आज के समय में मोबाइल फोन बच्चों की पढ़ाई, मनोरंजन और दोस्तों से जुड़ने का जरिया बन चुका है. लेकिन जब बच्चा हर समय मोबाइल मांगने लगे, मोबाइल हटाते ही चिड़चिड़ा हो जाए या पढ़ाई, खेल, नींद और परिवार के साथ समय बिताने से ज्यादा स्क्रीन को प्राथमिकता देने लगे, तो माता-पिता के लिए यह चिंता की बात हो सकती है.
बच्चे का मोबाइल पूरी तरह छीन लेना हमेशा आसान या प्रभावी तरीका नहीं होता. बेहतर तरीका यह है कि घर में स्क्रीन के इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट नियम बनाए जाएं और माता-पिता खुद भी उनका पालन करें. अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स यानी AAP भी बच्चों के लिए ऐसा Family Media Plan बनाने की सलाह देती है, जिसमें स्क्रीन के साथ-साथ नींद, शारीरिक गतिविधि, पढ़ाई, खेल और परिवार के समय का संतुलन शामिल हो.
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1. मोबाइल अचानक बंद करने के बजाय धीरे-धीरे समय कम करें
अगर बच्चा रोज कई घंटे मोबाइल इस्तेमाल करता है, तो एक दिन में उसका स्क्रीन टाइम पूरी तरह बंद कर देना टकराव बढ़ा सकता है. पहले यह समझें कि बच्चा मोबाइल का इस्तेमाल कब और क्यों करता है. गेम, वीडियो, सोशल मीडिया या पढ़ाई के लिए इस्तेमाल होने वाले समय को अलग-अलग देखें.
इसके बाद एक निश्चित दिनचर्या बनाएं. उदाहरण के लिए, पढ़ाई या जरूरी काम पूरा होने के बाद सीमित समय के लिए मनोरंजन वाला स्क्रीन टाइम दिया जा सकता है. समय खत्म होने से कुछ मिनट पहले बच्चे को बता दें कि अब मोबाइल रखने का समय आने वाला है.
यह तरीका बच्चे को अचानक रोकने के बजाय मानसिक रूप से तैयार करता है.
2. मोबाइल के बदले मजेदार विकल्प दें
सिर्फ यह कहना कि मोबाइल मत चलाओ, काफी नहीं है. बच्चे के पास मोबाइल के अलावा कोई आकर्षक विकल्प भी होना चाहिए.
घर में बोर्ड गेम, किताबें, ड्रॉइंग, पजल, संगीत, साइकलिंग, आउटडोर गेम या परिवार के साथ छोटी-सी एक्टिविटी शुरू की जा सकती है. छोटे बच्चों के लिए माता-पिता का साथ सबसे महत्वपूर्ण हो सकता है.
AAP की सलाह भी इस बात पर जोर देती है कि स्क्रीन बच्चों के खेल, नींद, शारीरिक गतिविधि और सामाजिक बातचीत को विस्थापित नहीं करे.
3. घर में ‘नो स्क्रीन जोन’ बनाएं
बच्चे को मोबाइल से दूर रखने का एक आसान तरीका घर में कुछ जगहों और समय को स्क्रीन फ्री बनाना है. जैसे डाइनिंग टेबल पर मोबाइल नहीं, पढ़ाई के समय मनोरंजन वाले वीडियो नहीं और सोने से पहले स्क्रीन नहीं.
AAP बच्चों के बेडरूम और खाने के समय को स्क्रीन फ्री रखने तथा सोने से पहले कम से कम एक घंटे स्क्रीन से दूरी रखने की सलाह देती है.
मोबाइल को बच्चे के बिस्तर के पास चार्ज करने के बजाय घर में एक सामान्य चार्जिंग जगह तय करना भी उपयोगी नियम हो सकता है.
4. माता-पिता पहले अपना मोबाइल इस्तेमाल सुधारें
बच्चे वही व्यवहार जल्दी सीखते हैं जो वे घर में देखते हैं. अगर माता-पिता बच्चे से कहें कि मोबाइल मत चलाओ, लेकिन खुद लगातार फोन देखते रहें, तो बच्चे के लिए नियम को स्वीकार करना मुश्किल हो सकता है.
