नई दिल्ली, 11 अगस्त 2026. भारत का शिप रीसाइक्लिंग सेक्टर पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदलकर आधुनिक और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप उद्योग के रूप में विकसित हुआ है. 2025 में भारत दुनिया का सबसे बड़ा शिप रीसाइक्लिंग देश बन गया. इस दौरान वैश्विक शिप रीसाइक्लिंग बाजार में भारत की हिस्सेदारी 2024 के 30.1% से बढ़कर 2025 में 35.4% हो गई.
भारत में शिप रीसाइक्लिंग की मात्रा भी 2024 के 1.86 मिलियन ग्रॉस टन से बढ़कर 2025 में 2.99 मिलियन ग्रॉस टन हो गई. यानी एक साल में रीसाइक्लिंग वॉल्यूम में करीब 60% की बढ़ोतरी दर्ज की गई. इस उपलब्धि के साथ Maritime India Vision 2030 के तहत दुनिया का अग्रणी शिप रीसाइक्लिंग देश बनने का लक्ष्य तय समय से पांच साल पहले हासिल हो गया.
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शिप रीसाइक्लिंग क्यों है महत्वपूर्ण
शिप रीसाइक्लिंग किसी जहाज की सेवा अवधि समाप्त होने के बाद उसके सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल तरीके से अलग-अलग हिस्सों को दोबारा उपयोग में लाने की प्रक्रिया है. मजबूत नियामक व्यवस्था के तहत जहाजों को रीसाइकिल करने से स्टील और अन्य उपयोगी सामग्री को वापस उत्पादन चक्र में लाया जा सकता है.
इससे एक तरफ प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल को कम करने में मदद मिलती है, वहीं दूसरी तरफ समुद्री और तटीय प्रदूषण के जोखिम को भी कम किया जा सकता है. खतरनाक सामग्री को नियंत्रित तरीके से संभालने की व्यवस्था होने से श्रमिकों की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण पर भी ध्यान दिया जाता है.
घरेलू स्टील उद्योग को मिलता है फायदा
शिप रीसाइक्लिंग से घरेलू स्टील उद्योग को बड़ी मात्रा में फेरस स्क्रैप मिलता है. इससे आयातित कच्चे माल पर निर्भरता कम करने और संसाधनों की आपूर्ति को मजबूत करने में मदद मिलती है.
रीसाइक्लिंग के जरिए स्टील और दूसरे उपयोगी हिस्सों को दोबारा इस्तेमाल किया जाता है. रीसाइकिल स्टील के उत्पादन में प्राथमिक स्टील उत्पादन की तुलना में काफी कम ऊर्जा की जरूरत होती है. इससे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने और सस्टेनेबिलिटी तथा डीकार्बोनाइजेशन के लक्ष्यों को समर्थन मिलता है.
Alang-Sosiya बना भारत की क्षमता का आधार
गुजरात का Alang-Sosiya ship recycling cluster भारत के शिप रीसाइक्लिंग सेक्टर की रीढ़ बना हुआ है. इसे दुनिया का सबसे बड़ा शिप रीसाइक्लिंग हब माना गया है.
यह क्लस्टर भारत की करीब 98% शिप रीसाइक्लिंग गतिविधि से जुड़ा है और इसकी वार्षिक रीसाइक्लिंग क्षमता करीब 6 मिलियन ग्रॉस टन है. यहां हर साल करीब 3.50 मिलियन मीट्रिक टन स्टील का उत्पादन होता है, जिसमें प्राकृतिक संसाधनों का दोहन नहीं किया जाता.
Alang-Sosiya में अधिकृत शिप रीसाइक्लिंग यार्ड, स्टील रीरोलिंग मिल और वेस्ट मैनेजमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद हैं. पिछले कुछ वर्षों में इस क्लस्टर में व्यापक आधुनिकीकरण भी किया गया है.
शिप रीसाइक्लिंग क्षमता बढ़ाने की तैयारी
भारत अपनी शिप रीसाइक्लिंग क्षमता को बढ़ाकर करीब 9 मिलियन लाइट डिस्प्लेसमेंट टन यानी LDT करने का लक्ष्य रखता है. इसके लिए Alang Ship Recycling Yard के विकास की योजना बनाई गई है.
इसके लिए एक व्यापक मास्टर प्लान तैयार किया गया है. इसका उद्देश्य भविष्य की मांग को पूरा करने के साथ शिप रीसाइक्लिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना और वैश्विक बाजार में भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाना है.
Alang-Sosiya के Safety Training and Labour Welfare Institute ने अब तक कुल 1.5 लाख से अधिक श्रमिकों को प्रशिक्षण दिया है. प्रशिक्षण में व्यावसायिक सुरक्षा, खतरनाक सामग्री को संभालने और आपात स्थिति से निपटने जैसे विषय शामिल हैं.
यार्ड में सुरक्षा और पर्यावरण पर जोर
भारतीय शिप रीसाइक्लिंग यार्ड में हाल के वर्षों में कई तरह के सुधार किए गए हैं. इनमें निर्धारित रीसाइक्लिंग प्लॉट, वाटरप्रूफ कार्यस्थल, ड्रेनेज सिस्टम, मैकेनाइज्ड मटेरियल हैंडलिंग और लिफ्टिंग उपकरण शामिल हैं.
इसके अलावा खतरनाक कचरे के लिए अलग भंडारण क्षेत्र, अधिकृत वेस्ट ट्रीटमेंट और डिस्पोजल व्यवस्था तथा सुरक्षा, स्वास्थ्य और इमरजेंसी रिस्पॉन्स की संरचित व्यवस्था भी विकसित की गई है.
