठ मामले रहे.
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ADR के आंकड़ों में क्या-क्या शामिल है
ADR के मुताबिक, 111 मामलों को केवल सामान्य दल-बदल के रूप में नहीं देखा गया है. विश्लेषण में पार्टी मर्जर के मामले भी शामिल किए गए हैं.
इसके अलावा ऐसे सांसदों और विधायकों को भी विश्लेषण में शामिल किया गया जिन्होंने उपचुनाव जीतने से पहले इस्तीफा देकर पार्टी बदली. अयोग्य घोषित किए जाने के बाद दूसरी पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतने वाले लोगों को भी इस डेटासेट का हिस्सा बनाया गया.
ADR ने यह भी कहा कि उसके आंकड़ों में हर मामला शामिल होना जरूरी नहीं है. संगठन के मुताबिक, चुनाव आयोग का आधिकारिक डेटा पार्टी बदलने के मामलों के संबंध में व्यवस्थित तरीके से उपलब्ध नहीं है, जिससे सभी मामलों को एक जगह संकलित करना मुश्किल होता है.
BJP में शामिल हुए 29 सांसद-विधायक
ADR के डेटासेट के मुताबिक, 111 जनप्रतिनिधियों में से 29 बीजेपी में शामिल हुए. इनमें सात राज्यसभा सांसद और 22 विधायक बताए गए हैं. विश्लेषण के अनुसार, इस अवधि में कोई लोकसभा सांसद बीजेपी में शामिल नहीं हुआ.
रिपोर्ट में बीजेपी में शामिल हुए सात राज्यसभा सदस्यों के तौर पर स्वाति मालीवाल, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, राघव चड्ढा, संदीप कुमार पाठक, विक्रमजीत सिंह साहनी और राजिंदर गुप्ता के नाम दिए गए हैं. ये सभी AAP से चुने गए राज्यसभा सदस्य बताए गए हैं.
अलग-अलग राज्यों से कई विधायक BJP में गए
ADR के अनुसार, बीजेपी में शामिल होने वालों में गोवा के आठ कांग्रेस विधायक, गुजरात के चार कांग्रेस विधायक और हिमाचल प्रदेश के दो विधायक शामिल थे.
रिपोर्ट में मणिपुर के JD(U) के पांच विधायकों के बीजेपी में शामिल होने का भी उल्लेख है. इसके अलावा उत्तर प्रदेश से समाजवादी पार्टी के विधायक मनोज कुमार पांडे, मध्य प्रदेश से कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे और कर्नाटक के विधायक जी जनार्दन रेड्डी का नाम भी दिया गया है.
जी जनार्दन रेड्डी के मामले में रिपोर्ट के अनुसार उनकी पार्टी कल्याण राज्य प्रगति पक्ष यानी KRPP बीजेपी में मिल गई. गुजरात कांग्रेस के विधायक सीजे चावड़ा, अर्जुन मोढवाडिया, अरविंद लदानी और चिराग पटेल के इस्तीफे और बाद में बीजेपी में शामिल होकर उपचुनाव लड़ने का भी उल्लेख रिपोर्ट में है.
NPF के साथ जुड़े 32 जनप्रतिनिधि
111 मामलों में सबसे बड़ा आंकड़ा NPF के साथ जुड़ा है. ADR के अनुसार, NPF को 32 जनप्रतिनिधि मिले, जो कुल मामलों का करीब 29 फीसदी है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि नागालैंड में राजनीतिक बदलाव और मर्जर इस आंकड़े का प्रमुख कारण था. स्रोत के अनुसार, NDPP के टिकट पर चुने गए जनप्रतिनिधि मर्जर के बाद NPF में शामिल हुए.
नागालैंड विधानसभा में कुल 60 सदस्य हैं. स्रोत में बताया गया है कि NDPP और बीजेपी अपने विधायकों के साथ सरकार चला रहे थे और विधानसभा में विपक्ष की स्थिति अलग थी, क्योंकि अन्य दलों ने भी सत्ताधारी गठबंधन को समर्थन देने की बात कही थी.
NDPP के NPF में मर्जर के बाद नेफ्यू रियो को NPF विधायक दल का नेता चुना गया. रियो ने कहा था कि इसका उद्देश्य नागा लोगों की उम्मीदों को प्रतिनिधित्व देना और लंबे समय से लंबित नागा राजनीतिक मुद्दे को अधिक प्रभावी तरीके से सुलझाने के लिए मजबूत क्षेत्रीय पार्टी तैयार करना था.
NCPI में 20 सांसदों के शामिल होने का दावा
ADR के विश्लेषण में नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया यानी NCPI के साथ 20 सांसदों के जुड़ने का भी उल्लेख है. यह कुल 111 मामलों का करीब 18 फीसदी है.
स्रोत के मुताबिक, 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के सत्ता खोने के बाद उसके 20 लोकसभा सांसदों ने बगावत की और 14 जून को NCPI के साथ मर्जर का ऐलान किया. इसके साथ उन्होंने लोकसभा में बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA को समर्थन देने की बात कही.
रिपोर्ट के अनुसार, इस बदलाव से पहले NCPI की देश में सीमित राजनीतिक मौजूदगी थी. स्रोत में यह भी कहा गया है कि पार्टी ने 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में चुनावी शुरुआत की थी, लेकिन कोई सीट जीतने में सफल नहीं रही.
कांग्रेस समेत इन दलों से भी बदले जनप्रतिनिधि
ADR के आंकड़ों के मुताबिक, कांग्रेस को नौ, शिवसेना को आठ, NPP को छह और पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल को चार जनप्रतिनिधि मिले.
वहीं सबसे बड़ा समूह NDPP का बताया गया है, जिसके 25 सांसदों का उल्लेख रिपोर्ट में है. इसके बाद तृणमूल कांग्रेस के 20 और कांग्रेस के 19 सांसदों का आंकड़ा दिया गया है. इन तीनों को मिलाकर 111 मामलों में से 64 यानी करीब 58 फीसदी मामलों से जोड़ा गया है.
लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा में कितने बदले दल
ADR के विश्लेषण में शामिल 543 लोकसभा सांसदों में से 26 ने पार्टी बदली, जो करीब 5 फीसदी है.
वहीं 233 राज्यसभा सांसदों में से सात ने पार्टी बदली, यानी करीब 3 फीसदी. 4,100 विधायकों के आंकड़े में 78 ने पार्टी बदली, जो लगभग 2 फीसदी है.
इस तरह 2022 से 2026 के बीच के चुनाव और उपचुनावों को लेकर ADR के विश्लेषण में सांसदों और विधायकों के पार्टी बदलने के अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं. हालांकि, संगठन ने खुद यह स्पष्ट किया है कि उसका डेटासेट सभी मामलों को जरूरी नहीं कि कवर करता हो, क्योंकि चुनाव आयोग से संबंधित आधिकारिक डेटा व्यवस्थित रूप से उपलब्ध नहीं है.
ADR क्या है?
ADR यानी Association for Democratic Reforms एक चुनाव सुधार समूह है. स्रोत के अनुसार, इसकी शुरुआत 1999 में IIM अहमदाबाद के प्रोफेसरों ने की थी.
ADR एक कानूनी मामले के लिए भी जाना जाता है, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीदवारों के लिए अपने आपराधिक मामलों, वित्तीय स्थिति और शैक्षणिक योग्यता से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करना जरूरी किया था.
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