इसलिए खाना खाते समय फोन अलग रखना, बच्चे से बातचीत के दौरान स्क्रीन न देखना और परिवार के साथ कुछ समय पूरी तरह ऑफलाइन बिताना जरूरी है. AAP के अनुसार माता-पिता का अपना मीडिया व्यवहार भी बच्चों की मीडिया आदतों को प्रभावित कर सकता है.
5. बच्चे से डांटने के बजाय बात करें
मोबाइल को लेकर हर बार झगड़ा करने के बजाय बच्चे से यह पूछें कि उसे फोन पर क्या पसंद आता है. क्या उसे गेम पसंद है, दोस्तों से बात करना अच्छा लगता है या वीडियो देखने में मजा आता है.
बातचीत से माता-पिता बच्चे की वास्तविक जरूरत समझ सकते हैं. इसके बाद मिलकर नियम तय किए जा सकते हैं. बड़े बच्चों और किशोरों के लिए यह तरीका खासतौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि AAP अब स्क्रीन टाइम को केवल घंटों की संख्या से देखने के बजाय कंटेंट, संदर्भ, संतुलन और परिवार के संवाद पर भी ध्यान देने की सलाह देती है.
बच्चे की उम्र के हिसाब से तय करें स्क्रीन टाइम
लखनऊ निवासी शिल्पी का कहना है कि पहले उनकी बेटी लगातार फोन के लिए रोती रहती थी. फिर उन्होंने परिवार के साथ मिलकर उसके साथ ज्यादा से ज्यादा समय गुजारना शुरू किया. इतना ही नहीं, उसे स्क्रीन से दूर करने के लिए उसे आउटडोर गेम्स के साथ-साथ बागबानी और क्राफ्ट में भी बिजी रखना शुरू किया. अब वह कम मोबाइल यूज करती है.
हर बच्चे के लिए एक ही नियम लागू नहीं किया जा सकता. Indian Academy of Pediatrics की प्रकाशित गाइडलाइंस में 2 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन से बचने, 24 से 59 महीने के बच्चों के लिए अधिकतम एक घंटे प्रतिदिन supervised screen time और 5 से 10 साल के बच्चों के लिए दो घंटे से कम स्क्रीन टाइम की सिफारिश की गई है. साथ ही स्क्रीन को नींद, आउटडोर गतिविधियों, पढ़ाई, परिवार और दोस्तों के साथ बातचीत का विकल्प नहीं बनने देना चाहिए.
हालांकि बड़े बच्चों और किशोरों के लिए AAP एक ऐसा एकल घंटे-आधारित नियम नहीं बताती जो हर बच्चे पर समान रूप से लागू हो. बच्चे की उम्र, विकास, स्क्रीन के इस्तेमाल का उद्देश्य और उससे प्रभावित होने वाली दूसरी गतिविधियों को ध्यान में रखना जरूरी है.
मोबाइल छुड़ाने में रखें धैर्य
मोबाइल की आदत बदलना एक दिन का काम नहीं है. शुरुआत में बच्चा विरोध कर सकता है, ज्यादा समय मांग सकता है या गुस्सा कर सकता है. ऐसे समय में माता-पिता को नियम बार-बार बदलने के बजाय शांत और लगातार बने रहना चाहिए.
अगर स्क्रीन इस्तेमाल की वजह से बच्चे की नींद, पढ़ाई, व्यवहार, सामाजिक गतिविधियों या रोजमर्रा की जिंदगी पर गंभीर असर पड़ रहा है, तो बाल रोग विशेषज्ञ या योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है.
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सबसे जरूरी बात यह है कि लक्ष्य बच्चे से तकनीक छीनना नहीं, बल्कि उसे तकनीक का संतुलित और जिम्मेदार इस्तेमाल सिखाना है. मोबाइल बच्चे की जिंदगी का एक हिस्सा हो सकता है, लेकिन उसकी पूरी दुनिया नहीं.
Source: American Academy of Pediatrics की मीडिया और बच्चों से जुड़ी गाइडलाइंस तथा Indian Academy of Pediatrics की स्क्रीन टाइम और डिजिटल वेलनेस संबंधी सिफारिशों को संदर्भ के तौर पर इस्तेमाल किया गया है.