इन सुधारों का उद्देश्य शिप रीसाइक्लिंग प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित बनाने के साथ पर्यावरणीय अनुपालन और परिचालन क्षमता को मजबूत करना है.
Ship Recycling Act से मजबूत हुआ नियामक ढांचा
भारत में शिप रीसाइक्लिंग के लिए व्यापक कानूनी और नियामक व्यवस्था बनाई गई है. इसमें Ship Recycling Act, 2019, Ship Recycling Rules, 2021 और Ship Recycling Regulations, 2026 शामिल हैं.
Ship Recycling Act, 2019 भारत में शिप रीसाइक्लिंग गतिविधियों के नियमन का मुख्य कानूनी आधार है. इसके तहत अधिकृत करने, प्रमाणन, निरीक्षण और कार्रवाई से जुड़ी व्यवस्था निर्धारित की गई है.
Ship Recycling Rules, 2021 में यार्ड की अनुमति, शिप रीसाइक्लिंग प्लान, खतरनाक सामग्री के प्रबंधन, श्रमिक सुरक्षा, प्रशिक्षण और रिपोर्टिंग से जुड़े प्रावधान दिए गए हैं.
वहीं Ship Recycling Regulations, 2026 ने परिचालन, सुरक्षा और पर्यावरणीय मानकों को और विस्तार दिया है.
Hong Kong Convention के अनुरूप व्यवस्था
भारत ने अपने शिप रीसाइक्लिंग ढांचे को Hong Kong International Convention for the Safe and Environmentally Sound Recycling of Ships के अनुरूप बनाया है.
यह अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन 26 जून 2025 को लागू हुआ. भारत ने Ship Recycling Act, Rules और Regulations के जरिए अपने घरेलू ढांचे को इसके अनुरूप किया है.
शिप रीसाइक्लिंग यार्ड के आधुनिकीकरण के लिए 53.5 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता दी गई है. इस सहायता से 115 सुविधाओं को Hong Kong Convention के अनुरूप बनाने में मदद मिली है.
इसके अलावा गुजरात के Alang में 35 शिप रीसाइक्लिंग यार्ड ने EU green-listing के लिए आवेदन किया है और यूरोपीय संघ की ओर से भारतीय यार्ड के निरीक्षण की प्रक्रिया शुरू की गई है.
Hazardous Materials की पहचान के लिए IHM
सुरक्षित शिप रीसाइक्लिंग में Inventory of Hazardous Materials यानी IHM की महत्वपूर्ण भूमिका है. इसके जरिए जहाज पर मौजूद खतरनाक पदार्थों की पहचान और रिकॉर्ड रखा जाता है.
भारत में इसके लिए lifecycle-based compliance approach अपनाई गई है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जहाज अधिकृत रीसाइक्लिंग सुविधा में पहुंचने से पहले खतरनाक सामग्री से जुड़े जोखिमों की पहचान और प्रबंधन किया जा सके.
Ship-breaking Credit Note Scheme से शिप रीसाइक्लिंग को बढ़ावा
Ship Building Financial Assistance Scheme यानी SBFA 2.0 के तहत Ship-breaking Credit Note Scheme शुरू की गई है.
इसका उद्देश्य जहाज मालिकों को अनुपालन करने वाले भारतीय शिप रीसाइक्लिंग यार्ड में अपने जहाज रीसाइकिल कराने के लिए प्रोत्साहित करना है. इसके तहत रीसाइकिल किए गए जहाज की स्क्रैप वैल्यू के बराबर 40% का Credit Note जारी किया जाता है.
इस Credit Note का इस्तेमाल भारतीय शिपयार्ड में बनाए जाने वाले नए जहाज की कीमत के 5% तक के भुगतान के लिए किया जा सकता है. इससे शिप रीसाइक्लिंग और घरेलू शिपबिल्डिंग दोनों को बढ़ावा देने का प्रयास किया गया है.
Ex-INS Viraat की रीसाइक्लिंग भी रही खास
Alang, गुजरात में Ex-INS Viraat की रीसाइक्लिंग भारत की महत्वपूर्ण शिप रीसाइक्लिंग परियोजनाओं में शामिल रही है.
यह विमानवाहक पोत भारतीय नौसेना में 30 साल और रॉयल नेवी में 27 साल सेवा देने के बाद मार्च 2017 में डीकमीशन किया गया था. सितंबर 2020 में इसे रीसाइक्लिंग के लिए Alang लाया गया.
इस जहाज ने अपनी सेवा के दौरान 22,622 से अधिक उड़ान घंटे दर्ज किए. यह 2,252 दिन समुद्र में रहा और 5.88 लाख से अधिक नॉटिकल मील की दूरी तय की. इतने बड़े और जटिल जहाज की रीसाइक्लिंग ने भारत की सुरक्षित तरीके से उपयोगी सामग्री वापस हासिल करने की क्षमता को भी सामने रखा.
भारत के लिए रोजगार और उद्योग का भी बड़ा क्षेत्र
शिप रीसाइक्लिंग सेक्टर केवल जहाजों को अलग करने तक सीमित नहीं है. इससे बड़ी संख्या में रोजगार पैदा होते हैं और परिवहन, स्टील रीरोलिंग मिल, उपकरण आपूर्ति और वेस्ट मैनेजमेंट जैसी सहायक गतिविधियों को भी समर्थन मिलता है.
रीसाइक्लिंग से प्राप्त स्टील और दोबारा इस्तेमाल किए जा सकने वाले हिस्से घरेलू विनिर्माण और औद्योगिक उत्पादन में उपयोगी होते हैं. इस तरह यह सेक्टर संसाधन सुरक्षा, रोजगार, औद्योगिक गतिविधियों और पर्यावरणीय स्थिरता से जुड़ा हुआ है.


