Delhi News: अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के क्रीमी लेयर आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बड़ा फैसला सुनाया है. शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें 11 मार्च 2026 के फैसले को केवल भविष्य की भर्तियों पर लागू करने की मांग की गई थी. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी उपक्रमों (PSU) और निजी क्षेत्र में कार्यरत माता-पिता की केवल सैलरी या आय के आधार पर किसी उम्मीदवार को क्रीमी लेयर में नहीं रखा जा सकता. हालांकि, अदालत ने पहले से हो चुकी नियुक्तियों, वरिष्ठता और पदोन्नति को सुरक्षित रखने की भी बात कही है.
OBC क्रीमी लेयर पर केंद्र की दलील सुप्रीम कोर्ट ने ठुकराई
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि मार्च के फैसले को लागू करने में देरी करने का कोई ठोस या उचित आधार नहीं है. केंद्र सरकार ने दलील दी थी कि फैसले को पिछली और मौजूदा भर्ती प्रक्रियाओं पर लागू करने से प्रशासनिक अव्यवस्था पैदा हो सकती है.
केंद्र ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मांग की थी कि फैसले को केवल भविष्य में लागू किया जाए, ताकि पहले से नियुक्त कर्मचारियों और चल रही भर्तियों पर इसका प्रतिकूल असर न पड़े. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया.
माता-पिता की सैलरी से अकेले तय नहीं होगा क्रीमी लेयर का दर्जा
सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 के अपने फैसले का दायरा स्पष्ट करते हुए कहा कि OBC उम्मीदवार के क्रीमी लेयर या नॉन-क्रीमी लेयर में आने का निर्धारण केवल माता-पिता की सैलरी या आय के आधार पर नहीं किया जा सकता.
इसके लिए माता-पिता के पद की स्थिति और श्रेणी के साथ 1993 के कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) के तहत निर्धारित आय और संपत्ति संबंधी मानकों पर भी विचार करना होगा.
खास तौर पर PSU और निजी क्षेत्र में काम करने वाले माता-पिता की सैलरी को क्रीमी लेयर निर्धारित करने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता.
पहले से हुई नियुक्तियों और वरिष्ठता पर नहीं पड़ेगा असर
अदालत ने अपने फैसले में मौजूदा नियुक्तियों और कर्मचारियों के सेवा संबंधी अधिकारों को भी सुरक्षित रखा है. पीठ ने स्पष्ट किया कि इस फैसले के तहत संबंधित उम्मीदवारों को मिलने वाला लाभ अन्य कर्मचारियों की वरिष्ठता को प्रभावित नहीं करेगा.
इसके अलावा पहले से पूरी हो चुकी चयन प्रक्रियाओं और नियुक्तियों को दोबारा नहीं खोला जाएगा. पहले से निर्धारित वरिष्ठता और पदोन्नति भी प्रभावित नहीं होगी.
कोर्ट ने यह भी कहा कि इसी तरह के मामले लेकर आने वाले अन्य उम्मीदवारों के दावों पर संबंधित अदालतें, न्यायाधिकरण या सक्षम प्राधिकारी स्वतंत्र रूप से विचार कर सकते हैं.
केंद्र सरकार को लागू करने के लिए मिले दो महीने अतिरिक्त
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को अपने 11 मार्च के फैसले को लागू करने के लिए मूल छह महीने की समयसीमा के अतिरिक्त दो महीने का वक्त दिया है.
हालांकि, अदालत ने क्रीमी लेयर नीति में बदलाव या विभिन्न पदों के बीच समानता निर्धारित करने के लिए सरकार को कोई निश्चित समयसीमा नहीं दी. पीठ ने कहा कि नीति निर्माण, संबंधित पक्षों से परामर्श और पदों की समानता निर्धारित करना कार्यपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र का विषय है.
क्या था 11 मार्च 2026 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि OBC उम्मीदवारों के क्रीमी लेयर का निर्धारण करते समय माता-पिता के पद की स्थिति और श्रेणी को भी ध्यान में रखना जरूरी है.
विशेष रूप से PSU और निजी क्षेत्र में कार्यरत माता-पिता की केवल सैलरी या आय को क्रीमी लेयर का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता. अब शुक्रवार के आदेश में शीर्ष अदालत ने इस फैसले के तहत संबंधित उम्मीदवारों के आरक्षण लाभ को बरकरार रखा है और केंद्र की इसे केवल भविष्य में लागू करने की मांग ठुकरा दी है.
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